पूर्वांचल को एंसेफ़ेलाइटिस से बचा पाएंगे योगी?

  • 24 मार्च 2017
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गोरखपुर में हैदरगंज की सुधा देवी तीन साल पहले हुई अपने बेटे सनी की मौत को याद करके फूट-फूट कर रोने लगती हैं, "अचानक बुखार आ गया, दो-तीन दिन तक यहां दिखाए, आराम नहीं लगा. फिर मेडिकल कॉलेज ले गए, पंद्रह दिन तक इलाज चला, हाथ-पैर ऐंठने लगा और फिर मर गया. डॉक्टर लोग बचा नहीं पाए हमारे बाबू को."

नौ साल का सनी भी उसी एंसेफ़ेलाइटिस नामक बीमारी का शिकार हो गया था जिसने क़रीब चार दशक से इस इलाक़े में क़हर ढा रखा है.

पूर्वांचल के कई ज़िलों में मई जून से लेकर अक्टूबर नवंबर तक इस बीमारी का प्रकोप रहता है और हर साल सैकड़ों बच्चों की इससे मौत हो जाती है या फिर इसकी चपेट में आकर तमाम बच्चे विकलांग हो जाते हैं.

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इस बीमारी के उन्मूलन और इससे बचाव के लिए काफी दिनों से सक्रिय गोरखपुर के डॉक्टर आरएन सिंह कहते हैं, "अकेले गोरखपुर ज़िले में पांच सौ-छह सौ बच्चों की मौत होती है और ये आंकड़े सिर्फ़ मेडिकल कॉलेज के हैं, दूसरे अस्पतालों के नहीं. यदि प्रभावित 10-12 ज़िलों को मिला दिया जाए तो कम से कम पांच हज़ार बच्चे हर साल इस बीमारी से मरते हैं."

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पूर्वांचल में महामारी का रूप ले चुकी ये बीमारी गोरखपुर, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, कुशीनगर, देवरिया, मऊ समेत क़रीब दर्जन भर ज़िलों में हर साल सैकड़ों बच्चों को निगल जाती है.

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जानकारों के मुताबिक इस बीमारी में मृत्यु दर क़रीब तीस प्रतिशत है, यानी सौ में से तीस लोगों को ये बीमारी मौत दे जाती है. बीमारी ज़्यादातर बच्चों को प्रभावित करती है और इस बीमारी में मौत से बच गए बच्चे आजीवन विकलांगता तक के शिकार हो जाते हैं.

बुखार के रूप में शुरू होने वाली इस बीमारी के वायरस का मुख्य कारण मच्छरों को माना जाता है और डॉक्टरों के मुताबिक अब तक इसका कारगर इलाज संभव नहीं हो पाया है, सिर्फ़ बचाव और रोकथाम ही एकमात्र रास्ता है.

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डॉक्टर आरएन सिंह कहते हैं कि इसके लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम की ज़रूरत है जो बनाया भी गया था लेकिन आजतक वो लागू नहीं हो पाया.

गांव में जागरूकता के तमाम संदेश भी पढ़ने को मिलते हैं. साफ़-सफ़ाई के लिए ये संदेश सरकारी विभागों की ओर से जारी किए जाते हैं. लोगों से ख़ुद सफ़ाई रखने की अपील की जाती है और सरकारी स्तर पर दवाइयां छिड़काई जाती हैं. लेकिन साफ़ सफ़ाई की स्थिति पूरे इलाक़े में काफी दयनीय है.

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हैदरगंज के लोग कहते हैं कि पिछले दस साल से यहां पर किसी भी दवा का छिड़काव नहीं किया गया. न तो नालियों, सड़कों की कोई सफ़ाई होती है और न ही मच्छरों की रोकथाम के लिए कुछ किया जाता है.

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गांव वालों के मुताबिक जितना संभव होता है, लोग ख़ुद ही अपने-अपने घरों में सफ़ाई की व्यवस्था रखते हैं

गांव वालों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर स्वच्छता अभियान चलने के बावजूद क़रीब चार हज़ार की उनकी आबादी में एक भी शौचालय सरकारी स्तर पर नहीं बना है.

कुछ लोगों ने ख़ुद ही बनवाए हैं और बाक़ी खुले में शौच जाते हैं. यही नहीं, बच्चों के बीमार होने पर भी लोग इधर उधर भटकते हैं जबकि गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में इस बीमारी के लिए ख़ासतौर पर व्यवस्था रहती है.

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गोरखपुर के सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र श्रीवास्तव पिछले कई साल से इस बीमारी को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं.

वो बताते हैं कि आज भी लोगों में जागरूकता की कमी है. बुखार होने पर तीन-चार दिन स्थानीय स्तर पर ही लोग बिता देते हैं जबकि यदि शुरुआत में ही मेडिकल कॉलेज ले जाएं तो शायद समुचित इलाज हो जाए.

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गर्मी की शुरुआत होते ही एंसेफ़ेलाइटिस का क़हर इलाक़े में शुरू हो जाता है. गोरखपुर से सांसद रहे और अब राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे को कई बार संसद में भी उठा चुके हैं.

उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अब यहां के लोगों की उम्मीद और भी बढ़ गई है कि शायद इसके ख़ात्मे के लिए कोई नई और गंभीर पहल हो.

सुधा देवी कहती हैं, "भाषण में तो योगी जी बहुत कुछ वादा कर गए थे लेकिन इस बीमारी के लिए अगर कुछ कर देते हैं तो हम लोग बहुत एहसानमंद होंगे."

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