'बूचड़ख़ाने बंद हुए तो हिंदू-मुसलमान दोनों का जाएगा रोज़गार'

चमड़ा उद्योग मे रोज़ार

उत्तर प्रदेश में बूचड़ख़ानों के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाई से मांस व्यवसाय पर निर्भर मुसलमान ही नहीं, लाखों दलितों की रोज़ी-रोटी पर भी सवालिया निशान लग गया है.

बूचड़ख़ानों और चमड़ा उद्योग में मुसलमानों के अलावा दलितों की एक बड़ी आबादी भी शामिल है.

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ग़ाज़ियाबाद समेत कई जगहों पर बूचड़ख़ाने बंद किए गए हैं. रिपोर्टों के मुताबिक़ मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पुलिस को निर्देश दिए हैं कि 'ग़ैरक़ानूनी' बूचड़ख़ाने बंद किए जाएं.

मेरठ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सतीश प्रकाश ने बीबीसी से कहा, "बूचड़ख़ाने बंद होने का सबसे ज़्यादा असर दलितों पर पड़ेगा. चमड़े का काम दलितों का पुश्तैनी धंधा है, जो वे सदियों से करते आ रहे हैं. बूचड़ख़ाने बंद होने से बड़ी तादाद में दलितों की रोज़ी-रोटी मारी जाएगी."

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कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़, देश के 75 बूचड़ख़ानों में से 38 उत्तर प्रदेश में हैं.

ये वे बूचड़ख़ाने हैं, जिन्हें केंद्र सरकार के कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात प्राधिकरण यानी एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फ़ूड एक्सपोर्ट्स अथॉरिटी (अपेडा) से लाइसेंस मिले हुए हैं.

बूचड़ख़ानों पर संकट

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अल-हिंद एक्सपोर्ट्स के निदेशक लियाक़त अली ने बीबीसी से कहा, "इन बूचड़ख़ानों में मुसलमान तो सिर्फ़ जानवर काटने के ही काम में लगे होते हैं. बाक़ी का सारा काम हिंदू करते हैं."

"माता हमको कहते हो, प्रेरणा गधों से लेते हो?"

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वे आगे कहते हैं, "दरअसल, इस क्षेत्र में हिंदू और मुसलमान मिल कर लगभग दो लाख लोग काम करते हैं, लेकिन तक़रीबन 75 फ़ीसदी कर्मचारी तो हिंदू हैं."

हालांकि मामला इससे आगे बढ़कर है. जानवर पालने वाले और उन पर निर्भर रहने वाले भी सभी समुदाय के हैं. इस मामले में भी हिंदुओं की तादाद ज़्यादा है.

सतीश प्रकाश कहते हैं, "चमड़ा उद्योग से लाखों दलितों का पेट पलता है. इस धंधे पर एक तरह से उनका एकाधिकार रहा है. इस धंधे के बल पर ही उत्तर प्रदेश के दलितों की माली हालत सुधरी और कुछ काफ़ी संपन्न हो गए."

उन्होंने आगे जोड़ा, "दलित हापुड़ की मंडी से चमड़ा ले आते हैं तो कई बार पुलिसवाले उन्हें परेशान करते हैं, मारपीट की वारदात भी हुई है. ऐसे दलितों पर आने वाले समय में संकट बढ़ेगा, उन्हें और ज़्यादा परेशान किया जाएगा, इसकी पूरी आशंका है."

गाय-भैंस पालने और उसके दूध के व्यवसाय में लाखों लोग जुड़े हुए हैं, उन्हें भी दिक़्क़त होगी.

लियाक़त अली कहते हैं, "दो-तीन बार बच्चे जनने के बाद गाय-भैंस की उपयोगिता नहीं बचती है. उन्हें पालने पर महीने में कम से कम 400 रुपए ख़र्च बैठता है. उस जानवर को बेच कर जो पैसे मिलते हैं, उससे किसान पूरा ख़र्च निकाल लेता है. यदि वह जानवर न बिके तो वह घाटे में रहेगा. फिर वह जानवर नहीं पालेगा."

राज्य में ग़ैर-क़ानूनी बूचड़ख़ाने भी हैं. इनके पास लाइसेंस नहीं हैं क्योंकि इनमें से अधिकांश ने नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल की अनुमति नहीं ली है.

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जिनके पास लाइसेंस हैं, उनमें से ज़्यादातर के लाइसेंस 2017 में ख़त्म हो जाएंगे. कुछ दूसरों के लाइसेंस 2018, 2019 और 2020 में ख़त्म हो रहे हैं.

लियाक़त अली का आरोप है कि लाइसेंस की अवधि ख़त्म होने के बाद उसका नवीकरण नहीं किया जाएगा. उसके बाद वे भी ग़ैरक़ानूनी माने जाएंगे और फिर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई आसान हो जाएगी.

इंडियन फूड्स एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक अशोक यादव ग़ैरक़ानूनी बूचड़ख़ानों को बंद करना ग़लत नहीं मानते.

गिरेगा निर्यात

उन्होंने बीबीसी से कहा, "ग़ैरक़ानूनी तो चीज़ ही ग़लत है, चाहे वह किसी भी उद्योग में हो. ग़ैरक़ानूनी कारोबार को बंद करने को हम ग़लत नहीं कह सकते."

बीफ़ व्यवसायियों की वेबसाइट बी़फ़टूलिव.कॉम के मुताबिक़, ''भारत बीफ़ उत्पादन में दुनिया में पांचवे नंबर पर है, लेकिन निर्यात में वह बीते साल तक दूसरे नंबर पर था. समझा जाता है कि 2017-18 के वित्तीय साल में ब्राज़ील से आगे निकल जाएगा.''

भारत से बीफ़ निर्यात से तक़रीबन 27,000 करोड़ रुपए की सालाना कमाई होती है, उत्तर प्रदेश के बीफ़ निर्यातकों के हिस्से तक़रीबन 15,000 करोड़ रुपए आते हैं.

इसके अलावा तक़रीबन 3,000 करोड़ रुपए के बीफ़ की खपत देश में होती है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह खपत काफ़ी कम है.

बीफ़ उत्पादन में भारत पूरी दुनिया में पांचवे नंबर पर है. पहले नंबर पर अमरीका और दूसरे पर चीन हैं. इन दोनों ही देशों में बीफ़ की खपत भी बहुत ज़्यादा है.

बीफ़ उद्योग पर निर्भर है चमड़ा उद्योग और चमड़ा उद्योग में उत्तर प्रदेश पूरे भारत में अव्वल है.

उत्तर प्रदेश में छोटी बड़ी चमड़ा ईकाइयों की तादाद 11,000 से भी ज़्यादा है. इनमें से अधिकतर ईकाइयां कानपुर और आगरा में हैं.

वाणिज्य मंत्रालय का अनुमान है कि चमड़ा उद्योग पूरे देश में लगभग 20 लाख लोगों को रोज़गार देता है. उत्तर प्रदेश में इस उद्योग में सीधे और परोक्ष रूप से लगभग 10 लाख लोग जुड़े हुए हैं.

सतीश प्रकाश कहते हैं, "खाल निकालने से लेकर उसकी सफ़ाई, रसायन डालने, चमड़ा पकाने वग़ैरह के काम में दलित पूरी तरह जुटे हुए हैं. चमड़े का सामान बनाने में उन्हें महारत हासिल है. वे बेरोज़गार हो जाएंगे."

चमड़ा उद्योग पर संकट

चमड़ा उद्योग में पूरे देश में कुल निवेश 5,322 करोड़ रुपए का है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, वित्तीय वर्ष 2014-15 में चमड़ा के सामान का निर्यात 94.20 करोड़ डॉलर हुआ था.

मुख्य निर्यात- जर्मनी, अमरीका, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, हॉन्ग कॉन्ग, स्पेन, संयुक्त अरब अमीरात को होता है.

अशोक यादव कहते हैं, "मामला सिर्फ़ मांस या बूचड़ख़ानों का नहीं है. इस धंधे से जुड़े ढेर सारे दूसरे धंधे हैं, जो पूरी तरह बूचड़ख़ानों पर निर्भर हैं. उनमें लाखों लोगों का पेट पलता है. वे बेचारे कहां जाएंगे?."

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उत्तर प्रदेश में नई सरकार आने के बाद जिस तरह कई जगहों पर छापे पड़े और कई ग़ैरक़ानूनी बूचड़ख़ाने बंद हुए हैं, उससे पूरे उद्योग के लोग डरे हुए हैं.

लियाक़त कहते हैं, "हमें निशाना बनाया जा रहा है. इस धंधे में सभी समुदायों के लोग मिल कर काम करते हैं, पर छवि ऐसी बना दी गई है कि एक समुदाय विशेष का ही काम है."

लेकिन दूसरे लोग सरकार को पूरा समय देना चाहते हैं और उसकी मंशा पर फ़िलहाल सवालिया निशान लगाने से बच रहे हैं.

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अशोक यादव ने कहा, "अब तक क़ानूनी रूप से चलने वाले किसी बूचड़ख़ाने के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई है. इसलिए हम सरकार की मंशा के बारे में कैसे कहें?"

लेकिन मोटे तौर पर लोग यह मान रहे हैं कि यह आर्थिक और व्यवासायिक मामला है और इससे लाखों लोग जुड़े हुए हैं. किसी भी सरकार को यह ध्यान में रखना चाहिए.

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