क्या अपने आख़िरी सालों में अकेले पड़ गए थे गांधी?

महात्मा गांधी जैसा मास अपील वाला लीडर भारतीय उपमहाद्वीप में कोई दूसरा नहीं था. ऐसा बहुतेरे इतिहासकारों का मानना रहा है.

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क्या ऐसा शख़्स भी कभी अकेलेपन से घिर गया था? क्या महात्मा गांधी के जीवन के अंतिम वर्षों का इतिहास उनके अकेलेपन को भी सामने लाता है?

महात्मा गांधी की दुर्लभ तस्वीरें

कैसे बीता था महात्मा गांधी का आख़िरी दिन?

लेखन के लिए केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य का नाटक 'बापू' महात्मा गांधी के अंतिम वर्षों के अकेलेपन पर आधारित है.

वे दावा करते हैं कि उनका नाटक पूरी तरह ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है.

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महात्मा गांधी पर केंद्रित यह नाटक और दूसरे कार्यक्रमों का आयोजन पटना की नाट्य संस्था नटमंडप द्वारा चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के मौके पर पटना के प्रेमचंद रंगशाला में हो रहा है.

क्या कहा था महात्मा गांधी ने गोरक्षा पर

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1917 में 10 अप्रैल को मोहन दास करमचंद गांधी बिहार के चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के सवाल पर पटना पहुंचे थे. और माना जाता है कि चंपारण में उनके सत्याग्रह ने मोहनदास को महात्मा गांधी में ढालना शुरू किया था.

नंदकिशोर बताते हैं, ''यह नाटक एक महान व्यक्तित्व के जीवन की त्रासदी है. इसमें अपने साथियों से एकल संवाद करते हुए आत्मचिंतन करते हैं. यह नाटक बताता है कि भारत की आज़ादी के ठीक पहले और बाद कैसे गांधी के सबसे करीबी साथी भी उनका कहा मानने और करने को तैयार नहीं थे.''

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नाटक के एक शुरुआती वक्तव्य में बापू कहते हैं कि लोगों को उनके पैरों के घावों की चिंता तो है लेकिन आत्मा के घावों की नहीं.

यह नाटक कागज पर कैसे उतरा?

इस बारे में वे बताते हैं, ''संवेदना के स्तर पर उस आदमी की तकलीफ महसूस करना शायद अहिंसा को सही अर्थो में समझना होगा. नाटक लिखते समय यही भाव मेरे मन में था. सत्य और अहिंसा को कोई मानने को तैयार नहीं है. इसे लोगों ने जीवन दर्शन नहीं बस एक रणनीति के तौर पर स्वीकार किया. महात्मा गांधी की यह पीड़ा इस नाटक में दिखाई गई है.''

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Image caption नंदकिशोर आचार्य

इस नाटक के निर्देशक परवेज अख्तर हैं. निर्देशन के लिए संगीत नाटक अकादमी सम्मान प्राप्त परवेज के मुताबिक़ यह नाटक चंपारण शताब्दी वर्ष में गांधी के पुर्नावलोकन का एक अच्छा मौका है.

'बापू' नाटक के ख़ास पहलू के बारे में वे कहते हैं, ''इसमें गांधी का वो मानवीय रूप दिखाई देता है जो लोगों ने पहले नहीं देखा है. इसमें वे रोते, नाराज़, मायूस, गुस्सा होते भी दिखाई देते हैं.''

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नाटक के एक दृश्य में गांधी कहते हैं कि मेरी हैसयित एक मृतक और मूर्ति की तरह है. लोग मेरी पूजा करेंगे लेकिन मेरी बात नहीं सुनेंगे. मेरी आवाज़ नहीं सुनेंगे.

इस दृश्य के बहाने परवेज बताते हैं, ''यह नाटक एक प्रयास है कि हम गांधी की पीड़ा सुनने की कोशिश करें. गांधी की जो छवि नई पीढ़ी में है उसे भी हमने इस नाटक में पकड़ने की कोशिश की है.''

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इस करीब डेढ़ घंटे लंबे एकल नाटक में बापू के किरदार को मंच पर अभिनेता जावेद अख्तर खां ने उतारा है. एकल अभिनय में उनकी ख़ास पहचान है.

वे कहते हैं, "मेरे लिए यह एक लाइफ टाइम एक्सपेरियंस है. बंटवारे के बाद भी दोनों देशों के बीच वह जो प्यार और भाईचारा चाह रहे थे वह मुझे बतौर अभिनेता प्रेरित कर रहा था."

जावेद के मुताबिक गांधी अब भी बहुत बड़े जन मानस को छूते हैं इसलिए भी उनके किरदार को निभाना और चुनौती भरा हो जाता है.

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बापू नाटक के साथ-साथ गांधी पर केंद्रित एक प्रदर्शनी "गांधी-अवलोकन" भी प्रेमचंद रंगशाला में लगी हुई है. इसे वरिष्ठ पत्रकार नासिरुद्दीन ने डिज़ाइन किया है.

इसमें पोस्टर के रूप में लगा बापू का यह वक्तव्य भी उनके अकेलेपन को सामने लाता है, ''... आज मैं अपने को अकेला पाता हूं...आज़ादी के कदम उल्टे पड़ रहे हैं ऐसा मुझे लगता है. हो सकता है इसके परिणाम आज दिखाई न दें, लेकिन आज़ाद हिन्दुस्तान का भविष्य मुझे अच्छा नहीं दिखाई दे रहा है.''

एक जून 1947 को महात्मा गांधी ने ये बातें कही थीं जो कि "महात्मा गांधी की संकलित रचनाएं" में दर्ज है.

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नासिरुद्दीन गांधी के अकेलेपन को कुछ इस तरह भी बताते हैं, "1945 के आस-पास गांधी जिन चीजों के सहारे स्वराज्य चाह रहे थे वे सब उनके आंखें के सामने खत्म हो रहे थे. उनके सबसे बड़ी पीड़ा देश का धार्मिक आधार पर बंटवारा था. ये उनके लिए दिल तोड़ने जैसी बात थी."

लेकिन नासिरुद्दीन सुमित सरकार जैसे इतिहासकारों का हवाला देते हुए यह भी बताते हैं कि गांधी के अकेलेपन से भर ये साल उनके जीवन के सबसे उत्कृष्ट साल हैं क्योंकि वे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए ख़ुद को झोंक देते हैं.

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हाल के वर्षों में गांधी को स्वच्छता के एक बड़े प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है. लेकिन इस आयोजन से जुड़े हरेक ने अलग-अलग तरीके से यह दोहराया कि गांधी को केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं किया जा सकता. गांधी को उनके आर्थिक और राजनीतिक दर्शन से अलग करके नहीं देख सकते और इस दर्शन की पृष्ठभूमि में उनकी अहिंसा का सवाल है.

साथ ही सभी इस राय के भी दिखे कि आज के हालात में या ऐसे हालात पैदा होने से पहले ही गांधी एक बड़ा आंदोलन चलाते.

नंदकिशोर याद दिलाते हैं, "गांधी ने 1931-32 में कहा था कि आज़ादी मिलने के बाद भी मेरा संघर्ष समाप्त नहीं होगा. मुझे ऐसी ही कई और लड़ाइयां अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ लड़नी पड़ेगी."

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