ईश निंदा पर क्यों मुखर हुई पाकिस्तानी संसद?

  • 15 मार्च 2017
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पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर ईशनिंदा से जुड़ी सामग्री प्रकाशित होने के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में संसद, सरकार और न्यायपालिका खुलकर सामने आ रही है.

मीडिया में भी इसे लेकर काफ़ी हलचल है.

पाकिस्तान में क़ानून के तहत ईशनिंदा के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान है हालांकि कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को इसके तहत निशाना बनाया जाता है.

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लेकिन कुछ ब्लॉगरों के इस साल ग़ायब होने के बाद से आधिकारिक स्तर पर ईशनिंदा के खिलाफ़ आने वाले बयानों में इज़ाफ़ा हुआ है.

साथ ही अहम बात ये है कि इस मुद्दे पर सेना की ओर से हाल में कोई बयान नहीं आया है.

अब तक क्या-क्या हुआ

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पाकिस्तान के निचले सदन ने 14 मार्च को एक प्रस्ताव पारित किया है जिसमें सोशल मीडिया पर ईशनिंदा से जुड़ी सामग्री शेयर करने की आलोचना की गई है.

नेशनल असेंबली ने 10 सदस्यीय समिति का गठन करने का भी फ़ैसला किया है. इसका मकसद ये पता करना है कि सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री कौन फैला रहा है.

ये फ़ैसला प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के बयान के कुछ घंटे बाद आया.

इसके बयान के तहत नवाज़ शरीफ़ ने सोशल मीडिया पर ईशनिंदा से जुड़ा कंटेट ब्लॉक करने का निर्देश दिया था और कहा था कि ऐसी सामग्री फैलाने वालों को सज़ा मिलनी चाहिए.

पाकिस्तान के ऊपरी सदन ने भी पिछले हफ़्ते ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया था.

आठ मार्च को इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शौकत अज़ीज़ सिद्दक़ी ने निर्देश दिया था कि ईशनिंदा करने वालों का नाम एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट में डाल देना चाहिए. इस दस्तावेज़ में उन लोगों का नाम है जिन्हें देश से बाहर जाने की अनुमति नहीं है ताकि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सके.

ईशनिंदा के खिलाफ़ याचिका

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जस्टिस सिद्दक़ी का आदेश सलमान शाहिद की याचिका के बाद आया था.

सलमान शाहिद एक इस्लामिक नेता हैं और मौलाना अब्दुल अज़ीज़ के दामाद हैं. मौलाना अब्दुल अज़ीज़ इस्लामाबद की लाल मस्जिद के मौलवी हैं

अपनी याचिका में सलमान शाहिद ने कहा था कि सोशल मीडिया वेबसाइटों पर ईशनिंदा वाले कंटेट से मुसलमानों की भावनाएँ आहत हो रही हैं.

इसके बाद ही जस्टिस सिद्दक़ी ने कहा था, इस मामले को सुलझाने की मैं पूरी कोशिश करूँगा और ज़रूरत पड़ी तो सोशल मीडिया पर बैन लगा दूँगा.

आरोप लगाया जाता है कि जस्टिस सिद्दक़ी कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा वाले हैं.

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ईशनिंदा को इस साल ब्लॉगर्स के लापता होने से जोड़ा जा रहा है जिन पर ईशनिंदा का आरोप था.

रिहा किए जाने के बाद से ज़्यादातर ब्लॉगर चुप्प हैं कि उन्हें किसने अग़वा किया था.

लेकिन एक कार्यकर्ता वक़ास गोराया ने कहा है कि सेना से नाता रखने वाले एक सरकारी इदारे ने उन्हें पकड़ा और यातना दी क्योंकि उन्होंने फ़ेसबुक पन्ने पर राजनीति में पाकिस्तानी सेना की भूमिका की आलोचना की थी.

गोराया ने कहा कि ईशनिंदा से जुड़ा कंटेट उनके पेज पर डाला गया ताकि उन्हें फंसाया जा सके. हालांकि सेना ने इनकार किया है.

आगे क्या होगा ?

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इस मुद्दे पर आए आधिकारिक बयानों का ऊर्दू मीडिया में स्वागत किया गया है जो अंग्रेज़ी मीडिया के मुकाबले जनमत को बेहतर दर्शाता है.

ये स्पष्ट नहीं है कि सरकार इंटरनेट से ईशनिंदा वाली सामग्री कैसे हटाएगी.

पाकिस्तान दूरसंचार अथॉरिटी के चेयरमैन इस्माइल शाह ने कहा है कि लाखों वेब पन्नों को खंगालना मुश्किल काम होगा हालांकि कोर्ट ने इस काम के लिए एक निगरानी ग्रुप बनाने के लिए कहा है.

वैसे पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर रोक पहले लगाई जा चुकी है. 2010 में दो हफ़्ते तक फ़ेसबुक पर बन लगाया गया था जबकि 2011 से लेकर 2016 तक यू ट्यूब पर बैन था.

ये बैन पैगंबर मोहम्मद से जुड़ी एक फ़िल्म को लेकर लगा था.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि ईशनिंदा से जुड़े क़ानून इतने कड़े हैं कि उनकी आलोचना करने भर से ही ईशनिंदा के आरोप लगने लगते हैं.

इतना ही नहीं कई बार बिना सबूत के लगाए गए आरोप भी घातक साबित हो सकते हैं.

1990 के बाद से कम से कम 65 लोगों को इन आरोपों के तहत क़त्ल किया जा चुका है.

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