मधु किश्वर: कान में उंगली डालना भी बलात्कार हो जाएगा?

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"साल 2013 में कड़ा किए जाने के बाद से भारत के बलात्कार विरोधी क़ानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए किया जा रहा है."

ऐसा मानना है 'मानुषी' पत्रिका की संस्थापक और आईसीएसएसआर में नेशनल प्रोफ़ेसर मधु किश्वर का.

जिन्होंने क़ानून के कई प्रावधान हटाने की मांग करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है.

किश्वर के मुताबिक जब तक इन ग़लत मामलों में आरोपी बरी होता है, उस आदमी की ज़िंदगी तबाह हो जाती है ख़ास तौर पर इस वजह से क्योंकि पीड़िता की तरह उसकी पहचान छिपाने का कोई प्रावधान नहीं है.

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कैसी हिंसा को बलात्कार माना जाए?

मधु किश्वर कहती हैं कि क़ानून की परिभाषा इस व़क्त ऐसी है कि "अगर कोई आदमी किसी औरत के कान में उंगली डाले तो उसे भी बलात्कार माना जा सकता है."

ऐसा कोई मामला भारत की किसी अदालत में नहीं आया है लेकिन किश्वर मानती हैं कि बलात्कार की परिभाषा का दायरा इतना बड़ा है कि आनेवाले दिनों में ऐसा हो भी सकता है.

क्या नया है बलात्कार विरोधी क़ानून में

साल 2013 में लाए गए बदलावों से पहले क़ानून में बलात्कार की परिभाषा थी 'ज़बरदस्ती किया गया संभोग'.

2013 में इसका दायरा बढ़ाकर इसमें औरत के शरीर के किसी भी हिस्से में (इसमें औरत का मुंह भी शामिल हो सकता है यानी 'ओरल या एनल पेनेट्रेशन') कोई चीज़ डालना या शरीर का कोई भी अंग (जैसे आदमी की उंगली) डालना बलात्कार माना जाएगा.

किश्वर के मुताबिक इस परिभाषा के तहत जबरन चुंबन या गले लगाने को भी बलात्कार की शिकायत के तौर पर अब पेश किया जा रहा है.

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'झूठे मामले'

दिल्ली महिला आयोग के एक सर्वे का हवाला देते हुए मधु किश्वर कहती हैं कि उसमें पाया गया कि बलात्कार की 53 फ़ीसदी शिकायतें झूठी थीं.

किश्वर के मुताबिक कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें, "औरत कहती है कि वो एक आदमी से यौन संबंध सिर्फ़ इसलिए बना रही थी क्योंकि उसने उनसे शादी करने का वादा किया था और वादे से मुकरने पर अब उस संबंध को जबरन बनाया संबंध यानी बलात्कार माना जाए."

मुंबई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने दो अलग मामलों में दिए अपने फ़ैसलों में साफ़ किया है कि शादी के वादे से पलटने के हर मामले को बलात्कार की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता.

उसे बलात्कार तभी माना जाएगा जब औरत से झूठ बोलकर संबंध बनाया गया हो, मसलन उसे ये बताए बग़ैर कि आदमी पहले से शादीशुदा है या उसके अनपढ़ होने का फ़ायदा उठाते हुए उसे धोखे में रखने से.

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यौन संबंध बनाने के लिए औरत की सहमति

मधु किश्वर के मुताबिक मौजूदा क़ानून में औरत के बयान को बहुत अहमियत दी गई है और यौन संबंध बनाने में उसकी सहमति को कड़े तरीके से परिभाषित किया गया है.

वो कहती हैं, "क़ानून कहता है कि एकदम साफ़ तौर पर औरत की सहमति थी ये साबित होना चाहिए, तो क्या आदमी अब सीसीटीवी कैमरे लगाकर रखें ताकि अपनी बेगुनाही साबित कर सकें?"

बलात्कार क़ानून पर सुधार के लिए गठित की गई जस्टिस वर्मा समिति के मुताबिक 'सहमति' साबित करने के लिए अक़्सर ये देखा जाता रहा कि औरत के शरीर पर झगड़ा करने के कोई निशान हैं, वो चिल्लाईं या नहीं वगैरह.

समिति ने कहा कि नई समझ ये कहती है कि औरतें अक़्सर ऐसी हिंसा के सामने कुछ कह नहीं पातीं या मौत के डर से उस व़क्त झगड़ा नहीं करतीं इसीलिए इसे बदलकर 'साफ़ सहमति' को ज़्यादा तरजीह दी जाए.

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कम से कम सज़ा का प्रावधान

बलात्कार-विरोधी क़ानून में पहले कोई न्यूनतम सज़ा का प्रावधान नहीं था.

साल 1983 में क़ानून में बलात्कार के लिए कम से कम सात साल की सज़ा और 'अग्रेवेटेड असॉल्ट' यानी ज़्यादा जघन्य मामलों में न्यूनतम 10 साल की सज़ा का प्रावधान डाल दिया गया.

लेकिन इसमें जज को अपनी समझ के आधार पर न्यूनतम से कम सज़ा देने की आज़ादी भी दी गई. इस आज़ादी को साल 2013 के बदलावों में हटा दिया गया.

अपनी जनहित याचिका में किश्वर ने इसकी निंदा करते हुए ये कहा है कि हर बलात्कार के लिए न्यूनतम सज़ा दी जाए ये ज़रूरी नहीं है, क्योंकि कई बार हिंसा का स्तर कम होता है.

हालांकि दिल्ली की 'नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी' के एक शोध में ये पाया गया कि जज कई बार इस 'आज़ादी' का इस्तेमाल कर तुच्छ आधार पर कम सज़ा का फ़ैसला देते रहे हैं.

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नाबालिग के बीच यौन संबंध

अपनी याचिका में किश्वर ने 16 से 18 साल की उम्र के किशोरों के बीच यौन संबंध के बलात्कार के दायरे में लाए जाने का मुद्दा भी उठाया है.

उनके मुताबिक इससे कम उम्र के लड़कों को सहमति से बनाए रिश्तों के लिए भी गिरफ़्तार कर सज़ा दी जा रही है.

साल 2013 में यौन संबंध के लिए सहमति देने की उम्र को 16 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दिया गया था. इसका असर ये है कि 16 से 18 साल की उम्र में सहमति से किए संभोग को भी बलात्कार करार किया जा सकता है.

इस जनहित याचिका पर अदालत ने अब केंद्र सरकार से जवाब मांगा है.

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