नज़रिया: गोवा और मणिपुर में नैतिकता और राजनीतिक दांव पेंचों का उलझाव

  • 15 मार्च 2017
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पांच राज्यों में हुए हालिया चुनाव अगर फुटबॉल मैच होते तो भारतीय जनता पार्टी ये मैच 2-5 से हार जाती. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जीत और गोवा, पंजाब और मणिपुर में हार के कारण.

चुनावों की तुलना फुटबॉल मैच से अटपटी लग सकती है लेकिन इसे मणिपुर के होने वाले मुख्यमंत्री बिरेन सिंह सही से समझ सकते हैं क्यूंकि सियासत में आने से पहले वो एक पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी थे.

चुनावों के नतीजे सामने आये तो सोशल मीडिया पर भी भाजपा के नाम फुटबॉल जैसा स्कोर देखने को मिला, यानी 2-5. कांग्रेस ने तीन राज्यों में चुनाव जीता तो इसके नाम के आगे स्कोर 3-5 का था

लेकिन राजनीती सियासत नहीं है. मैच के बाद फुटबॉल का स्कोर बदला नहीं जा सकता. सियासत में चुनाव के नतीजों का स्कोर बदल सकता है. हारी हुई पार्टी भी सत्ता में आ सकती है. देश में इसकी कई मिसालें हैं

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यही हाल राज्यों के चुनाव के कुछ दिनों बाद हुआ. भाजपा का स्कोर 2-5 से 4-5 हो गया.

फुटबॉल के शब्दों में भाजपा की गोवा और मणिपुर में हार के बावजूद जीत हो गयी. या कहें पार्टी ने हार के मुंह से जीत छीन ली. इसी लिए कांग्रेस के नेताओं ने कहना शुरू कर दिया कि भाजपा ने जीत चुराई है, पार्टी ने जीत पैसे और ताक़त से खरीदी है.

कांग्रेस पार्टी का तर्क है कि दोनों राज्यों में पहले नंबर आने पर राज्यपाल को चाहिए था कि सरकार बनाने का निमंत्रण पहले उसे दिया जाता.

कांग्रेस के अनुसार ये मैच फिक्सिंग है. पूर्व गवर्नर बीपी सिंह के विचार में भाजपा का क़दम संविधान के खिलाफ नहीं है.

वो कहते हैं कि राज्यपाल के पास जो भी पहले बहुमत और प्रयाप्त नंबर जुटाने का दावा करता है और गवर्नर संतुष्ट है तो उसे सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाता है. उसके बाद राज्यपाल उसे कुछ दिनों के अंदर हाउस के अंदर बहुमत साबित करने की मोहलत देता है.

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तो इस तरह गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने मनोहर पर्रिकर को सरकार बनाने की दावत देकर कोई असंवैधानिक काम नहीं किया.

मणिपुर के गवर्नर के क़दम को भी असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता.

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि गोवा और मणिपुर की सियासत के अखाड़े में भाजपा ने कांग्रेस को चारों खाने चित कर दिया.

लेकिन इन दोनों राज्यों में भाजपा ने जिस तेज़ी सरकार बनाने की तरफ क़दम बढ़ाया है उससे कई लोग असहज महसूस कर रहे हैं और ऐसे लोगों में भाजपा समर्थक भी शामिल हैं.

उनके अनुसार नैतिक रूप से भाजपा ने गोवा में सरकार बनाकर सही नहीं किया. खास तौर से गोवा के नतीजों से जब ये ज़ाहिर हो कि वहां की जनता ने पार्टी को अपना समर्थन नहीं दिया है. मुख्यमंत्री और कुछ मंत्रियों की हार से कम से कम ऐसा ही पैग़ाम मिलता है.

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शायद भाजपा को जल्दबाज़ी ना करके कांग्रेस को सरकार बनाने का दावा करने देना चाहिए था और इस बात का इंतज़ार करना चाहिए था कि कांग्रेस बहुमत साबित न कर सके.

उसके बाद भाजपा को सरकार बनाने का दावा करती तो उसकी साख और मज़बूत होती और उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उसकी भारी जीत में चार चाँद लग जाते.

हाल में इसकी एक मिसाल भी मिलती है. दिल्ली में 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 31 सीटों के साथ सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी. लेकिन इसने सरकार बनाने का दावा नहीं किया. आम आदमी पार्टी ने 28 सीटें की जीत के साथ कांग्रेस की मदद से सरकार बनाई.

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भाजपा के कुछ स्थानीय नेता मानते हैं कि 2013 में दिल्ली में सरकार न बनाने का फैसला ग़लत था.

वो दिल्ली के 2015 में हुए विधानसभा के दोबारा हुए चुनाव की तरफ इशारा करके अपनी ग़लती को ना दोहराने की बात करते हैं. दोबारा हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत मिला और भाजपा के खाते में केवल तीन सीटें आयीं.

भाजपा के लिए ये एक सबक़ था. वो दोबारा इस ग़लती को दुहराना नहीं चाहती थी. तो अगर गोवा और मणिपुर में पार्टी को सरकार बनाने का अवसर मिला तो पार्टी नैतिकता के चक्कर में क्यों आती?

हमें शायद ये भी नहीं भूलना चाहिए कि 2014 में हुए आम चुनाव के भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री ने देश को कांग्रेस-मुक्त बनाने का बीड़ा उठा रखा है. वो गोवा और मणिपुर में ये अवसर क्यों गंवाते.

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