ब्लॉग: 'अपवित्र' मांस-व्यापार के ख़िलाफ़ 'पवित्र अभियान'

  • 26 मार्च 2017
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"क्या कर रहे हैं योगी जी यूपी में?" फ़ोन पर सवाल पूछने वाले पुराने परिचित सज्जन हाल ही में सरकारी सेवा से रिटायर हुए हैं और ख़ानदानी तौर पर कांग्रेस के वोटर रहे हैं.

इससे पहले कि मैं कुछ कहता, जवाब उन्हीं की ओर से आया, "बूचड़ख़ानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करके ठीक ही तो कर रहे हैं योगी जी. मुसलमानों में थोड़ा बहुत डर फैलना ज़रूरी है."

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मुझे बरसों पहले कहे गए उन्हीं के शब्द याद हो आए. देश के कई हिस्सों में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों ने उन्हें बेचैन नहीं किया था बल्कि वो इन दंगों को 'कोर्स करेक्शन' की तरह देख रहे थे.

तब भी उन्होंने कहा था, "सरदार कुछ ज़्यादा ही सिर पर चढ़ गए थे. इन्हें थोड़ा-बहुत सबक़ सिखाया जाना ज़रूरी था."

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मेरे यही पुराने पारिवारिक मित्र अपने साथ काम करने वाले दलित कर्मचारियों को कई बार मज़ाकिया लहजे में 'सरकारी दामाद' कहते हैं.

पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह उनके लिए सबसे बड़े खलनायक थे.

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यानी उनके सपनों के भारत में मुसलमानों और सिखों को डर कर रहना होगा, दलितों और पिछड़ों की 'दामाद' जैसी आवभगत नहीं की जाएगी यानी नौकरियों और विश्वविद्यालयों में उन्हें आरक्षण नहीं दिया जाएगा और भारत के पास परमाणु बमों का ऐसा ज़ख़ीरा होगा जो पाकिस्तान और चीन को पलक झपकते ही राख में बदल देगा.

उत्तर प्रदेश में 'अवैध' बूचड़ख़ानों के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाई को योगी के निर्णायक नेता होने के सबूत के तौर पर देखने वाले वो अकेले नहीं हैं.

दिल्ली में ऊबर टैक्सी चला रहे एक ड्राइवर ने भी बातचीत के दौरान कहा, "काम होगा जी, काम होगा. अब देखो ना, बूचड़ख़ाने बंद तो कर रहे हैं योगी जी. और भी काम होंगे."

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और काम हो रहे हैं. आदित्यनाथ योगी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी के चुनावी वादों को लागू करना शुरू कर दिया है.

बूचड़ख़ानों के साथ साथ रेस्तराओं, पार्कों, गलियों, मोहल्लों में ख़ाकी वर्दीधारियों की कुमुक नौजवान लड़कों-लड़कियों को रोककर उनके आइडेंटिटी कार्ड देख रही है, उनसे कान पकड़ कर उठक बैठक करवा रही है और नैतिकता के सबक़ सिखा रही है.

लेकिन अगर आप स्कूल या कॉलेज जाने वाली किसी किशोर लड़की के पिता से कहें कि योगी का ये फ़ैसला मानवाधिकारों का हनन कर रहा है, तो वो सबसे पहले आपके मानवाधिकारों का हनन करने को तैयार हो जाएगा.

पर ये सच है कि जो काम अब तक 'वैलेंटाइंस डे' को बजरंग दल और हिंदू सेना जैसे संगठनों के भगवा पटके पहने कार्यकर्ता किया करते थे, उस काम को अब राष्ट्र-राज्य और उसकी पुलिस पूरी तरह क़ानून के दायरे में संपन्न कर रही है और इसे लोगों का समर्थन हासिल हो रहा है.

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योगी प्रशासन को बहुत अच्छी तरह मालूम है कि, अगर यूपी पुलिस इसे हफ़्ता वसूली का ज़रिया न बना ले तो इससे सरकार की लोकप्रियता बढ़ेगी ही.

चुनावी वादों को लागू करने में बीजेपी गंभीर नज़र आ रही है. बीजेपी नेताओं ने हर मंच से यूपी को वोटरों को वचन दिया था कि वो तुष्टीकरण नहीं करेगी.

अगर क़ब्रिस्तान के लिए ज़मीन मिलती है तो श्मशान के लिए भी मिलेगी. पार्टी को उत्तर प्रदेश के चार करोड़ मुसलमानों में से विधानसभा भेजे जाने लायक़ एक भी मुसलमान नहीं मिला. या यूँ कहें कि ढूँढने की ज़रूरत ही महसूस नहीं की गई.

चुनाव के नतीजे आने पर ये साबित हो गया कि मुसलमानों की 'टैक्टिकल वोटिंग' किसी काम की नहीं रही और ये भी कि हिंदुत्ववादी बीजेपी को अपनी राजनीतिक सफलता के लिए मुसलमानों की ज़रूरत नहीं है.

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जिन मुसलमानों को अब तक इंदिरा गांधी की कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, उससे पहले भारतीय लोकदल, दमकिपा (दलित मज़दूर किसान पार्टी) आदि पार्टियाँ अपने साथ रखना ज़रूरी समझती थीं, उन्हें बीजेपी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण से बाहर कर ही चुकी है.

और अब मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने ऐलान कर दिया है कि अवैध बूचड़ख़ानों को गंदगी फैलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.

मेरठ विश्वविद्यालय के डॉक्टर सतीश प्रकाश इसे सीधे सीधे मुसलमानों और दलितों के रोज़गार के ज़रिए पर चोट मानते हैं.

उनका कहना है कि मांस और चमड़े के व्यापार से लाखों मुसलमान और दलित जुड़े हैं और सरकार के फ़ैसले से उनके रोज़गार पर असर पड़ेगा.

पड़ता रहे, पर बीजेपी और संघ परिवार के नीतिनिर्धारकों को मालूम है कि बूचड़ख़ानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई से एक प्रतीकात्मक संदेश भी उपजता है.

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रुझानों में शुरुआती बढ़त मिलने के बाद बीजेपी कार्यकर्ता खुशी में अबीर गुलाल खेलते हुए.

ये प्रतीक है अपवित्रता के विरुद्ध पवित्रता के पक्षधर का अभियान. पशुमांस का धंधा करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई यानी एक क़िस्म की अपवित्रता के विरुद्ध गोरखनाथ मठ के मठाधीश का पवित्र अभियान.

मांस भक्षण को घोर पाप और गलीज़ कर्म मानने वाले समुदायों के लिए बूचड़ख़ाने बंद होना रामराज्य की पहली आहट जैसा है.

उस पर अगर मेरे पुराने परिचित और दिल्ली के ऊबर ड्राइवर तक ये संदेश जा रहा है कि अपवित्रता के विरुद्ध योगी के इस पवित्र अभियान से 'मुसलमानों में डर' फैल रहा है तो गोरखनाथ मठ के मठाधीश का आधा काम आसान हो गया है.

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