यूपी: 312 विधायकों के बाद भी बीजेपी को सीएम की खोज?

  • 17 मार्च 2017
इमेज कॉपीरइट PTI

उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे 11 मार्च की दोपहर तक आ चुके थे और भाजपा को अप्रत्याशित जीत मिली थी.

करीब एक हफ्ते होने को आए और प्रदेश के 312 भाजपा विधायकों को इस बात की हवा तक नहीं है कि आखिर उनका सीएम कौन होगा.

उत्तर प्रदेश में कौन होगा बीजेपी का सीएम?

यूपी सीएम: क्या बीजेपी को है 'शुभ मुहूर्त' का इंतज़ार?

उत्तर प्रदेश में 'बीजेपी सीएम' की घुड़दौड़

ज़्यादातर विधायक पिछले तीन दिनों से लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं और वो भी अटकलों के गर्म बाजार के बीच.

जिन लोगों के नाम अभी तक यूपी सीएम के लिए चर्चा में रहे हैं उन पर गौर फ़रमाइए.

केशव प्रसाद मौर्य, मनोज सिन्हा, योगी आदित्यनाथ और एक समय में संतोष गंगवार का भी.

इमेज कॉपीरइट PTI

इन सभी में एक ही चीज़ समान है, सभी लोक सभा सांसद हैं.

तो क्या भाजपा के अपने 312 नए विधायकों में से एक भी सीएम उम्मीदवार बनने की दौड़ में शामिल नहीं.

अब ज़रा चर्चा में रहे नामों पर जुगत भिड़ाते हैं.

पहले बात केशव प्रसाद मौर्य की जिन्हें एक चौंकाने वाले फ़ैसले में चुनाव के काफी पहले प्रदेश की कमान दे दी गई.

मंशा साफ़ थी. भाजपा प्रदेश में पिछड़े वर्ष के मतदाताओं को टारगेट कर रही थी जो पहले उससे थोड़ा इतर रहे थे.

स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे पूर्व बसपाइयों के 'कमल वाले तालाब' में आने से सफलता भी मिलते दिखी और परिणाम ने इस पर मुहर भी लगाई.

लेकिन केशव मौर्य के अलावा भाजपा ने इन चुनावों में प्रदेश के दलित वोट बैंक पर भी नज़र गड़ा रखी थी.

इमेज कॉपीरइट PTI

तमाम तरह की स्कीमों पर बात हुई, जिलाध्यक्षों की नियुक्ति से लेकर टिकट वितरण तक में उन पर 'नया भरोसा' दिखा.

नतीजा हुआ प्रदेश की 84 सुरक्षित सीटों मे से मात्र दो पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों की जीत.

भाजपा के पास 65 से भी ज़्यादा सुरक्षित सीटों पर जीत ने ज़ाहिर कर दिया कि दलित वोट बैंक पर भी ख़ासा असर पड़ चुका है.

शायद दलित, केशव प्रसाद मौर्य की दावेदारी से खुश न हो.

शायद प्रदेश के सवर्णों को भी ये बात नागवार गुज़रे.

यही कशमकश संतोष गंगवार के नाम पर हो सकती है.

उधर गाज़ीपुर सांसद मनोज सिन्हा के नाम पर न सिर्फ पार्टी से जुड़े पिछड़े वर्ग और दलित नेताओं बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों का भी विरोध झेलना पड़ सकता है.

इमेज कॉपीरइट PTI

मनोज सिन्हा पूर्वी उत्तर प्रदेश के संख्या में कम लेकिन संपन्न कहे जाने वाले भूमिहार तबके से ताल्लुक़ रखते हैं.

योगी आदित्यनाथ के नाम पर पार्टी शुरू से ही थोड़ी 'असहज' रही.

इसके पीछे योगी की 'कट्टरवादी छवि' और 'आक्रामक तेवर' बताया जाता है.

हालांकि पार्टी ने उनसे ज़बरदस्त प्रचार करवाया लेकिन 'मंदिर' जैसे मुद्दों से दूरी बढ़ती भाजपा की 'न्यू इंडिया' स्कीम में शायद योगी फ़िट नहीं बैठते.

इतनी कशमकश के बीच नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सीएम भी 'तय' करना है और असंतोष भी दूर रखना है.

नए चुने गए 312 विधायक भी शायद यही सोच रहे होंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)