गंगा को नुकसान पहुंचाने पर आईपीसी के तहत मुकदमा चलेगा

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गंगा और यमुना को अब जीवित प्राणी माना जाएगा. और उनको कोई नुकसान पहुंचाया गया तो आईपीसी के तहत मुकदमा चलेगा. ये आदेश दिया है कि नैनीताल हाईकोर्ट ने.

सोमवार को अपने फ़ैसले में कोर्ट ने गंगा यमुना, उनकी सहायक नदियों, उप नदियों, समस्त जल धाराओं और पानी के उनसे जुड़े प्राकृतिक स्रोतों को वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देने को कहा है.

यानी इन दोनों नदियों को क्षति पहुंचाना किसी इंसान को नुकसान पहुंचाने जैसा माना जाएगा. ऐसे में आईपीसी के तहत मुकदमा चलेगा और व्यक्ति को जेल भी संभव है.

नदी को इंसान जैसे क़ानूनी अधिकार

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इतिहासकार और पहाड़ी संस्कृति और भूगोल के जानकार शेखर पाठक कहते हैं कि नदियों का भी एक जीवन है और उनका भी एक तरह का अधिकार है. लिहाज़ा इस रूप में अदालती फ़ैसला स्वागत योग्य है.

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शेखर पाठक कहते हैं, "कई लोगों को ये ग़ैर-व्यवहारिक लग रहा होगा कि गंगा और यमुना को एक व्यक्ति वाला दर्जा मिल गया. देखिए अपनी ओर से बोल नहीं सकती हैं नदियां, तो उसमें स्टेट की जिम्मेदारी होगी समाज के वृहद कल्याण के लिए, और विकास के लिए और विज्ञानसम्मता के लिए. नदियों को ये दर्जा ऐसे ही दिया गया है जैसे किसी मंदिर को दे दिया जाता है, जैसे किसी चर्च को दे दिया जाता है, जैसे किसी मूर्ति को दे दिया जाता है."

सिर्फ़ गंगा की ही सफाई क्यों होनी चाहिए?

असल में गंगा यमुना का मुद्दा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की परिसंपत्तियों के बंटवारे से संबंधित एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बीच आया है.

याचिका उत्तराखंड के ही निवासी मोहम्मद सलीम ने दायर की थी.

शेखर पाठक कहते हैं, "बार बार इस फ़ैसले में गंगा को हिंदुओं की या यमुना को हिंदुओं की नदी कहा गया है. लेकिन वे पूरे भारतीय समाज की नदियां हैं, क्योंकि जिसने रिट दायर की है वो मोहम्मद सलीम साहब हैं तो ये बड़ी दिलचस्प बात है. और वो रिट मूलतः इस पर है कि गंगा नहर पर जो अतिक्रमण हुआ है, तो उस पर भी कोर्ट ने बिल्कुल स्पष्ट निर्देश दिए हैं."

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गंगा-यमुना को दिए गए अधिकार की देखरेख तीन सदस्यों वाली एक समिति करेगी. यानी यह समिति इन नदियों को नुकसान पहुंचाए जाने से संबंधित सभी मुक़दमों की पैरवी करेगी.

इसमें उत्तराखंड के मुख्य सचिव, नैनीताल हाईकोर्ट के महाधिवक्ता और नमामी गंगे प्राधिकरण के महानिदेशक होंगे हैं.

शेखर पाठक कहते हैं, "मजेदार बात है कि निर्णय ये भी दिखाता है कि हमारी कार्यपालिका या ये कहें कि जो हमारी सरकारें और प्रशासन हैं, वे एक तरह से जो चीज़ें सामान्य रूप से की जा सकती हैं उनमें भी वे कितने गैरज़िम्मेदार हैं. इस पर भी एक तरह से अपना गुस्सा न्यायालय ने अभिव्यक्त किया है."

अगर नदी एक जीवित इकाई है और उसके ख़िलाफ़ गड़बड़ी पर किसी को सज़ा भी हो सकती है तो क्या नदी से अगर किसी व्यक्ति को नुकसान हो तो वो भी हर्जाने का हक़दार होगा.

शेखर पाठक कहते हैं वो तो यूं भी है ही. बाढ़, अतिवृष्टि जैसी विपदाओं में तो प्रभावितों को मुआवज़ा या मदद का प्रावधान है ही, लेकिन इस फ़ैसले में इस बारे मे भी बताया गया है.

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शेखर पाठक के मुताबिक, "मान लिया नदी किसी के खेत को बहा ले जाती है, या किसी के मकान को उड़ा ले जाती है चाहे उसने ग़लत बनाया हो या सही बनाया हो तो उस व्यक्ति को या संस्था को जिसके साथ नदी ने गड़बड़ किया है तो उसे भी हक़ होगा कि वो अपना हर्जाना मांगे जैसे हम स्टेट से मांगते हैं."

शेखर पाठक के मुताबिक़ अमरीका के कुछ राज्यों में नदी को कुछ क़ानूनी अधिकार दिए गए हैं. और इसके लिए बाकायदा वाइल्ड रिवर एक्ट नाम का एक क़ानून भी बनाया गया है. उसमें कहा गया है कि नदियों को बहने का अधिकार है. लिहाज़ा उन्हें अपने बहने को बचाए रखने का अधिकार भी है.

पाठक को उम्मीद है कि हो सकता है आने वाले समय में ऐसी कोई पहल यहां भी हो.

मैगसैसे अवार्ड विजेता मशहूर पर्यावरणविद्, चंडीप्रसाद भट्ट की चिंता कुछ अलग है.

उनका कहना है कि समग्र हिमालयी परिप्रेक्ष्य में इस फ़ैसले पर अमल होना चाहिए, बल्कि इसे हिमालयी विकास और संरक्षण के साथ जोड़ा जाना चाहिए.

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भट्ट कहते हैं, "सवाल यही है कि निर्मलता तभी होगी जब अविरलता भी होगी. ये फैसला पूरे परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. हमारी नदियां जैसे गंगा और यमुना जिनकी और उसकी सैकड़ों सहायक धाराएं हैं उनके साथ क्या होगा इस पर भी विचार किया जाना चाहिए और सभी पक्षों को मिलजुलकर इस काम को आगे बढ़ाना चाहिए."

गंगा, भारत की सबसे लंबी नदी है लेकिन दुनिया की सबसे गंदी नदियों में भी एक बताई जाती है.

गंगा के प्रदूषण और गंदगी से निपटने के लिए दशकों से योजनाएं बनाई जाती रही हैं. नमामि गंगे नाम से एक विराट सफाई अभियान मौजूदा केंद्र सरकार ने शुरू किया है.

पिछले ही महीने केंद्र ने 1900 करोड़ रुपए की परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई है. इन 20 परियोजनाओं में से 13 उत्तराखंड में हैं. लेकिन हिंदू धार्मिक मान्यताओं में मोक्षदायिनी कही जाने वाली गंगा को अपनी वास्तविक मुक्ति की तलाश है.

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