क्या है शत्रु संपत्ति अधिनियम?

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Image caption शत्रु संपत्ति अध्यादेश 2016 से क़रीब 2050 संपत्तियों का मालिकाना हक़ सरकार को मिल गया

संसद ने बीते हफ़्ते शत्रु संपत्ति (संशोधन और मान्यकरण) अधिनियम 2016 पारित किया है.

भारत ने छीनी करोड़ों की 'पाकिस्तानी' संपत्ति

जंग छिड़ी, सरहद बनी और दोनों बिछड़ गए..

इसके साथ ही 1968 में पारित शत्रु संपत्ति अधिनियम एक बार फिर सुर्ख़ियों में आ गया.

क्या है शत्रु संपत्ति?

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दो देशों में लड़ाई छिड़ने पर 'दुश्मन देश' के नागरिकों की जायदाद सरकार कब्ज़े में कर लेती है ताकि दुश्मन लड़ाई के दौरान उसका फ़ायदा न उठा सके.

पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीका और ब्रिटेन ने जर्मनी के नागरिकों की जायदाद को इसी आधार पर अपने नियंत्रण में ले लिया था.

भारत ने 1962 में चीन, 1965 और 1971 में पाकिस्तान से लड़ाई छिड़ने पर भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत इन देशों के नागिरकों की जायदाद पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

इसके तहत ज़मीन, मकान, सोना, गहने, कंपनियों के शेयर और दुश्मन देश के नागरिकों की किसी भी दूसरी संपत्ति को अधिकार में लिया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

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भारत ने अब तक 9,500 शत्रु जायदादों की पहचान की है. इनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान नागिरकों की हैं. इनकी क़ीमत 1,04,339 करोड़ रुपए से अधिक है.

शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत शत्रु देश के नागरिकों को इन जायदादों के रख रखाव के लिए कुछ अधिकार भी दिए गए हैं. पर ये अस्पष्ट हैं, काफ़ी उलझने हैं और बहुत मामले अदालत में हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2005 तक कुछ मामलों का निपटारा कर दिया. इसने अपने फ़ैसले में कहा कि शत्रु संपत्ति का रख रखाव करने वाला कस्टोडियन, ट्रस्टी की तरह काम करता है. लेकिन शत्रु देश के पास उसका मालिकाना हक़ बरक़रार रहता है.

सरकार ने 2016 में एक अध्यादेश के ज़रिए कस्टोडियन के अधिकार में इज़ाफ़ा कर दिया. पर बाद में वह अध्यादेश समय पर ख़त्म हो गया. साल 2016 में एक बार फिर यह मामला उठा.

विधेयक में व्यवस्था

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Image caption कई संपत्तियों पर भारत सरकार का अधिकार हो गया है. हैदराबाद का चारमीनार. (फ़ाइल फ़ोटो)
  • हाल ही में पारित हुए विधेयक में कस्टोडियन को शत्रु संपत्ति का मालिक बना दिया गया, यह 1968 से ही प्रभावी भी मान लिया गया.
  • दूसरे, शत्रु संपत्ति की अब तक हुई बिक्री ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दी गई.
  • भारतीय नागरिक विरासत में शत्रु संपत्ति दूसरे को नहीं दे सकते.
  • दीवानी अदालतों को कई मामलों में शत्रु संपत्ति से जुड़े मुक़दमे पर सुनवाई का हक़ नहीं होगा.

नतीजा

इसका नतीजा यह है कि किसी भारतीय नागरिक ने कोई शत्रु संपत्ति ख़रीदी है या उसे विकसित किया है तो क़ानूनी तौर पर उससे वह ले लिया जा सकता है.

वह इस मामले को सिर्फ़ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ही उठा सकता है.

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