मदरसों पर अंकुश लगाओ हम पर नहीं: संघ

  • 18 मार्च 2017
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पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्कूलों के पाठ्यक्रम के मुद्दे पर संघ और ममता बनर्जी सरकार में ठन गई है.

कथित रूप से धर्मिक असहिष्णुता का पाठ पढ़ाने और इसे बढ़ावा देने के आरोप में सरकार ने ऐसे 125 स्कूलों को कारण बताओ नोटिस भेजा है.

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संघ ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि सरकार को इन स्कूलों के बजाय तेज़ी से बढ़ते मदरसों और क्रिश्चियन स्कूलों पर अंकुश लगाना चाहिए.

सरकार ने कथित रूप से धार्मिक असहिष्णुता और नफ़रत का पाठ पढ़ाने वाले स्कूलों को लाइसेंस रद्द करने की चेतावनी दी है.

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Image caption सरस्वती शिशु मंदिर पर नफ़रत फैलाने के आरोप लगे हैं

इन सवा सौ स्कूलों से अपने पाठ्यक्रम की सूची स्कूली शिक्षा विभाग को सौंपने को कहा गया है ताकि उसकी समीक्षा की जा सके.

सरकार ने इन स्कूलों को राज्य शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम का पालन करने को भी कहा है.

सीपीएम विधायक मानस मुखर्जी ने यह मुद्दा हाल ही में विधानसभा में उठाया था. उसके बाद ही सरकार ने इस मामले में कार्रवाई की है.

जिन स्कूलों को नोटिस भेजा गया है, उनमें से ज़्यादातर कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, नदिया और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों के ग्रामीण इलाकों में हैं.

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Image caption प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष सरकार के फ़ैसले पर सवाल उठाते हैं

सरकार का दावा है कि इन स्कूलों में, ख़ासकर, पहली से चौथी कक्षा तक के छात्रों के लिए आयोजित कार्यक्रमों में धार्मिक असहिष्णुता की सीख दी जाती है.

सरकार की निगाह शारदा शिशु तीर्थ, सरस्वती शिशु मंदिर और विवेकानंद विद्या विकास परिषद संचालित स्कूलों पर है. यह तमाम संगठन संघ से जुड़े हैं.

स्कूली शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं, "हमने स्कूलों से अपना पाठ्यक्रम भेजने को कहा है, ताकि उसकी जांच की जा सके. दोषी पाए जाने पर उनके ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई की जाएगी."

चटर्जी कहते हैं कि शिक्षा के नाम पर धार्मिक असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी.

सरकार का कहना है कि ऐसे स्कूलों को सरकारी पाठ्यक्रम का पालन करना होगा.

शिक्षा मंत्री का कहना है कि जिन सवा सौ स्कूलों को नोटिस भेजी गई है, उनमें से 96 स्कूलों ने सरकार से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) नहीं लिया है.

इस मुद्दे को उठाने वाले सीपीएम नेता मानस मुखर्जी कहते हैं, "राज्य में ऐसे स्कूलों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. मैंने सरकार से ऐसे स्कूलों की शिनाख्त कर उनके खिलाफ कार्रवाई की अपील की है."

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लेकिन संघ के नेता इन आरोपों को निराधार क़रार देते हैं. उनकी दलील है कि वर्ष 2015 में असम में संघ से जुड़े एक स्कूल के मुस्लिम छात्र ने सीबीएसई की परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया था.

आरएसएस के प्रवक्ता जिष्णु बोस कहते हैं, "पहले राज्य की वाम मोर्चा सरकार ने भी इन स्कूलों की स्थापना का विरोध किया था. तृणमूल कांग्रेस सरकार भी उसी राह पर चल रही है. यह सरकार बंगाल को बांग्लादेश बनाने का प्रयास कर रही है."

बोस दावा करते हैं कि वर्ष 2014 में बर्दवान में हुए विस्फोट के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने राज्य में साढ़े दस हजार अवैध मदरसों को बंद कर दिया था.

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भाजपा ने भी सरकार के इस रवैए की आलोचना की है.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष सवाल करते हैं, "सरकार इन स्कूलों को नोटिस कैसे भेज सकती है? तमाम स्कूल सरकार की अनुमति से ही चल रहे हैं. दरअसल, सरकार राज्य में संघ परिवार की बढ़ती गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए हरसंभव उपाय कर रही है."

घोष बताते हैं कि विद्या विकास परिषद की ओर से राज्य में संचालित साढ़े तीन सौ स्कूल विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के पाठ्यक्रम का पालन करते हैं. पूरे देश में ऐसे कई स्कूल हैं. लेकिन सरकार को यहां संघ की हर गतिविधि में राजनीति की बू आती है.

भाजपा और संघ ने इस मुद्दे पर सरकार के साथ कानूनी लड़ाई लड़ने का भी फैसला किया है.

घोष कहते हैं, "संघ परिवार के स्कूलों को निशाना बनाने की बजाय सरकार को मदरसों और मिशनरी स्कूलों की निगरानी करनी चाहिए."

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