नगा समस्या का समाधान संभव है अब?

  • 31 मार्च 2017
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Image caption मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह

मणिपुर में बीजेपी के सरकार बनाने में सफल होने से 60 साल पुरानी नगा समस्या के समाधान का रास्ता बन गया है.

उत्तर पूर्व के असम और अरुणाचल प्रदेश में पहले ही बीजेपी की सरकार है और नगालैंड में भी उसकी मौजूदगी सत्ताधारी गठबंधन में छोटे सदस्य की है. ऐसे में लग रहा है कि भारत की एक पुरानी समस्या के खत्म होने की ज़मीन तैयार हो गई है.

हालांकि यह तभी हो सकता है जब नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) का इसाक मुइवा गुट 'नगालिम' की अपनी मांग छोड़ दे. 'नगालिम' यानी ग्रेटर नगा राज्य जिसका मतलब है मणिपुर, असम, और अरुणाचल प्रदेश के नगा बहुल इलाक़ों का नगालैंड में विलय.

ऐसा इसलिए है क्योंकि असम और मणिपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विधानसभा चुनाव के दौरान लगातार ये कहते रहे कि नगा समस्या के समाधान के लिए उत्तर पूर्व के राज्यों का पुनर्गठन नहीं होगा.

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दो साल पहले हुआ था समझौता

अगस्त 2015 में एनएससीएन और मोदी सरकार के बीच हुए समझौते को दोनों पक्षों ने फिलहाल पर्दे में ही रखा है.

लेकिन हाल ही में मणिपुर के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि इस समझौते में मणिपुर के हितों के खिलाफ़ कुछ भी नहीं है.

बीजेपी को मैतेई और कुकी इलाक़ों में काफी सीटें मिली हैं क्योंकि ये दोनों समुदाय मणिपुर के इलाक़ों का 'नगालिम' में विलय का विरोध करते हैं और इन लोगों ने मोदी पर भरोसा किया.

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Image caption फाइल फोटो

मुइवा के एलान पर विवाद

अब एनएससीएन के प्रमुख थुइंगलेंग मुइवा ने ये कह कर मोदी के पांव के नीचे से ज़मीन खींच ली है कि भारत सरकार ने ग्रेटर नगालैंड की उनकी मांग को मंज़ूरी दे दी है.

मुइवा के इस एलान ने एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है. कांग्रेस नेताओं ने "सच्चाई को तुरंत सामने लाने" की मांग की है. कांग्रेस सांसद अधीर चौधरी ने संसद में कहा,"देश नगा समझौते का सच जानना चाहता है."

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उधर असम में पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत इस प्रकरण से काफी गुस्से में हैं. उन्होंने कहा, "हमारे पीछे कुछ हो रहा है, हम जानना चाहते हैं कि केंद्र नगा विद्रोहियों को क्या देने पर रजामंद हुआ है."

प्रफुल्ल महंत की असम गण परिषद बीजेपी के साथ सत्ताधारी गठबंधन में शामिल है.

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Image caption मणिपुर में पूर्व मुख्यमंत्री इकराम इबोबी सिंह

मणिपुर नहीं होगा तैयार

मणिपुर में पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह फिलहाल शांत हैं लेकिन उनके समर्थक मणिपुर का कोई हिस्सा नगालिम को दिए जाने की स्थिति में बीजेपी के खिलाफ़ मोर्चा खोलने को तैयार बैठे हैं.

केंद्र सरकार ने इन ख़बरों को "ग़लत" बताते हुए कहा कि ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है.

गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि ऐसी कुछ रिपोर्टें आई हैं कि भारत सरकार बड़े नगालैंड राज्य के लिए पड़ोसी राज्यों के इलाकों को देने पर रजामंद हो गई है, "ऐसी ख़बरें ग़लत हैं और यह स्पष्ट है कि ऐसा कोई समझौता या फैसला भारत सरकार ने नहीं लिया है."

एनएससीएन और भारत सरकार के बीच शुरू से ही बातचीत में पूरी गोपनीयता रखी गई है. ये बातचीत 1997 में शुरू हुई.

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बातचीत का ब्यौरा सार्वजनिक करने के लिए लगातार दबाव होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सरकारों ने इसे पूरी तरह से गोपनीय रखा.

मगर ऐसी ख़बरें आती रही हैं कि इस प्रस्ताव में मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश के नगा इलाक़ों को नगालैंड के साथ रचनात्मक रूप से शिक्षा और संस्कृति के जरिए जोड़ने की बात थी साथ ही नगालैंड को भारतीय राज्यों की तुलना में ज़्यादा अधिकार देने की भी बात कही गई.

भारत सरकार ने मुइवा को ना सिर्फ नगा संप्रभुता की मांग छोड़ने पर रजामंद करने की कोशिश की बल्कि "नगालिम" यानी ग्रेटर नगालैंड की मांग भी छोड़ने को कहा जिसके लिए उत्तर पूर्व का पुनर्गठन करना पड़ता.

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मुश्किल रही है सहमति

वाजपेयी सरकार ने जब नगा संघर्षविराम को दूसरे पड़ोसी राज्यों में लागू करने की कोशिश की तो भारी हिंसा फैली और तब सरकार को अहसास हुआ कि "नगालिम" पर दूसरे राज्यों को तैयार करना कितना मुश्किल है.

तीनों पड़ोसी राज्यों पर बीजेपी का नियंत्रण निश्चित रूप से अंतिम समाधान के लिए मददगार होगा लेकिन केवल तब जब मुइवा नगा संप्रभुता और ग्रेटर नगालैंड की मांग छोड़ दें.

मणिपुर के लोगों से ज़मीन नहीं लेने का वादा करके अगर नरेंद्र मोदी मुइवा की मांग के आगे झुक जाते हैं तो ये आग से खेलने जैसा होगा. क्योंकि मणिपुर की 60 फ़ीसदी ज़मीन नगालैंड में चली जाएगी.

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बीजेपी के लिए चुनौती

अगर मुइवा ये साबित कर दें कि केंद्र सरकार ने उनकी नगालिम की मांग मान ली है तो बीजेपी की गठबंधन सरकार के लिए मणिपुर में बने रहना मुश्किल हो जाएगा.

नगालैंड पीपुल्स फ्रंट के चार विधायक भले ही बीजेपी का समर्थन करें लेकिन मैतेई विधायक और यहां तक कि बीजेपी के विधायकों को लोगों के भारी गुस्से का सामना करना होगा. मोदी की विश्वसनीयता भी दांव पर होगी.

दावों और प्रतिदावों के बीच गृह मंत्रालाय और एनएससीएन ने 2015 के समझौतों और बातचीत का कोई ब्यौरा सार्वजनिक करने की ज़हमत नहीं उठाई है, जबकि इस समझौते को दो साल हो चुके हैं.

हालांकि मुइवा के इस दावे पर कि केंद्र 'नगालिम' पर तैयार है, माहौल गर्म होने के बाद मोदी को शायद समझौतों को लोगों के सामने लाना पड़े ये साबित करने के लिए कि उन्होंने मणिपुर के लोगों से चुनाव प्रचार के दौरान जो कहा वो 'केवल जुमला' नहीं बल्कि सच्चाई थी.

अगर ऐसा नहीं होता तो एक पुराने संकट को खत्म करने का सुनहरा मौक़ा उनके हाथ से निकलने का ज़ोख़िम उनके सामने होगा.

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