नज़रिया: 'योगी के आने से साबित हुआ कि मोदी नहीं बदले'

  • 20 मार्च 2017
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Image caption लखनऊ में विधायक दल के नेता चुने जाने के बाद योगी आदित्यनाथ

11 मार्च को चुनावी नतीजे आने के बाद से ही चर्चा गर्म थी कि उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा. बीजेपी ने भी इसे लेकर लोगों को काफी असमंजस में रखा.

लंबे समय से जारी इस असमंजस को पार्टी ने शनिवार को योगी आदित्यनाथ के नाम के साथ ख़त्म कर दिया और रविवार को योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम भी बन गए. यह फ़ैसला ज़्यादातर लोगों के लिए हैरान करने वाला है.

उत्तर प्रदेश की इस जीत को 2014 के आम चुनाव में हुई नरेंद्र मोदी की जीत से बड़ा माना जा रहा है.

योगी के नाम पर मुहर लगने से सभी को हैरानी हुई है. यहां तक की बीजेपी के भीतर भी ज़्यादातर लोग अवाक हैं.

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योगी के आने से संदेश साफ़ है कि प्रधानमंत्री मोदी का प्रचलित नारा- 'सबका साथ, सबका विकास' एक जुमले से ज़्यादा नहीं है.

आक्रामक हिन्दुत्व

अब बीजेपी एक बार फिर से आक्रामक हिन्दुत्व की तरफ रुख़ कर रही है.

आदित्यनाथ की सबसे प्रखर पहचान यही है कि वह घोर सांप्रदायिक हैं और मुस्लिम विरोधी साधु से नेता बने हैं. योगी ने हिन्दू युवा वाहिनी के साथ अपने सियासी सफ़र की शुरुआत की.

वह महंत अवैद्यनाथ की धार्मिक विरासत के उत्तराधिकारी हैं जो गोरखपुर में गोरक्षपीठ के महंत थे.

गोरखपुर के साथ पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ की मजबूत पकड़ है. इस इलाके में आदित्यनाथ के अनुयायी बड़ी संख्या में हैं.

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हिन्दू युवा वाहिनी की पहचान एक उपद्रवी संगठन के रूप में है. अतीत में कई मौकों पर वाहिनी के लोग गोरखपुर के आसपास बीजेपी के ख़िलाफ़ भी चुनाव लड़ चुके हैं.

मुस्लिम-विरोधी

कट्टर हिन्दुवादी पहचान के कारण इनमें वोट जुटाने की भी क्षमता है, लेकिन ये पूर्वांचल के सीमित कुनबे से बाहर प्रभाव जमाने में कामयाब नहीं रहे.

मायावती के 2007 से 2012 के कार्यकाल में योगी मुस्लिम-विरोधी नफ़रत भरे भाषणों के चलते पहली बार मुश्किल में पड़े थे.

योगी के ख़िलाफ़ आईपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था और उन्हें जेल में डाल दिया गया था.

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हालांकि इससे उन्होंने अपना कट्टरपंथी रास्ता छोड़ा नहीं. योगी आदित्यनाथ ने सांप्रदायिक राजनीति की ज़मीन को ज़िंदा रखा.

हिंदुओं की लामबंदी

'लव-जिहाद', 'घर-वापसी' जैसी सांप्रदायिक गतिविधियां योगी की ही मौलिक कल्पना थी.

2015 में यूपी के उपचुनावों में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने आदित्यनाथ को कैंपेन में शामिल किया था.

इस दौरान योगी ने 'लव-जिहाद' और 'घर-वापसी' जैसे नक़ली और सांप्रदायिक मुद्दों को जमकर उछाला था.

हालांकि योगी का यह दांव नहीं चला था और इसका असर उल्टा पड़ गया. बीजेपी को उपचुनाव में 11 सीटों में 8 पर हार का सामना करना पड़ा था.

मार्च 2017 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुओं को लामबंद करने के लिए हर कोशिश की.

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योगी ने कैराना से हिन्दुओं के पलायन की बात उठाई और इससे वहां के स्थानीय सांसद हुकुम सिंह के लिए मुश्किल हो गई.

पुराने मोदी

हुकुम सिंह को बाद में इन आरोपों को ख़ारिज करना पड़ा. मोदी ने 2014 के आम चुनाव में सांप्रदायिक कार्ड से परहेज किया था.

क़ब्रिस्तान और श्मशान का संदर्भ भी सांप्रदायिक मक़सद से दूर रहा, लेकिन आदित्यनाथ पूरी आक्रामकता से सांप्रदायिक कार्ड खेलते रहे.

आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद लग रहा है कि जो ऐसा सोचते थे कि मोदी गुजरात छोड़ने के बाद बदल गए हैं, वो ग़लती कर रहे थे.

जिस समावेशी एजेंडे की बात कही जा रही थी वह सच नहीं था. पुराने मोदी अब भी ज़िंदा हैं, बस उस माकूल वक़्त का इंतज़ार है जब वे अपने एजेंडे को लागू कर सकें.

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निश्चित तौर पर उनके लिए इससे और अच्छा वक़्त नहीं हो सकता है. उन एजेंडों को लागू करने के लिए इस जीत से बड़ा मौका और क्या हो सकता है.

राजनीति और धर्म

कहा जा रहा है कि यह बीजेपी की सूनामी है. बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर यूपी की कुल 403 सीटों में से 325 पर जीत दर्ज की है.

बेशक बीजेपी समर्थकों का एक तबका आदित्यनाथ का कट्टर अनुयायी है, लेकिन पार्टी के भीतर के राजनीतिक पर्यवेक्षक इस फ़ैसले से हैरान हैं.

उन्हें लगता है कि यह पार्टी के लिए अच्छी ख़बर नहीं है.

यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कहते रहे हैं कि वह राजनीति और धर्म को अलग रखने में भरोसा करते हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के चयन से साफ़ है कि कथनी और करनी में भारी गैप है.

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आदित्यनाथ के साथ दो उपमुख्मंत्री भी हैं. पहले केशव प्रसाद मौर्य जो कि अब तक उत्तर प्रदेश बीजेपी यूनिट के अध्यक्ष हैं.

दूसरे दिनेश शर्मा जो लखनऊ के मेयर हैं. आने वाला वक़्त ही बताएगा कि योगी नेतृत्व मोदी के सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त वादों पर काम करता है या इससे अलग.

वादों के हिसाब से योगी का कोई सुनहरा अतीत नहीं है.

अगर मोदी और शाह उत्तर प्रदेश को रिमोट से चलाने की कोशिश करेंगे तो फिर अखिलेश यादव से शासन से अलग क्या होगा जिसके बारे में कहा जाता था कि इस सरकार में साढ़े पांच मुख्यमंत्री हैं.

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