नज़रिया: सात वजहें जिसने यूपी में भाजपा को बहुमत दिलाया

  • 20 मार्च 2017
इमेज कॉपीरइट Getty Images

उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनाव परिणामों ने सभी को चौंकाया. स्वयं भाजपा ने भी अपना लक्ष्य 265 सीटों का रखा था और उसे 'मिशन-265' का नाम दिया था. उसे भी यह अनुमान नहीं था कि वह 312 सीटें और 39.7 फीसद वोट हासिल करेगी.

विधानसभा चुनावों में ऐसा बेहतरीन प्रदर्शन इसके पूर्व केवल दो बार हुआ; 1952 में कांग्रेस को 390 सीटें और 47.9 फीसद वोट मिले और 1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी को 352 सीटें और 47.8 फीसद वोट मिले. पहला अवसर अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद और दूसरा अवसर आपातकाल में अधिनायकवाद से स्वतंत्रता के बाद आया. और अब तीसरा अवसर जातिवाद के नासूर से 'स्वतंत्रता' के रूप में आया है.

नरेंद्र मोदी यानी राजनीति में सपनों का सौदागर

'बहुत कठिन होगी डगर योगी आदित्यनाथ सरकार की'

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने प्रदेश में 71 सीटें जीतीं और उसके सहयोगी अपना दल ने दो सीटें. इससे राजग-गठबंधन ने कुल 80 में 73 सीटें जीत कर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में भाजपा-गठबंधन की मज़बूत सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

लोकसभा में भाजपा गठबंधन को 337 विधान सभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल थी और इस बार 325 सीटें जीत कर पार्टी लगभग वहीं खड़ी दिखाई दे रही है. तो क्या लोकसभा की तरह इस बार के विधानसभा चुनावों में भी केवल मोदी के विकास के आश्वासन और नेतृत्व के जादू के कारण वोट मिले ? या कोई और भी गंभीर कारण थे?

भाजपा की विजय के कारणों को सकारात्मक और नकारात्मक कारणों में बाँटा जा सकता है.

साकारात्मक कारण

1. तीसरा जन उफान - उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों के पीछे प्रदेश में एक जन-उफान काम कर रहा था. पहला जन-उफान 1967 में गैर-कांग्रेस-वाद के रूप में और दूसरा-जन-उफान 1996-98 में समाज में शोषितों और वन्चितों की बढ़ी सहभागिता के रूप में आया. अब 'तीसरा-जन-उफान' इन तबकों की अपने परंपरागत जातिवादी पार्टियों से हट कर राष्ट्रीय पार्टियों, विशेषकर भाजपा, की ओर रुख करने से आया है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इस जन उफान की मूल परिकल्पना यह थी कि अन्य-पिछड़े-वर्ग का अति-विशाल वर्ग, अति-दलितों का एक बड़ा वर्ग और मुस्लिम समुदाय का एक छोटा वर्ग भाजपा की ओर आकर्षित हुआ है. इसका प्रमुख कारण यह था कि ये तबके पहचान की जातिवादी राजनीति को पिछले 20 वर्षों से ढोते-ढोते थक गए थे लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ.

अब उनकी आकाक्षाएं हिलोरे मार रहीं थी और प्रधानमन्त्री मोदी में उनको एक ऐसा शख़्स दिखाई दे रहा था जो उनकी उन आकांक्षाओं को उड़ान दे सकता था.

2. मतदाता समूह में क्रांतिकारी परिवर्तन- भाजपा ने अति-पिछड़ों व अति-दलितों के इस अपार जनसमूह को अपना लक्ष्य बनाया. परंपरागत रूप से भाजपा को उच्च-जातियों, शहरी माध्यम-वर्ग और बनिया पार्टी के रूप में जाना जाता रहा है.

पर प्रदेश की आबादी में यह वर्ग केवल 19 फीसद है. कोई भी पार्टी इतनी छोटी जनसंख्या के बल पर लोकतंत्र में बहुमत कैसे हासिल कर सकती है? इसलिए भाजपा ने प्रदेश में 41 फीसद जनसंख्या वाले अन्य-पिछड़ा-वर्ग की ओर रुख किया. इसके लिए उसने इस वर्ग को पार्टी नेतृत्व में स्थान दिया और अपने सहयोगी अपना दल की अनुप्रिया पटेल को मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया तथा अति-पिछड़े-वर्ग के केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष नियुक्त किया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

लेकिन भाजपा का मास्टर-स्ट्रोक तो तब आया जब उसने भाजपा गठबंधन की 403 में से 163 यानी लगभग 41 फ़ीसद सीटें अति-पिछड़े वर्ग को आवंटित की. अपनी जनसंख्या के अनुपात में सीटें पाकर इस वर्ग में अभूतपूर्व उत्साह भर गया तथा उसे लगा कि उनके राजनीतिक सशक्तिकरण को लेकर भाजपा गंभीर है.

सीएसडीएस के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 58 फ़ीसद मोर-बैकवर्ड (कुर्मी, पटेल, लोध आदि) और 61 फ़ीसद मोस्ट-बैकवर्ड (कुशवाहा, मौर्या, शाक्य, मल्लाह, निषाद, कोइरी, गड़ेरिया, पाल, लोहार, नाई, धोबी आदि) ने भाजपा के पक्ष में बढ़-चढ़ कर वोटिंग की. इतना ही नहीं, 40 फ़ीसद अति-दलितों ने भी भाजपा को वोट दिया जब कि 2012 में केवल तीन फ़ीसद ने ही उसे वोट दिया था. अति-दलितों को बराबर इस बात का एहसास होता रहा कि मायावती केवल जाटव/चमार जाति को ज्यादा तरजीह देती रहीं हैं और उनकी उपेक्षा करती रही हैं.

3. मुस्लिमों का रुझान- इस बार के चुनावों में मुस्लिमों के एक वर्ग ने भाजपा को वोट दिया है. विगत लोकसभा चुनावों में भी प्रदेश में 10 फ़ीसद मुस्लिमों ने भाजपा को वोट दिया था. उसी नक्शेकदम पर इस बार भी मुस्लिम समुदाय ने उसे वोट दिया है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

फतेहपुर जिले में शोध के दौरान मुस्लिम मोदी के विमुद्रीकरण से बहुत खुश दिखे और मोदी के समर्थन की बात की. तराई इलाके में, ख़ास तौर पर खीरी में, युवा मुस्लिम छात्राओं ने 'तीन-तलाक' पर मोदी का समर्थन करने की बात खुले तौर पर की. भाजपा ने भी मुस्लिम-राष्ट्रीय-मंच के माध्यम से मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पैठ बनाई.

4. ग्रामीण संवाद - प्रधानमन्त्री मोदी ने मन-की-बात से न केवल देश के गरीबों से जुड़ने का नायाब प्रयास किया है वरन वे ग्रामीणों से बेहद नजदीकी रिश्ता बनाने में सफल रहे हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने मोदी पर 'सूट-बूट-की-सरकार' अर्थात अमीरों की सरकार होने का आरोप लगाया.

चुनाव नतीजों से ये 5 बातें साफ़ हो जाती हैं

इसे मोदी ने एक अवसर के रूप में बदल दिया और अपनी नीतियों को गाँवों से जोड़ा. उन्होंने 'हेल्थ-कार्ड, प्रधानमन्त्री-ग्रामीण-आवास-योजना, उज्ज्वला-योजना, खुले में शौच न करने के अभियान आदि से ग्रामीणों को अपनी ओर खींचा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अपनी चुनावी सभाओं में इस बात की गारंटी ली कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनने पर मंत्रिमंडल की पहली बैठक में वह सुनिश्चित करायेंगे कि छोटे और गरीब किसानों का ऋण माफ़ हो, उनके उत्पाद को सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीदा जाये और फसल-बीमा-योजना को प्रभावी तरीके से लागू किया जाये जिससे उनके फसलों के नष्ट होने की दशा में उन्हें उसका मुआवजा मिल सके.

इससे ज्यादा किसान को क्या चाहिए? यही कारण है कि 41 फीसद ग्रामीणों ने भाजपा को वोट दिया जो 2012 के मुकाबले 27 फ़ीसद ज़्यादा है.

5. छोटे-सीमान्त दलों से गठबंधन- भाजपा ने दो छोटे और सीमान्त दलों, अपना दल और 'सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी' से गठबंधन किया जिसे मीडिया ने नज़रंदाज़ किया और केवल सपा-कांग्रेस गठबंधन का महिमा-मंडन किया.

इतनी आलोचना क्यों झेलते हैं पीएम मोदी?

अपना दल ने पिछले विधानसभा चुनाव में केवल एक सीट जीती लेकिन सुहालदेव पार्टी ने कभी कोई सीट नहीं जीती. सुहलदेव पार्टी के पूर्वांचल के अधिकतर निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग 9000 वोट है. अपना दल के कुर्मी-वोट हर निर्वाचन क्षेत्र में बहुत हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पिछले चुनावों में भाजपा 30 से 60 सीटें केवल पांच से पंद्रह हज़ार मतों से हारी थी. इस दृष्टिकोण से अपना दल के कुर्मी और सुहलदेव पार्टी के राजभर वोटों के गठजोड़ से भाजपा-गठबंधन हर निर्वाचन क्षेत्र में जीतने की स्थिति में आ गई.

नकारात्मक कारण

1. सपा-कांग्रेस गठबंधन- सपा-कांग्रेस गठबंधन एक अनावश्यक प्रयोग था जिससे दोनों पार्टियों को नुकसान होना तय था. समाजवादी पार्टी गैर-कांग्रेसवाद की वैचारिक आधारशिला पर बनी और उसके प्रणेता डॉ लोहिया ने यही पाठ अपने शिष्य मुलायम सिंह यादव को सिखाया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

लेकिन सालों तक गैर-कांग्रेसवाद पर राजनीति करने वाली पार्टी को अचानक कांग्रेस का आलिंगन करने की ज़रुरत क्यों पड़ी, इसे अखिलेश यादव ने किसी को समझाना ज़रूरी नहीं समझा. इससे सपा के विरुद्ध जनता भड़क गई. फिर वे 105 निर्वाचन क्षेत्र जो सपा ने कांग्रेस के खाते में डाल दिए, वहां सपा के प्रत्याशी हतप्रभ रह गए और उनको अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित लगा.

वे सभी सपा के विरुद्ध विद्रोह कर गए और कहीं भी सपा के वोट कांग्रेस को और कांग्रेस के वोट सपा को हस्तांतरित नहीं हो पाए. बिहार मॉडल उत्तर प्रदेश में फ्लॉप रहा. कांग्रेस के लिए गठबंधन आत्मघाती कदम था क्योंकि इससे लगभग 300 निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस ने अपना मुस्लिम वोट सपा को जाने दिया और उन क्षेत्रों में पार्टी का रहा-सहा ढांचा भी चरमरा गया जो आगामी लोक सभा चुनावों में उनको बहुत भारी पड़ने वाला है.

2. मायावती की सोशल इंजीनियरिंग- मायावती ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में यू-टर्न लेते हुए उसे दलित-मुस्लिम गठजोड़ की ओर ले जाने की कोशिश की. वे नहीं समझ सकीं कि सोशल इंजीनियरिंग कोई मैकेनिकल इंजीनियरिंग नहीं है कि उसे जब चाहे बना ले, जब चाहे मिटा दें.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

दयाशंकर सिंह प्रकरण के बाद उच्च-जाति का मतदाता तो उनसे बिलकुल छिटक गया जिसकी भरपाई के लिए वे मुस्लिमों की ओर मुड़ीं. लेकिन मुस्लिमों को नहीं समझ आया कि वे सपा से क्यों समर्थन वापस लें और मायावती पर क्यों भरोसा करें.

इसके अलावा मायावती के इस प्रयास को दलितों ने पसंद नहीं किया . लेकिन समाज में मायावती ने गलत सन्देश दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद उन्होंने धर्म के आधार पर मुस्लिमों से वोट मांगे और एक तरह से चुनावों में साम्प्रदायिकता का प्रयोग किया.

(लेखक क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख हैं. उत्तर प्रदेश के चुनावी परिणाम पर उनका शोध अध्ययन इकॉनामिक एंड पॉलिटिकल वीकली (31 दिसंबर, 2016) में 'उत्तर प्रदेश में तृतीय-जन-उफान' शीर्षक से प्रकाशित है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)