नज़रिया: योगी आदित्यनाथ को संघ ने बनवाया मुख्यमंत्री

  • 19 मार्च 2017
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भारतीय जनता पार्टी ने विशाल बहुमत हासिल करने के बाद भी उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बनाया है तो इससे यही ज़ाहिर होता है कि पार्टी की राजनीति में अगर लॉग इन 'विकास' है तो पासवर्ड 'हिंदुत्व' है.

बीजेपी की राजनीति में ये कोई नई बात नहीं है. वे विकास की बात ज़रूर करते हैं और ये थोड़ा बहुत होता भी है, लेकिन उनका पूरा अस्तित्व हिंदुत्व के मुद्दे पर टिका है.

पार्टी की 'कोर आइडेंटिटी' जिस हिंदुत्व में हैं, उसमें योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं की बड़ी भूमिका रही है. इसके साथ ये भी हक़ीकत है कि यूपी के बीजेपी कैडर में योगी आदित्यनाथ सबसे लोकप्रिय नेता हैं.

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आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने में उनकी अपनी लोकप्रियता और पार्टी की हिंदुत्व राजनीति की अहम भूमिका है. अब उनके सामने नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे को साथ लेकर चलने की चुनौती होगी.

तीन दिशाएं, लक्ष्य एक

यानी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जो सरकार बन रही है वो तीन दिशाओं में जाती दिख रही है, लेकिन इन तीनों का उद्देश्य एक ही है- 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करना.

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दरअसल, यूपी के आम लोगों ने नरेंद्र मोदी को उम्मीद से वोट किया है. जो लोग मुलायम, मायावती और अखिलेश की राजनीति से ऊब चुके हैं, उन्होंने मोदी के ज़रिए विकास का सपना देखा है. वे लोग अवसर चाहते हैं और मोदी ने यूपी की आम जनता से कई वादे किए हैं.

नरेंद्र मोदी ने यूपी की आम जनता को नई राजनीति का भरोसा दिलाया है. मोदी तुष्टीकरण के बदले सबको साथ लेकर सबके विकास की बात भी कर रहे हैं.

लेकिन आदित्यनाथ की तो साफ-सुथरी छवि है नहीं, ना तो उनके पास प्रशासनिक अनुभव है और ना ही विकास के कामों से उन्हें जोड़कर देखा गया है.

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उनकी छवि अल्पसंख्यक विरोधी की रही है. ऐसे नेता है कि जो लव जिहाद की बात करते रहे हैं. जो मुस्लिम समाज की आलोचना करते रहे हैं. उन्होंने ऐसे ऐसे बयान दिए हैं जो डराने धमकाने वाले रहे हैं.

मुस्लिम समाज का डर

उत्तर प्रदेश की आबादी में 18 से 20 फ़ीसदी मुसलमान हैं. इतने बड़े समुदाय की उपेक्षा करके आप प्रदेश को कैसे आगे बढ़ा पाएंगे. उनका भरोसा कैसे जीतेंगे.

कल तक जिस तरह से योगी आदित्यनाथ मुसलमानों के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं वैसे में सबका साथ सबका विकास के एजेंडे को कैसे आगे बढ़ाएंगे? ये संदेह तो बना ही रहेगा.

मुस्लिम समाज के लोगों में एक तरह का ख़ौफ़ पहले से रहा है और अब वह ख़ौफ़ बढ़ेगा ही. इंडिया टुडे टेलीविजन के एग्जिट पोल में भारतीय जनता पार्टी को वोट देने वाले मुसलमान महज दो फ़ीसदी थे. इसकी वजह ख़ौफ़ का होना ही था.

अगर भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यक तबके को सेकेंड क्लास सिटीजन बनाकर आगे बढ़ना चाहती है, या ऐसा संदेश देना चाहती है तो यह बहुत ग़लत संदेश है.

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आदित्यनाथ को आगे बढ़ाए जाने से मुस्लिम समाज का ख़ौफ़, हक़ीकत में तब्दील होता दिख रहा है. अल्पसंख्यकों के साथ तुष्टिकरण की राजनीति हुई है, लेकिन उसके बदले आम लोग आदित्यनाथ की राजनीति पसंद करने लगें, ऐसा नहीं है.

क्या हो सकता है नुक़सान

इसका पार्टी को बड़ा नुक़सान हो सकता है. अल्पसंख्यक मतदाताओं का वो वर्ग जो किसी पार्टी का कैडर नहीं है, वह भारतीय जनता पार्टी से छिटक सकता है. यह पार्टी के लिए अब तक प्लस फैक्टर साबित हुआ है.

युवाओं का तबका दूर हो सकता है, जो विकास, नौकरियां और अवसर चाहते हैं, ऐसे मतदाताओं की दुनिया में योगी आदित्यनाथ कहीं से फ़िट नहीं बैठते हैं.

ऐसे में योगी आदित्यनाथ के सामने बड़ी चुनौती होगी, वे किस तरह से प्रदेश की सरकार चलाते हैं, किस तरह की राजनीति करते हैं, उन्हें काफ़ी संभलकर राजनीति करनी होगी.

ये भी स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने योगी आदित्यनाथ को यूपी की कमान सौंप कर बड़ा जोख़िम लिया है. हालांकि कहा जा सकता है कि उन्हें मौका मिलना चाहिए, लेकिन अब योगी आदित्यनाथ को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ेगी.

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हिंदुत्व की राजनीति से नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात से अपनी पहचान बनाई थी, लेकिन अपनी छवि को लगातार बदलते रहने के लिए वे लगातार मेहनत करते रहे हैं. अब योगी आदित्यनाथ को भी उतनी ही मेहनत करने की ज़रूरत होगी.

संघ का दबाव काम आया

यहीं पर लगता है कि योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला मोदी जी का जितना है, उससे ज़्यादा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है. आरएसएस को लग रहा है कि पार्टी को 325 सीटें मिली हैं, इतना बहुमत मिला है, अगर अब हिंदुत्व की राजनीति नहीं करेंगे तो कब करेंगे?

क्योंकि गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ काफी सालों से बड़ी उम्मीद के साथ देखता रहा है. 1990 के दशक से ही.

राम मंदिर आंदोलन के दिनों से ही वे यूपी को प्रयोगशाला बनाने की कोशिश करते रहे हैं. उन्हें तब से उम्मीद थी कि एक दिन बहुमत मिलेगा, राम मंदिर बनाएंगे और हिंदुत्व का झंडा लहराएंगे.

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संघ और भारतीय जनता पार्टी ने इतनी उम्मीद झारखंड, महाराष्ट्र या हरियाणा को लेकर कभी नहीं रखी. उनके हिंदुत्व का एजेंडा हमेशा उत्तर प्रदेश को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ाया जाता रहा है.

यही वजह है संघ ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर दबाव डालकर आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवाया है.

संघ और भारतीय जनता पार्टी की कोशिश होगी कि वो हिंदुत्व के साथ साथ विकास की राजनीति को आगे बढ़ाएं. नहीं तो केवल हिंदुत्व से बात बहुत आगे नहीं जा पाएगी.

हालांकि अभी तो पार्टी को बहुत मुश्किल नहीं होगी. क्योंकि विपक्ष की स्थिति बेहद कमज़ोर है. दूसरे तमाम दलों की विश्वसनीयता कम हुई है. लोग कांग्रेस, बसपा और सपा की तुष्टीकरण की राजनीति से ऊब चुके हैं.

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अगर ये पार्टियां अपनी राजनीति में तब्दीली नहीं लाती है और फिर से नहीं उठती हैं तो तुलनात्मक रूप से भारतीय जनता पार्टी को अगले कुछ सालों तक फ़ायदा होगा.

हिंदुत्व की जीत

ये फ़ायदा बना रहे, इसी कोशिश के चलते ही योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के साथ-साथ दो दो लोगों को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है.

एक केशव प्रसाद मौर्य हैं, जिनके जरिए पिछड़ों को साधे रखने की कोशिश की गई है तो दूसरी तरफ दिनेश शर्मा हैं, जिनके साथ परंपरागत ब्राह्मण मतदाताओं को ख़ुश रखने की कवायद है.

लेकिन इस पूरी कवायद ये स्पष्ट है कि जीत हिंदुत्व की राजनीति की हुई है.

सशक्त विपक्ष के अभाव में ये राजनीति थोड़े दिनों तक चलेगी भी, भारतीय जनता पार्टी युवा मतदाताओं को भी जोड़े रखने में कामयाब होगी, लेकिन लेकिन अगर विकास नहीं हुआ, लोगों को काम धंधे नहीं मिलेंगे और युवाओं को नौकरियां नहीं मिलेंगी तो यही लोग दूसरी पार्टी का रुख कर लेंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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