नज़रिया: दिल्ली के स्थानीय चुनाव, केजरीवाल का इम्तेहान?

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दिल्ली में दो साल पहले प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाले अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी है.

पंजाब में आम आदमी पार्टी ने 22 सीटें जीतीं तो गोवा में पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी.

अगर पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत की इतनी हवा नहीं बनाई जाती तो पहली बार राज्य के चुनाव में 22 सीटें जीतना एक उपलब्धि मानी जाती.

पंजाब में वो जीत नहीं हुई जिसकी आशा आम आदमी पार्टी कर रही थी इसलिए काडर में निराशा है और पार्टी की इस हार का असर आगे की रणनीति पर भी पड़ेगा.

गुजरात विधानसभा चुनाव में भी उतरने की तैयारी कर रही 'आप' अगर पंजाब में जीतती तो गुजरात में भी भाजपा के खिलाफ़ उसकी दावेदारी को मज़बूती मिल पाती, क्योंकि गुजरात में सालों से विपक्ष में बैठी कांग्रेस सिर नहीं उठा पा रही है.

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गुजरात चुनाव में अभी कुछ महीनों का वक्त बाकी है और फ़िलहाल आम आदमी पार्टी की असल चुनौती है दिल्ली में अप्रैल में होने वाले एमसीडी चुनाव.

एमसीडी चुनाव इसलिए अहम हो गए हैं क्योंकि इससे कहीं न कहीं तय होगा कि 'आप' का राष्ट्रीय पार्टी बनने का सपना सच हो पाएगा या नहीं.

अगर आम आदमी पार्टी एमसीडी में बेहतर प्रदर्शन कर पाती है तो उसके कार्यकर्ताओं में नई जान आ जाएगी.

आंदोलन से निकलकर आई 'आप', कितनी चुनौतियां?

आम तौर पर पिछले दशकों में भारत में देखा गया है कि जो पार्टियां किसी आंदोलन से उभर के आती हैं वो ज़्यादा लंबा नहीं चल पाती हैं.

सिर्फ असम में 'ऑल असम स्टूडेंट मूवमेन्ट' आंदोलन से असम गणपरिषद (एजीपी) का उदय हुआ, जो कई बार सत्ता में भी आई लेकिन अब क्षेत्रीय पार्टी बनकर रह गई है.

2013 में लोकपाल बिल को पास कराने के लिए अन्ना हज़ारे के आंदोलन को लेकर लोगों की आशाएं आसमान को छू रही थीं और इस आंदोलन से ही आम आदमी पार्टी का उदय हुआ था.

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उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने किस्मत आज़माई लेकिन बहुत सफल नहीं हुई थी.

पहला झटका पार्टी को तब लगा था जब दिल्ली में प्रचंड बहुमत मिलने के कुछ ही दिनों बाद पार्टी की स्थापना में अहम भूमिका निभाने वाले योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण आम आदमी पार्टी से अलग हो गए.

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दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतने के बाद अगर पार्टी से ये दो जाने माने लोग अलग नहीं होते तो देशभर से लोग इसमें शामिल होना चाहते क्योंकि आम आदमी पार्टी एक नई राजनीति की आशा के साथ खड़ी हुई थी.

पार्टी के लिए ये सबसे बड़ा मोड़ था क्योंकि इस टूट के बाद 'आप' भी किसी भी और राजनीतिक पार्टी की तरह लगने लगी.

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दिल्ली में जिस तरह के वादे करके 'आप' सत्ता में आई तब उसने पानी, बिजली, स्कूलों में बदलाव और मोबाइल क्लिनिक जैसे वादे पूरे किए लेकिन केंद्र सरकार के साथ केजरीवाल सरकार की लड़ाई की चर्चा ज़्यादा रही.

पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग के साथ लगातार हर फ़ैसले पर केजरीवाल सरकार की तनातनी चर्चा में रही है.

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हालांकि जंग और केजरीवाल की इस लड़ाई को एकतरफ़ा कहना भी सही नहीं होगा क्योंकि केंद्र सरकार का रवैया भी दिल्ली सरकार के कामकाज में दखल का संकेत देता रहा है.

नए उप राज्यपाल अनिल बैजल ने हाल ही में विज्ञापनों में खर्च हुए 97 करोड़ रुपए आम आदमी पार्टी से वसूलने का आदेश दिया है.

इससे नकारात्कमक संदेश सिर्फ दिल्ली में नहीं बल्कि अन्य राज्यों में गया है, लोग मानते हैं कि कहीं राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार आए और केंद्र के साथ लगातार झगड़े की वजह से राज्य के काम रुक न जाएं.

एक साथ कई मोर्चों पर लड़ाई

आम आदमी पार्टी की ग़लती ये है कि कई मोर्चे पर एक साथ लड़ाई छेड़ देना, ये रुख किसी आंदोलन में तो चल सकता है लेकिन राजनीतिक पार्टियां एक रणनीति पर चलती हैं कि किस वक्त किस मोर्चे पर लड़ना है.

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अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री मोदी को हर कदम पर निशाने पर लेते रहे हैं.

किसी से भिड़ जाने की केजरीवाल की आदत को कहीं न कहीं युवाओं को पसंद भी है लेकिन फिलहाल पार्टी के लिए चुनौती है कि किस तरह से केजरीवाल की इस छवि का सही फ़ायदा उठा सके.

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अभी आम आदमी पार्टी के लिए फ़िलहाल दिल्ली के स्थानीय चुनाव सबसे अहम मोर्चा है क्योंकि स्थानीय चुनाव होने क बावजूद एमसीडी पर कब्ज़ा करके पार्टी दूसरे राज्यों में भी अपने काडर का मनोबल बढ़ा सकती है.

हाल ही में पार्टी के एक विधायक वेद प्रकाश इस्तीफ़ा देकर भाजपा में शामिल हो गए. अगर 'आप' के काडर का मनोबल इसी तरह गिरता रहा तो और नेता भी दूसरी पार्टियों की तरफ़ देख सकते हैं.

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भाजपा की रणनीति है कि दूसरी पार्टियों के नेताओं को लेकर उन्हें कमज़ोर करो, क्योंकि भाजपा उगता सूरज है, इसे देखते हुए आने वाले महीनों में जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां अलग अलग पार्टियों के नेता भाजपा का दामन थाम सकते हैं.

ऐसे में कांग्रेस की बात करें तो शायद कांग्रेस खुद समझ ही नहीं पा रही कि किस तरह वो काडर में नई जान फूंके.

तो आम आदमी पार्टी के सामने संसाधन और कार्यकर्ताओं के गिरते मनोबल की कठिनाइयां के अलावा बिखरने से बचने की भी चुनौती है.

मध्यवर्ग का मोहभंग

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई में मध्यम वर्ग आम आदमी पार्टी को बहुत अत्साह से देखती थी लेकिन अब ये तबका नाराज़ है और मध्य वर्ग 'आप' से छिटक गया है, लेकिन बस्तियों में और गरीब तबके में अभी भी कुछ समर्थन दिखता है. इन दोनों फ़ैक्टर्स का आने वाले चुनाव में असर होगा.

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दिल्ली में केजरीवाल का इम्तेहान

दिल्ली में एमसीडी चुनाव क्या आम आदमी पार्टी के लिए अस्तित्व का सवाल बन जाएंगे, क्या पार्टी दिल्ली तक सिमट कर रह जाएगी, क्या और लोग पार्टी छोड़कर जाएंगे?

इन सवालों से घिरे अरविंद केजरीवाल के सामने पार्टी को जोड़कर रखना सबसे बड़ी चुनौती नज़र आती है.

यूं तो हर राजनीतिक पार्टी के सामने उतार चढ़ाव आते हैं लेकिन पार्टी काडर को जोड़कर रखना सबसे अहम होता है.

पंजाब और गोवा में हार के बाद अरविंद केजरीवाल के लिए पार्टी को जाड़कर रखना उनके नेतृत्व का इम्तेहान है.

अरविंद केजरीवाल पर तानाशाही रवैया रखने के आरोप लगते रहे हैं.

वैसे हाईकमांड, परिवार वाद जैसी परंपरा भारत की राजनीतिक पार्टियों में आम बात है लेकिन आम आदमी पार्टी वैकल्पिक राजनीति की उम्मीदों को जगाकर सत्ता में आई थी इसलिए उनके लिए इन आरोपों से जूझना थोड़ा कठिन हो जाता है.

केजरीवाल की खूबी और कमज़ोरी

हालांकि केजरीवाल की सबसे बड़ी खूबी है कि वो किसी से भी भिड़ जाते हैं और वो हिम्मत नहीं हारते लेकिन सबको साथ लेकर न चल पाना उनकी कमज़ोरी है.

दिल्ली में जिस तरह आम आदमी पार्टी के विधायकों पर मामले दर्ज किए गए हैं, वैसे नेता सभी पार्टियों में हैं लेकिन साफ़ है कि आम आदमी पार्टी निशाने पर रही है.

ऐसे में अरविंद केजरीवाल के लिए चुनौतियां कम नहीं है.

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