गुजरात में बीजेपीः चुनाव दूर, पर चुनौतियाँ कम नहीं

  • 31 मार्च 2017
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बीजेपी ने पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के फ़ौरन बाद अब अपना ध्यान गुजरात पर लगा दिया है. क्या है इसकी वजह?वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन का विश्लेषण.

बीजेपी इन दिनों पुराने जमाने में जिस तरह कम्युनिस्ट पार्टी काम करती थी उसी तर्ज़ पर काम कर रही है. एक चुनाव ख़त्म हुआ नहीं कि वो दूसरे चुनाव में लग गई.

उत्तर प्रदेश का चुनाव ख़त्म होते ही बिना विराम किए बीजेपी ने दिल्ली में एमसीडी चुनाव की तैयारी शुरू कर दी.

इसके बाद अमित शाह और नरेंद्र मोदी दोनों तुरंत गुजरात के लिए रवाना हो गए. वहां दो दिनों तक रहे और सोमनाथ ट्रस्ट की मीटिंग की. कार्यकर्ताओं से बातचीत की.

वे बिल्कुल सीपीएम के मॉडल जैसा काम कर रहे हैं.

अमित शाह की एक और शह, कई हुए मात

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गुजरात की चुनौती

गुजरात में बीजेपी 1995 से सत्ता में है. इसलिए कुछ चुनौतियां ज़रूर हैं लेकिन अभी चुनाव भी बहुत दूर है.

एंटी-इंकम्बेंसी का फ़ैक्टर तो है ही. बीस साल से ऊपर हो गए हैं बीजेपी को सत्ता में रहते हुए.

अमित शाह काफी व्यावहारिक आदमी भी हैं. उन्हें मालूम है कि ग्राउंड लेवल पर क्या चुनौतियां हैं.

कार्यकर्ताओं को प्रेरित करना है. पिछले साल का मानसून बहुत अच्छा नहीं रहा है इसलिए किसान और खेती से जुड़े हुए भी तमाम मसले हैं.

इन सब चुनौतियां का सामना तो उन्हें करना ही है. इसीलिए बीजेपी ने इतने पहले से तैयारियां शुरू कर दी हैं.

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वाघेला की वापसी की अटकल

दूसरी तरफ शंकर सिंह वाघेला की बीजेपी में घर वापसी की चर्चा तो जरूर है लेकिन इस पर अभी कुछ स्पष्ट नहीं कहा जा सकता.

लेकिन यह बात ज़रूर है कि शंकर सिंह वाघेला अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. वो चाह रहे हैं कि उनका बेटा चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस में उनका भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है.

इसलिए बेटे के भविष्य को लेकर कुछ बातें हो सकती हैं. अमित शाह से मुलाकात भी हुई है.

गुजरात में कांग्रेस चार गुटों में बंटी हुई है इसलिए लगता है कि शंकर सिंह वाघेला को ज्यादा उम्मीदें नज़र नहीं आ रही है.

इसलिए हो सकता है कि उन्हें अपने बेटे के चिंता हो और ख़ुद भी कही के गवर्नर बनने की ख्वाहिश रखे हुए हो.

जैसे कल्याण सिंह राजस्थान के गवर्नर बन कर चले गए. और अब तो उनके पोते भी उत्तर प्रदेश से चुनाव जीत चुके हैं.

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पटेलों का प्रभाव

बीजेपी के सामने गुजरात में पटेल आंदोलन और हार्दिक पटेल अभी भी एक चुनौती है. पूरे गुजरात में पटेलों का प्रभाव है.

हार्दिक पटेल के इर्द-गिर्द विपक्षी एकता कायम हो सकती है. शिवसेना के उद्धव ठाकरे और जेडी (यू) के नीतिश कुमार ने हार्दिक पटेल के साथ एकजुटता दिखाई है.

सालों से पटेल बीजेपी का साथ देते आए हैं. अब देखने वाली बात होगी कि वे बीजेपी को छोड़कर हार्दिक का साथ देते है क्या?

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गुजरात में भी जातीय समीकरण

दलितों और आदिवासियों का साथ परंपरागत रूप से कांग्रेस को मिलता है लेकिन फिर भी वो जीत नहीं पाते हैं.

इसके लिए उनके एक और मजबूत समुदाय का साथ चाहिए जो कि दरबारी ठाकुरों का हो सकता है.

शंकर सिंह वाघेला इसी समुदाय से आते हैं. लेकिन अगर बीजेपी की तरफ चले जाते हैं तब कांग्रेस को नुकसान और बीजेपी को फ़ायदा होगा.

हम आम तौर पर मानते हैं कि सिर्फ हिंदी प्रदेशों में ही जाति का फैक्टर काम करता है लेकिन गुजरात में भी इसका बहुत महत्व है.

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में जो अति पिछड़ों को जोड़ने का फार्मूला अपनाया है वही वो गुजरात में भी पहले अजमा चुके हैं.

गुजरात में चालीस अति पिछड़ी जातियां हैं. इसमें यादव भी है. जो सौराष्ट्र में है.

इसलिए पटेलों के खिसकने और दलितों का साथ नहीं मिलने की हालत में ये जातियां एक बार फिर से बीजेपी के लिए फ़ायदे का सौदा साबित हो सकती है.

(वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन से बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल की बातचीत पर आधारित)

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