हिंदी शिक्षकों को नौ महीने से वेतन नहीं

  • 21 मार्च 2017
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पूर्वोत्तर राज्य नगालैंड में करीब दो साल से बिना किसी विपक्ष के सरकार चल रही है. राज्य में नगालैंड पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) की अगुवाई में डेमोक्रेटिक अलायंस आफ नगालैंड की सरकार हैं.

लेकिन लोगों की समस्याओं को सदन के भीतर उठाने के लिए वहां विपक्ष की भूमिका में कोई जन प्रतिनिधि नहीं बचा हैं. विपक्ष में बैठने वाले कांग्रेस के जो आठ विधायक थे वे मई 2015 में एनपीएफ में शामिल हो गए.

ऐसी स्थिति में प्रदेश में हर छोटी-बड़ी समस्या के लिए लोगों को खुद ही आवाज़ उठानी पड़ रही है और जब बात नहीं बनती तो यही लोग सड़कों पर उतर आते हैं.

'हिंदी बेहद पसंद है इसलिए पढ़ती हूं'

इस बार नगालैंड सरकार को राज्य के हिंदी शिक्षकों का विरोध झेलना पड़ रहा है. ये मुद्दा प्रदेश के उन हिंदी शिक्षकों का है जो यहां स्कूली बच्चों को हिंदी सिखा रहे हैं. विरोध की वजह है कि इन हिंदी शिक्षकों को पिछले नौ महीनों से वेतन नहीं दिया गया हैं.

विरोध भले ही वेतन के लिए हो रहा है लेकिन चरमपंथ की समस्या से प्रभावित नगालैंड में यह पहली बार देखने को मिल रहा है जब हिंदी बहस का विषय बन गई हैं. क्योंकि नगालैंड में भाषा के सवाल पर नगा समाज पहले से ही बंटा हुआ है.

नगामीज भाषा को राज्य की दूसरी अधिकृत भाषा के तौर पर बढ़ावा देने के मुद्दे पर काफी विवाद है. राज्य में 17 प्रमुख जनजातियां है और नगामीज इनके बीच संपर्क की भाषा है. यहां के लोग सबसे ज्यादा यही भाषा बोलते हैं.

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बावजूद इसके सरकारी कामकाज की भाषा के तौर पर नगामीज को मान्यता देने की पहल का विरोध करने वाले लोगों की दलील है कि किसी भी बोली को भाषा के तौर पर मान्यता देने की पहली शर्त यह है कि उसकी अपनी लिपि होनी चाहिए. लेकिन नगामीज भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं है. ईसाईयत बहुल नगालैंड में पूरी तरह रोमन लिपि का ही उपयोग होता है.

इन विवादों के बीच नगालैंड सचिवालय के सामने विरोध के दौरान इक्कठा हुए प्रदर्शनकारियों के हाथ में मौजूद बैनरों और तख्तियों पर लिखा था, "हमारी राष्ट्रीय भाषा हिंदी नगालैंड के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं", "नगालैंड में एक और सीरिया? कृपया युद्ध क्षेत्र तैयार न करें, केवल शांति क्षेत्र रहने दें".

युवाओं के 'सर्कल' में कहाँ है हिंदी

नगालैंड़ में इस तरह के नारों को हलके में नहीं लिया जा सकता. पिछले महीने ही नगालैंड में स्थानीय निकाय में महिला आरक्षण को लेकर जिस तरह का हिंसक आंदोलन हुआ था उसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री टीआर ज़ेलियांग को अपनी कुर्सी छोड़ देनी पड़ी.

ऐसे में शुक्रवार से आल नगालैंड हिंदी टीचर्स यूनियन के बैनर तले शुरू हुए बेमियादी आंदोलन को राज्य सरकार ने समय रहते ही रोक लिया. नगालैंड सरकार ने हिंदी शिक्षकों को अगले महीने (अप्रैल) तक लंबित वेतन चुकाने का एक लिखित आश्वासन दिया है और इस महीने के भीतर दो महीने का वेतन देने की बात भी लिखित में कही हैं.

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मुख्यमंत्री डॉ. शूरोजेलि लीजीत्सू ने शिक्षा मंत्री, वित्त विभाग के अधिकारी, मुख्य सचिव और आल नगालैंड हिंदी टीचर्स यूनियन के प्रतिनिधियों के साथ शुक्रवार को एक बैठक कर यह फ़ैसला लिया.

लेकिन इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि नगालैंड में हिंदी की कितनी अहमियत है? अगर केंद्र और राज्य सरकार नगालैंड में हिंदी को सही मायने में बढ़ावा देना चाहते है तो फिर इन शिक्षकों को आंदोलन करने की जरूरत क्यों पड़ी.

इसके जवाब में प्रदेश के शिक्षा मंत्री (स्कूली शिक्षा) यिताचु ने बीबीसी से कहा कि "हम राष्ट्रीय भाषा हिंदी को हर तरह से महत्व देना चाहते हैं और इसका प्रचार करना चाहते हैं, लेकिन साथ ही इसके लिए केंद्र का सहयोग भी मिलना होगा."

'हिंदी को दूसरी भाषा कहना शर्मनाक'

शिक्षा मंत्री ने कहा कि केंद्र प्रायोजित योजना के तहत नियुक्त किए गए हिंदी शिक्षकों के वेतन के भुगतान के लिए मिलने वाली राशि अभी केंद्र सरकार ने जारी नहीं की है. ऐसे में आंदोलन करने वाले शिक्षकों को राज्य के खजाने से ही भुगतान करना पड़ेगा.

फिलहाल इन शिक्षकों को दो महीने का बकाया वेतन ही दिया जाएगा और बाकि सात महीनों का बकाया वेतन केंद्र सरकार से राशि प्राप्त होने पर ही दिया जाएगा. लेकिन सवाल यह भी है कि केंद्र सरकार आगे इन शिक्षकों को काम पर रखेगी या नहीं. क्योंकि केंद्र प्रायोजित योजना के तहत इन शिक्षकों के काम की अवधि मार्च में समाप्त हो जाएगी.

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जबकि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस बात पर जोर दे रहा है कि केंद्र प्रायोजित योजना के तहत नियुक्त किए गए हिंदी शिक्षकों को नगालैंड सरकार अपना कर्मचारी बना लें. नगालैंड सरकार कहती है कि फिलहाल उसके खजाने में इतना पैसा नहीं है. यानी आगे इन हिंदी शिक्षकों के भविष्य को लेकर कोई निश्चितता दिखाई नहीं दे रही.

नगालैंड में केंद्र प्रायोजित योजना के अंतर्गत 1379 हिंदी शिक्षक है जबकि पूरे प्रदेश में हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षकों की कुल संख्या ढाई हजार से अधिक है. जबकि राज्य की सभी स्कूलों में अंग्रेजी अनिवार्य विषय है.

असम के सरकारी स्कूलों में कक्षा आठवीं तक संस्कृत को अनिवार्य करने का फैसला लेने वाली बीजेपी नगालैंड सरकार में भी जूनियर पार्टनर है. लिहाजा प्रदेश में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए बीजेपी पर लोग सवाल खड़ा कर रहें हैं.

जब भड़का था 'हिंदी विरोधी आंदोलन'

इस संदर्भ में नगालैंड बीजेपी के अध्यक्ष विसासोलिए ल्होउन्गु ने कहा कि नगालैंड में हिंदी को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है. क्योंकि यहां के लोग हिंदी सीखना चाहते है लेकिन इसके लिए हिंदी शिक्षकों को नियमित करना होगा.

नगालैंड सरकार का कहना है कि उसकी वित्तीय स्थिति बेहद खराब है. केवल हिंदी शिक्षकों को एक साल में वेतन देने के लिए 64 करोड़ रुपए की जरूरत पड़ती है. लेकिन अगर सरकार के लोग इस समस्या को लेकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिलेंगे तो आगे का रास्ता निकल सकता हैं.

पिछले साल राज्य के दौरे पर आए अमित शाह ने नगालैंड के प्रत्येक जिले में एक हिंदी संस्थान खोलने की घोषणा की थी. हालांकि अबतक इसको लेकर कोई काम शुरू नहीं हुआ हैं.

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विसासोलिए का कहना है कि अगर बीजेपी अध्यक्ष हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कोई ठोस कदम उठाते है तो इसका फायदा पार्टी को 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में मिलेगा. हिंदी शिक्षकों की अवधि मार्च में खत्म हो जाएगी, लिहाजा केंद्र सरकार को फिर से अगले पांच साल के लिए इन सभी शिक्षकों को नियुक्ति देनी चाहिए.

क्या संस्कृत का समय समाप्त हुआ?

शिक्षकों को वेतन नहीं दिए जाने से खफा कुछ लोग सोशल मीडिया पर नगालैंड सरकार की कड़ी आलोचना कर रहें हैं.

वेतन देने की मांग को लेकर हिंदी शिक्षकों नें आठ मार्च से विरोध प्रदर्शन शुरू किया था. फिलहाल राज्य सरकार के लिखित भरोसे के बाद हिंदी शिक्षकों ने कुछ दिनों के लिए अपना आंदोलन वापस तो ले लिया है लेकिन केंद्र और राज्य सरकार के बीच बातचीत में जो अंतर है उससे इस समस्या का समाधान इतनी जल्दी निकलेगा, ऐसा लग नहीं रहा.

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