जब राजेश खन्ना को रीगल से उलटे पांव भागना पड़ा

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नई दिल्ली का जाना माना सिने स्मारक 'रीगल' गुरुवार को बंद हो गया. इसके साथ ही 1932 में शुरू हुआ इसका सफर भी ख़त्म हो गया.

इस सिनेमाहाल ने वो समय भी देखा है जब उसके सामने सभी चीजें मामूली दिखती थीं.

1950 के दशक में जब बहुत कम सिनेमाहाल और फ़िल्में हुआ करती थीं, तब किसी तांगेवाले को सवारियों को हांक लगाते हुए यह सुनना काफ़ी आम था, "एक सवारी, रीगल, रीगल, कनॉटप्लेस."

यह तथ्य है कि तांगेवाले पड़ोस में स्थित रिवोली, प्लाज़ा और ओडियन की बजाय रीगल बोलते थे. इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उसका स्टेटस कितना बड़ा था.

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इसके सामने सब फीके थे

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सत्तर के दशक में सार्वजनिक परिवहन में फट फट गाड़ियों का चलन था. ये गाड़ियां पालिका बाज़ार में खड़ी की जाती थीं और ड्राइवर सवारियों को आकर्षित करने के लिए 'रीगल, रीगल, पालिका' चिल्लाते थे.

किसी अन्य सिनेमाहाल के मुकाबले, रीगल की शोहरत कुछ ऐसी होती थी.

साठ के दशक की बात है जब धर्मेंद्र अभी फ़िल्मों में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, वो मीना कुमारी के साथ यहां आए थे. मीना कुमारी तब तक बहुत आला दर्जे की अभिनेत्री का दर्जा हासिल कर चुकी थीं.

उनकी फ़िल्म 'फूल और पत्थर' ने यहां सिल्वर जुबिली मनाई.

दिलचस्प बात है कि एक बार 1969 में राजेश खन्ना का ड्राइवर उन्हें 'आराधना' की रिलीज़ के मौके पर यहां लेकर आया था.

राजेश खन्ना प्रशंसकों से बाल बाल बचे

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असल में खन्ना के आग्रह पर रीगल के बगल में स्थित रिवोली में फ़िल्म का शो दिखाया जा रहा था. वो रिवोली में इसका प्रीमियर देखना चाहते थे.

लेकिन रीगल पर इतनी भीड़ थी कि ड्राइवर ने यहीं कार रोक दी और जैसे ही खन्ना के लिए दरवाजा खोला , उन्हें ग़लत जगह आने का आभास हो गया.

जब तक राजेश खन्ना के प्रशंसक उनके पास पहुंचते वो वापस गाड़ी में जा बैठे.

श्याम बेनेगल की फ़िल्मों का तो रीगल से ख़ास रिश्ता था. जब गंभीर फ़िल्मों को थियेटर में जगह मिलने में मुश्किलात का सामना कर पड़ता था, रीगल आगे आता था.

यथार्थवादी फ़िल्मों का ठिकाना

इसमें 'मंथन', 'निशांत' और इससे पहले 'अंकुर' भी लग चुकी थी. इन फ़िल्मों ने यहां अच्छा व्यवसाय किया.

यथार्थवादी सिनेमा को सपोर्ट करने के लिए, फ़िल्म जगत में भी रीगल की तारीफ़ होती थी.

ये सब स्टार और फ़िल्म निर्माताओं की बातें थीं, लेकिन आम लोगों के पास रीगल की अपनी कहानी थी.

कुछ लोगों की याद अपनी गर्लफ्रेंड के साथ फ़िल्म देखने से जुड़ी है जबकि कुछ को अभी तक याद है कि फ़िल्म 'सत्यम शिवम् सुंदरम' में ज़ीनत अमान को देखकर कैसे लोग आहें भरते थे. इस फ़िल्म के प्रीमियर से पहले हवन कराया गया था.

कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो राज कपूर से यहां कई बार मिल चुकने का दावा करते हैं.

राजकपूर को अपनी फ़िल्म रिलीज़ के मौके पर मौजूद रहने के लिए जाना जाता था.

नेहरू की दीवानगी

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पंडित जवाहरलाल नेहरू के रीगल से खास रिश्ते को नहीं भूला जा सकता है, वो अक्सर यहां फ़िल्म देखने आते थे.

वो भीड़ से बचने के लिए फ़िल्म ख़त्म होने से कुछ मिनट पहले ही उठकर चले जाते थे.

'गॉन विद द विंड' फ़िल्म के भारत में प्रीमियर की कहानी तो वाक़ई न भूलने वाली है. इसका प्रीमियर रीगल में हुआ.

ये वो दौर था जब रीगल ने बेहतरीन विदेशी फ़िल्मों को दिखाने की शुरुआत की थी.

'दि रोब' के प्रीमियर में खुद प्रधानमंत्री शामिल हुए थे. नेहरू यहां कभी कभार आने वाले दर्शकों में ही शामिल नहीं थे.

ये इस बात से पता चलता है कि वो एक बार 'दिल्ली चलो' फ़िल्म का प्रिंट लेकर आए थे, जोकि आज़ादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष पर आधारित थी.

एक बार उनका पूरा कैबिनेट रीगल फ़िल्म देखने आया था.

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सर सोभा सिंह की ज़मीन पर बनने वाले इस सिनेमाहाल को वॉल्टर साइक्स ने डिज़ाइन किया था.

इसकी अंदरूनी बनावट में मौजूद भित्तचित्र, आधा गोलाकार गुंबद तकनीक आदि मुग़ल प्रभाव को दिखाता है.

अपने शुरुआती दिनों में यहां बेहतरीन नाटक भी दिखाया जाता था. यहां 'द लंदन रीव्यू कंपनी' और 'द रशियन बैले ट्रुप' के प्रदर्शन भी हुए थे.

रीगल एक ऐसा सिनेमाहाल था, जिसने मनोरंजन के इतिहास में अपना अलग मुक़ाम बनाया.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि, यहां फ़िल्म देखना ही अपने आप में एक बड़ी बात होती थी.

जैसा ग़ालिब ने लिखा है, "हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे/कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयां और", रीगल के बारे में भी हरकोई ऐसा ही कह सकता है.

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बाकी सिनेमाहाल फ़िल्म दिखाते थे, रीगल कई मायनों में इसे जीवन भर का अनुभव बना देता था.

लेकिन इसकी शोहरत फ़ीकी पड़ने लगी. सबसे पहले यहां एडल्ट फ़िल्मों के मॉर्निंग शो शुरू हुए.

इसके बाद वीडियो पॉर्लरों से इसे टक्कर मिली. इसके तुरंत बाद मल्टीप्लेक्स का हमला शुरू हुआ और रीगल अपने वजूद की लड़ाई लड़ने तक सिमट गया.

नई दिल्ली का प्रीमियर थियेटर इतिहास है. क़िस्मत से, यह इतिहास का भी हिस्सा है.

(बीबीसी के साथ वरिष्ठ पत्रकार ज़ियाउस्लाम से बातचीत के आधार पर.)

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