नरेंद्र मोदी के 'हनुमान' हैं राम माधव

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Image caption राम माधव को मोदी को सबसे करीबी रणनीतिकार माना जाता है

80 के दशक में बीजेपी को 'ब्राह्मण-बनियों' की पार्टी कहा जाता था. 90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी ने हिन्दी बेल्ट में पांव पसारना शुरू किया. 2014 के आम चुनाव में बीजेपी की जीत और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पार्टी ने इन प्रचलित धारणाओं को तोड़ा है.

बीजेपी ने हिन्दी प्रदेश की दीवारों को तोड़ उन राज्यों में भी जोरदार दस्तक दी जहां आज़ादी के बाद से उसकी कोई मौजूदगी नहीं थी. ख़ासकर पूर्वोत्तर भारत में जहां के लिए बीजेपी अनजान पार्टी रही है. आज की तारीख में असम और मणिपुर में बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं. इसके साथ ही नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी सरकार में सहयोगी पार्टी है.

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2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मणिपुर में एक भी सीट नहीं मिली थी. तब मणिपुर में बीजेपी का वोट प्रतिशत भी 2.1 फ़ीसदी था जो इस चुनाव में 36.3 फ़ीसदी पहुंच गया.

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पूर्वोत्तर में बीजेपी की पहुंच बनाने में एक शख़्स का नाम काफी सुर्खियों में है. संघ में बाल स्वयंसेवक से शुरुआत करने वाला वह शख़्स आज बीजेपी के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिकारों में से एक है.

बीबीसी से ख़ास बातचीत में राम माधव कहते हैं, ''चुनाव लड़ने से पहले उस राज्य को समझना पड़ता है. आज की तारीख़ में चुनाव कोई पारंपरिक प्रक्रिया नहीं रही. इसके लिए अच्छी रणनीति बनानी होती है. पूर्वोत्तर में लंबे समय से कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टियों का शासन रहा है. यहां परिवर्तन की चाह लोगों में है और हमने इस चीज़ को समझा. इसी पर हमने काम करना शुरू किया. यदि हम यहां अच्छा विकल्प मुहैया कराते हैं तो परिवर्तन को लोग बड़ी सहजता से अपनाएंगे.''

'बंच ऑफ़ थॉट्स' पर राम माधव की ग़लतबयानी

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मूलतः आंध्र प्रदेश के रहने वाले 52 साल के राम माधव 2014 में संघ से बीजेपी की सक्रिय राजनीति में बड़ी खामोशी से आए थे. 2003 में आरएसएस ने उन्हें अपना प्रवक्ता बनाया था.

प्रवक्ता रहने के दौरान वह आरएसएस के रुख को बड़ी सक्रियता से मीडिया में रखते थे. राम माधव को प्रधानमंत्री मोदी का अमित शाह की तरह ही विश्वासपात्र माना जाता है. मोदी की हर विदेश यात्र में राम माधव की रणनीति होती होती है.

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बीजेपी ने राम माधव को महासचिव बनाया. पार्टी ने उन्हें असम की जिम्मेदारी दी और असम में तरुण गोगोई का किला ध्वस्त करने में वह कामयाब रहे.

असम में न केवल बीजेपी की सरकार बनी बल्कि पार्टी कांग्रेस के संगठन को भी तोड़ने में कामयाब मिली. हिमंत बिस्वा सरमा जैसे कांग्रेस के अहम नेता को राम माधव ने अपने पाले में किया.

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पार्टी ने राम माधव को एक और सरहदी राज्य जम्मू-कश्मीर की जिम्मेदारी दी. वहां राम माधव ने सज्जाद लोन जैसे अलगाववादी नेता को चुनावी मैदान में उतारा.

वहां भी पार्टी ने बढ़िया प्रदर्शन किया और पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. यहां बीजेपी का उपमुख्यमंत्री है. जिन राज्यों में बीजेपी सफलता हासिल कर रही थी वे पार्टी के लिए बड़े मुश्किल राज्य थे.

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Image caption मोदी के विजय रथ को आगे बढ़ाने में राम माधव की अहम भूमिका

तो बीजेपी को इस चीज़ को समझने में इतनी देरी क्यों लगी? इस पर राम माधव ने कहा, ''इसके लिए मैं किसी को दोष नहीं दूंगा. आज मोदी जी की एक राष्ट्रीय अपील है. इस अपील का हमने अधिकतम इस्तेमाल किया. पार्टी ने हमें पूर्वोत्तर की जिम्मेदारी दी है और यहां हम मन से काम कर रहे हैं. हमने यहां एक-एक सीट पर काम किया. इसके बावजूद पूर्वोत्तर में हम कमज़ोर हैं. असम को छोड़ दिया जाए तो और राज्यों में हमारा संगठन उस तरह का नहीं है.''

इन जिम्मेदारियों में राम माधव के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने के बाद 40 दिनों तक सरकार गठन की जो बातचीत रही वह काफी मुश्किल भरा काम था. यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी.''

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बीजेपी के लिए पीडीपी से गठबंधन करना कितना सहज था? राम माधव ने कहा, ''हमने पहले उमर अब्दुल्ला से भी बात की थी. उमर से मैंने और अमित भाई ने मुलाक़ात की थी. यह बातचीत भी काफी लंबी चली लेकिन हम मुकाम तक नहीं पहुंच पाए. हालांकि यह बात मीडिया को हमने अब तक नहीं बताई थी.''

उन्होंने कहा, ''इस बातचीत के नाकाम होने के बाद पीडीपी के अलावा कोई विकल्प नहीं था. आज मुझे लगता है कि हम पीडीपी को देश की मुख्यधारा में लाने में कामयाब रहे. महबूबा मुफ़्ती की भाषा अब पहले की तरह नहीं है.''

आरएसएस का प्रचारक होना कितना मुश्किल काम है? राम माधव ने कहा, ''प्रचारक होने के लिए आपको बहुत अनुशासित होना होता है. यदि आप मन से तैयार हैं तो आपको मजा आएगा. एक प्रचारक तय करके आता है उसे इस जीवन को स्वीकार करना है जहां परिवार की भूमिका नहीं है. हमारा संगठन ही परिवार होता है. हमारे लिए इतना वक़्त नहीं होता है कि हम परिवार के बारे में सोचे.'' आरएसएस में प्रचारक को शादी नहीं करनी होती है.

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राम माधव के साथ इंडिया फाउंडेशन में काम कर चुके एक जानकार ने कहा कि राम माधव सार्वजनिक जीवन में काफी विनम्र और सरल इंसान हैं. उन्होंने कहा कि इसके साथ ही वह काफी टेकसेवी, तेजतर्रार, अंतर्राष्ट्रीय मामलों के अच्छे जानकार और उनमें संगठन चलाने की जबर्दस्त क्षमता है.

राम माधव ने कुछ विवादित बयान भी दिए हैं. उन्होंने कहा था कि संघ और बीजेपी के अखंड भारत का सपना ख़त्म नहीं हुआ है. इसे लेकर पार्टी ने राम माधव से पल्ला झाड़ लिया था और कहा था कि यह उनका निजी बयान है.

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Image caption पूर्वोत्तर में बीजेपी की दस्तक

राम माधव ने उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के योग दिवस के कार्यक्रम में शामिल नहीं होने को लेकर उंगली उठाई थी. इस पर भी उनकी काफी किरकिरी हुई थी. उपराष्ट्रपति के कार्यालय से बताया गया था कि हामिद अंसारी को इस कार्यक्रम में शरीक होने लिए आमंत्रित ही नहीं किया गया था.

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