ब्लॉग: यौन उत्पीड़न की शिकायत करना आसान नहीं

"बलात्कार तो नहीं किया ना, छेड़ा ही तो है, छोड़ दो, क्या हासिल होगा..." ये टिप्पणी मैंने सुनी है, मेरी कुछ सहेलियों ने भी. फिर भी किसी दफ़्तर में 'सेक्शुअल हैरेसमेंट' के बारे में इसे जब भी सुनती हूं, सन्न हो जाती हूं.

जब औरतों को बलात्कार की शिकायत करने से ही रोका जाता है, तो दफ्तर में यौन उत्पीड़न पर और कैसा रवैया होगा?

किसी औरत के साथ काम करनेवाले मर्द या फिर उसके बॉस ने अगर बिना सहमति के छूने की कोशिश की हो, फोन पर गंदे मैसेज भेजे हों, ऑफ़िस के बाहर बुलाया हो, कार में क़रीब आने की कोशिश की हो तो उसे नज़रअंदाज़ कर देने की सलाह इतनी आम क्यों है?

विश्व बैंक के मुताबिक भारत में 18 साल से ज़्यादा उम्र की सिर्फ़ 25 फीसदी औरतें ही नौकरी या रोज़गार में हैं.

कामकाजी औरतों में से किसी के साथ अगर काम की जगह पर ऐसा बर्ताव हो जिसे 'यौन उत्पीड़न' माना जाता है, तो वो क्या करें?

कैसा बर्ताव 'यौन उत्पीड़न' है?

जिस रेप केस ने बदला भारत का क़ानून

दफ़्तर में किससे कहें? नौकरी बचाने की सोचें या स्वाभिमान? शिकायत करने पर 'परेशान करने वाली कर्मचारी' या 'छोटी सी बात का बतंगड़' बनाने वाली का तमगा न लग जाए. और शिकायत ना करने पर कहीं ऐसा न समझ लिया जाए कि इसे ये सब मंज़ूर है!

बात का बतंगड़ या फिर

जब इतना डर और इतने सवाल हों तो शिकायत कर पाना ही एक उपलब्धि लगने लगता है. पर ये तो न्याय की सीढ़ी का महज़ पहला पायदान है.

क्योंकि कई बार शिकायत के बाद भी पीछे धकेलने वालों की कमी नहीं होती. वैसे भी 2013 में बना यौन उत्पीड़न रोकथाम का क़ानून बलात्कार के क़ानून जैसा नहीं है.

क्या आप सेक्शुअल हैरेसमेंट कर रहे हैं?

शिकायत के बाद हिरासत या गिरफ़्तारी नहीं होती. उसी दफ़्तर में काम करना होता है, उसी सहकर्मी या बॉस से रोज़ सामना होगा.

इसी वजह से शिकायत करने वाली औरत ख़ुद ही कई बार नौकरी से इस्तीफ़ा दे देती है.

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'द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट' (टेरी) के प्रमुख रहे जाने-माने पर्यावरणविद् आर.के.पचौरी पर एक औरत ने जब यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए तो दोषी पाए जाने के बाद भी पचौरी लंबे समय तक प्रमुख के पद से हटाए नहीं गए.

शिकायत करने वाली औरत ने यौन उत्पीड़न की रोकथाम वाले क़ानून के अलावा पुलिस में भी शिकायत की थी पर आखिर में उन्हें खुद ही इस्तीफ़ा देना पड़ा.

कितना मददगार क़ानून

उनके मुताबिक, "'टेरी' ने मुझसे कोई सहानुभूति नहीं रखी, और इसी रवैये के चलते मैं नौकरी छोड़ने को मजबूर हुई".

वैसे तो 2013 के क़ानून में यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच कर एक से तीन महीने के बीच में फ़ैसला सुनाने की हिदायत है और इस दौरान शिकायत करने वाली औरत को तन्ख़्वाह के साथ छुट्टी की सहूलियत भी देता है.

इन कपड़ों में हुआ था इनके साथ यौन उत्पीड़न

लेकिन इसकी जानकारी बहुत कम है बल्कि क़ानून पारित होने के तीन साल बाद सरकारी दफ़्तरों में इस नियम के बारे में इसी हफ़्ते नोटिस जारी किया गया है.

कई मामलों में दफ़्तर मर्द (जो अक़्सर ऊंचे ओहदे पर होता है) के साथ खड़ा नज़र आता है और औरत को ही शक़ की नज़र से देखा जाता है.

बहुत बार ये उम्मीद की जाती है कि महिला संस्थान और उत्पीड़न करने वाले की प्रतिष्ठा के लिए, समझौता करके अपनी शिकायत वापस ले लेगी.

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'तहलका' मैगज़ीन के संपादक तरुण तेजपाल के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगने के बाद वो गिरफ़्तार कर लिए गए थे.

वो मैगज़ीन के दफ़्तर में काम तो नहीं कर रहे थे पर फिर भी शिकायत करने वाली औरत ने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया.

अपने इस्तीफ़े मे उसने लिखा, "संस्थान के मदद न करने से मैं सदमे में हूं, उल्टा मुझे ही डराया गया और मेरे चरित्र पर ही सवाल उठाए गए".

महिला सांसदों का होता है यौन उत्पीड़न

हालांकि मामला अभी अदालत में है और आरोप साबित होने बाक़ी हैं.

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