'योगी सरकार मीट की दुकानों को बुरा मानती है, तो दूसरा काम दे दे'

  • 30 मार्च 2017
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Image caption शकील अहमद साल 1970 से मीट बेच रहे हैं और उनके पास इसके सिवा कमाई का और कोई ज़रिया नहीं है.

उत्तर प्रदेश में प्रशासन के अवैध बूचड़खानों को बंद करने की कोशिश के बाद अब मांस व्यवसायियों और कसाइयों के पास ना तो काम है ना ही पैसा.

52 साल के शकील अहमद कहते हैं, "मेरी दुकान दो हफ़्ते पहले बंद हो गई और मेरे पास तब से ही पैसा नहीं है. मैं नहीं जानता कि मैं अपने बच्चों और बूढ़े मां-पिता के कहां से खाना लाउंगा."

शकील पूछते हैं, "क्या ये इसलिए कि मैं मुसलमान हूं या फिर इसलिए कि मैं मांस का काम करता हूं?"

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अवैध बूचड़खानों को बंद कराने के योगी सरकार के फ़ैसले से परेशान मीट विक्रेता

वो प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नाराज़ हैं. वैसे योगी अवैध बूचड़खानों के ख़िलाफ़ ही नहीं, बल्कि हिंदू धर्म में पवित्र माने जाने वाली गाय की हत्या और गोमांस का भी विरोध करते हैं.

बीते महीने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में योगी की पार्टी बीजेपी के जीतने के बाद राज्य में प्रशासन ने मीट की कई दुकानें बंद की हैं. मटन और चिकन बेचने वाली छोटी दुकानों को भी बंद किया जा रहा है.

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शकील कहते हैं कि वो बीफ बेचने वाले दुकानों को राज्य सरकार बंद करना चाहती है क्योंकि "ये बीजेपी के चुनावी वायदों में से एक था."

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Image caption शकील अहमद के परिवार में 10 सदस्य हैं और वो 2 कमरों के एक छोटे से घर में रहते हैं.

वो पूछते हैं, "लेकिन बकरे और भेड़ का मांस बेचने वाले छोटे दुकानदारों को क्यों परेशान किया जा रहा है? मेरे जैसे कई कसाई इस काम में दशकों से हैं और इसी से अपना घर चलाते हैं. हमें कुछ और आता ही नहीं."

वो कहते हैं कि हाल में नगर निगम के कर्मचारियों ने उनका लाइसेंस रिन्यू करने से मना कर दिया. वो बताते हैं, "वो चाहते थे कि कचरा फेंकने के लिए एक वेस्ट डिस्पोज़ल यूनिट बनाऊं, लेकिन मेरे पास इसके लिए पैसा नहीं है."

अहमद के परिवार में कुल 10 सदस्य हैं और वो शहर के घनी आबादी वाली जगह पर रहते हैं जहां मुसलमान कुरैशी समुदाय के काफी लोग हैं.

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Image caption फातिमा बेग़म कहती हैं कि उनकी दवाईयां ख़त्म हो रही हैं लेकिन उनके पास और दवाएं खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं.

शकील की मां फातिमा बेग़म बताती हैं कि इस इलाके में रहले वाले समुदाय के लोग पारंपरिक तौर पर मीट व्यवसाय करते हैं.

वो कहती है, "इस इलाके में रहने वाले पुरुषों को कोई दूसरी काम नहीं आता. हम पहले से ही ग़रीब हैं और अब हमें ये भी नहीं पता कि खाना कहां से आएगा. वो लोग हमें मार ही डालें तो अच्छा."

फातिमा कहती हैं कि वो अब बूढ़ी हो गई हैं और उन्हें इस वजह से दवाईयां लेनी पड़ती हैं. वो कहती है, "मेरी दवाईयां भी ख़त्म हो रही हैं और मैंने अभी ये बात अपने बेटे को नहीं बताई है. वो पहले ही परेशान है, मैं उसकी परेशानी बढ़ाना नहीं चाहती."

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Image caption हुस्ना बेग़म कहती हैं कि उन्हें उनके बच्चों की शिक्षा की चिंता है.

शकील की पत्नी हुस्ना बेग़म को अपने बच्चों की चिंता सता रही है, "मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चों को अच्छी तालीम मिले और वो ग़रीब बन कर ना रहें. अगर सरकार को लगता है की मीट की दुकानें बुरी हैं तो वो हमें कोई दूसरा काम दे दें."

वो पूछती हैं, "क्या अपने बच्चों की पढ़ाई के बारे में सोचना ग़लत हैं? "

'मैं डरा हुआ हूं'

शकील के घर से थोड़ी दूरी पर रहते हैं मोहम्मद शरीक जिन्होंने अपनी दुकान बंद कर दी है. वो कहते हैं, "मेरे पास दुकान चलाने के लिए ज़रूरी लाइसेंस है लेकिन मुझे डर है कि दक्षिणपंथी समूह हमला कर सकते हैं."

शरीक का डरना बेबुनियाद नहीं है. मीडिया में छपी ख़बरों के अनुसार बीते दो हफ्तों में राज्य में कई मीट की दुकानों पर हमले हुए हैं.

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Image caption मोहम्मद शरीक कहते हैं को आजकल वो चिकन तक नहीं बेच पा रहे

शरीक मुझे अपने घर ले गए और उन्होंने मुझसे पूछा, "ज़रा मेरे घर पर नज़र डालिए. मेरा घर पहले ही टूटा-फूटा है. मुझे दस लोगों का पेट पालना है. हमारी कमाई का एकमात्र ज़रिया था मीट बेचना, इसे बंद करना क्या सही है?"

उनके भाई पी कुरैशी और घर के अन्य सदस्य भी बातचीत में हिस्सा लेने के लिए आगे आने लगे.

सभी को अपने भविष्य की चिंता है.

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Image caption पी कुरैशी के परिवार में 10 सदस्य हैं और को घर के अकेले कमाई करने वाले सदस्य हैं.

कुरैशी कहते हैं, "मैं उम्मीद करता हूं और प्रार्थना करता हूं कि हमारे मुख्यमंत्री हमारी समस्याओं को समझें और लोगों को अपने नाम का ग़लत इस्तेमाल ना करने दें. हमें पता कि आधिकारिक तौर पर बकरे और भेड़ का मीट बेचना ग़ैर-कानूनी नहीं है, लेकिन फिर भी हम डरे हुए हैं. "

इस इलाके के हर घर की कहानी कुछ ऐसी ही है.

अब्दुल कुरैशी अपने साइकिल रिक्शा में जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं. वो कहते हैं, "मीट पर बैन लगाना कहां तक सही है, हिंदू भी तो मीट खाते हैं?"

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Image caption बीते 10 दिनों से अब्दुल कुरैशी काम करने के लिए बाहर नहीं निकले हैं.

अब्दुल कुरैशी कहते हैं, "इस बाज़ार में आने वाले अधिकतर ग्राहक हिंदू हैं. भारतीय सेना के लोग भी हमारी दुकानों से मीट खरीदने आते हैं. मुझे नहीं समझ आता कि खाने के एक सामान पर बैन लगाने से कैसे साबित होता है कि कोई कम तो कोई ज़्यादा धार्मिक है."

'केवल मुसलमान नहीं हैं प्रभावित''

यहां के समुदाय के नेता गुल़ज़ार कुरैशी बताते हैं, "लोग ये नहीं समझते कि ये कोई मुसलमानों की समस्या नहीं है. अधिकतर लोग जो बकरे या भेड़ पालते हैं वो हिंदू हैं."

वो कहते हैं, "मैं ऐसे कई हिंदुओं को जानता हूं जो अपने जानवर बेचने के लिए अपने गांवों से यहां आए थे और अब फंस गए हैं."

ऐसे ही एक व्यक्ति हैं चुन्नी लाल.

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Image caption चुन्नी लाल बताते हैं कि वो दशकों से अपने जानवर मुसलमानों को बेचते आए हैं.

चुन्नी लाल कहते हैं, "मेरे पास अपनी पांच बकरियों को चारा खिलाने के लिए पैसा नहीं हैं. लेकिन अब कोई इन्हें खरीदना नहीं चाहता."

गुल़ज़ार कुरैशी कहते हैं जो लोग समझते हैं कि मीट व्यवसाय पर उग्र रवैए से केवल कसाई और बूचड़खानों के मालिकों पर ही असर हुआ है, वो ग़लत हैं.

वो कहते हैं, "पशु पालने वाले, जानवर खरीदने वाले मिडलमैन और कसाई सभी इससे प्रभावित हैं. जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले रिक्शा और चमड़े के काम में लगे लोगों के पास भी आज काम नहीं है."

वो कहते हैं, "हम वो चकमती सड़कें और स्कूल नहीं मांग रहे. हमें वो थोड़ी ही कमाई करने दें जो हम अपने बच्चों के लिए करते हैं. मुझे लगता है एक नागरिक के तौर पर अपनी सरकार से इतने की उम्मीद तो की जा सकती है."

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