नज़रिया: 'सरकार का मक़सद पारदर्शी राजनीतिक फ़ंडिंग नहीं'

  • 23 मार्च 2017
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वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चुनावी राजनीति से काले धन को ख़त्म करने और फंडिंग को पारदर्शी बनाने के लिए जो विधेयक पारित किया है, वह अपने मक़सद में पूरी तरह नाकाम होगा.

इन क़दमों से न पारदर्शिता बढ़ेगी, न काले धन को रोकने में कोई मदद मिलेगी. स्थितियां जैसी हैं, वैसी ही रहेंगी.

वित्त मंत्री ने जो अधिनियम पेश किया, उसमें बग़ैर नाम बताए राजनीतिक दलों को चंदा देने की पहले 20,000 रुपये देने की छूट थी, इसे घटा कर 2,000 रुपये कर दिया गया है.

जब देने वालों के नाम उजागर नहीं होंगे तो पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी. राजनीतिक दल पहले जो रक़म एक आदमी के नाम से दिखाते थे, अब वही रक़म 10 लोगों के नाम बता देंगे.

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कंपनियों को 'छूट'

राजनीतिक दल आयकर विभाग को स्रोत नहीं बताएंगे, यह गोपनीय रहेगा. इससे कालेधन के बेजा इस्तेमाल पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

इसी तरह एक व्यवस्था यह की गई है कि कॉरपोरेट घराने अब राजनीतिक दलों को चेक के ज़रिए पैसे देंगे.

लेकिन वे अपने बैलेंस शीट में इसका उल्लेख करें, इसका इंतजाम नहीं है. पहले कंपनियां अपने कारोबार का 7.5 फ़ीसद तक चंदे के रूप में दे सकती थीं.

यह सीमा ख़त्म कर दी गई है. कंपनियों के पास देने के लिए अधिक पैसे होंगे लेकिन अपने बैलेंस शीट में वे इसके बारे में बताने के लिए बाध्य नहीं होंगे.

इससे पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी. फंडिंग पहले की तरह ही होता रहेगा.

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इलेक्टोरल बॉन्ड

बिल में यह व्यवस्था की गई है कि राजनीतिक दल किसी बैंक में एक खाता खोलें, लोग उसमें इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदन के नाम पर पैसे डाल सकते हैं.

लेकिन इस मामले में भी राजनीतिक दलों को यह बाध्यता नहीं होगी कि वे उन लोगो के नाम बताएं.

इससे पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी.

इससे यह भी साफ़ है कि राजनीतिक दलों को होने वाली फंडिंग की पारदर्शिता भी नहीं बढ़ेगी.

इससे ऐसा लगता है कि मोदी की तमाम बातें सिर्फ़ कहने के लिए हैं.

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मनी बिल

वित्त मंत्री ने इन प्रावधानों से जुड़े विधेयक को मनी बिल के रूप में लोकसभा में पेश किया. मनी बिल को राज्यसभा से पारित कराना ज़रूरी नहीं होता.

इससे ऐसा लगता है कि सरकार राज्यसभा में इस पर बहस नहीं चाहती. लोकसभा में भी सरकार ने इस अधिनियम पर कोई बहस नहीं कराई.

इन बातों से सभी राजनीतिक दलों को फ़ायदा होगा. लेकिन यह साफ़ है कि सबसे बड़ा राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी है. ज़ाहिर है, उसे ही सबसे ज़्यादा फ़ायदा होगा.

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काला धन यानी नकदी

नोटबंदी के समय सरकार का कहना था कि इससे काला धन ख़त्म हो जाएगा. दरअसल, सरकार यह मानती है कि काला धन सिर्फ नक़द में होता है.

ऐसा नहीं है. सारा काला धन नक़द में नहीं होता, सारा नकद भी काला धन नहीं होता है.

नोटबंदी के बाद लोगों ने अपने काले धन को सोना-चांदी, गहने, हीरे-जवाहिरात में बदल लिए.

ऐसा लगता है कि सरकार सिर्फ़ दिखावे के लिए यह सब कर रही है, काले धन को ख़त्म करने या राजनीतिक फंडिंग को पारदर्शी बनाना उसका मूल मक़सद नहीं है.

(ये परंजॉय गुहा ठाकुरता के निजी विचार है और ये लेख बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्या की उनसे बातचीत पर आधारित है)

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