ब्लॉग: सरकारें खाने-पीने का मेनू नहीं तय कर सकतीं

  • 2 अप्रैल 2017
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भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के गठन के बाद राज्य में भैंस, मुर्गा और बकरे के मांस का कारोबार लगभग पूरी तरह बंद है.

एक अनुमान के अनुसार राज्य में मांस का कारोबार लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का है और ये धंधा तकरीबन पांच लाख लोगों को रोज़गार देता है.

इस समय केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में हर तरफ भाजपा की 'मांस नीति' पर चर्चा हो रही है.

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि वो सत्ता में आते ही 'अवैध' बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगा देगी.

पिछली गैरभाजपा सरकारों के दौरान राज्य के ज्यादातर बूचड़खाने सरकारी उदासीनता, भ्रष्टाचार और अक्षमता के कारण काम नहीं कर रहे थे.

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आधुनिक बूचड़खाने

कस्बों और शहरों में मांस के छोटे व्यापारी लंबे समय से किसी लाइसेंस या परमिट के बिना अपनी निजी जगहों पर भैंस, बकरी और चिकन का मांस दुकानों पर बेच रहे थे.

आधुनिक बूचड़खानों के निर्माण के लिए पर्यावरण महकमे की शर्तें बेहद कठोर हैं और इन्हें लागू करने की लागत महंगी है.

इसके कारण सरकारों ने नए और आधुनिक बूचड़खानों के निर्माण से परहेज किया और गैरकानूनी तरीके से किए जा रहे मांस कारोबार के खिलाफ कोई कार्रवाई न करके एक तरह से उसे बढ़ावा ही दिया.

पिछले दशकों में राज्य में बड़ी संख्या में आधुनिक मशीनों वाले बूचड़खाने अस्तित्व में आए.

ये हर साल राज्य से तकरीबन 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का मांस विदेशों को निर्यात कर रहे हैं.

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वुसत वेजिटेबल्ड बीफ की थिअरी को यूपी में बूचड़खानों पर की जा रही तालाबंदी से जोड़ रहे हैं.

कानून में बदलाव

इस समय ऐसे आधुनिक बूचड़खानों को भी राज्य की नई सरकार के निर्णय के बाद काम करने में दिक्कत पेश आ रही है.

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Image caption अल कबीर भारत का सबसे बड़ा बीफ़ निर्यातक है

मांस निर्यातकों का कहना है कि जिस तरह का माहौल उत्तर प्रदेश और भारत में बना हुआ है, उसमें ऐसा लगता है कि वह मांस कारोबार नहीं बल्कि कोई अपराध कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के बाद झारखंड राज्य में भी कुछ स्थानों पर मांस बिक्री के सभी लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं.

राजस्थान में भी कई हिंदू संगठनों ने हर तरह के मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है.

उधर, गुजरात में विधानसभा ने कानून में संशोधन करके गोहत्या की सजा सात साल से बढ़ाकर उम्रकैद कर दी है.

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मांसाहारी हिंदू

अवैध रूप से गायों को लाने ले जाने वाले ट्रक हमेशा के लिए जब्त कर लिए जाएंगे और और ट्रांसपोर्टरों को कई लाख रुपये के जुर्माने के साथ कई साल की सजा भी होगी.

राज्य में गोहत्या पर पहले से ही प्रतिबंध है और इस पर प्रभावी अमल हो रहा है. ऐसा लगता है कि जैसे इस समय भारत में हर समस्या का कारण मांस है.

यहाँ एक लंबे समय से यह धारणा फैलाने की कोशिश की जा रही है कि मांस खाने वाले लोग हिंसक, क्रूर और अशुद्ध होते हैं जबकि इसके विपरीत शाकाहारी बेहतर, दयालु और नेक इंसान होते हैं.

आम धारणा के विपरीत भारत के हिंदुओं की एक बड़ी संख्या मांस खाती है. अधिकांश हिंदुओं की तरह मुस्लिम, ईसाई और सिख भी सामान्य रूप से मांसाहारी हैं.

सब्जी या मांस खाना व्यक्तिगत मामला है और इसका संबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता से है.

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बहुमत का वोट

किसी भी लोकतांत्रिक देश में एक समूह के धार्मिक विचारों को जनसंख्या के दूसरे समूह पर लागू नहीं किया जा सकता.

कौन क्या खाएगा इसका निर्णय राज्य नहीं कर सकता. इसकी चर्चा भैंस और बकरे के मांस तक ही सीमित नहीं है.

आने वाले दिनों में मछली बाजार और अंडे की बिक्री भी इसकी चपेट में आएंगे. लोकतंत्र में निर्णय बहुमत के वोट होते हैं.

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सरकारें अपने बहुमत के बल पर कोई फैसला कर सकती हैं, लेकिन किसी लोकतांत्रिक देश में कोई सरकार किसी नागरिक के व्यक्तिगत अधिकार छीन नहीं सकती.

कोई लोकतांत्रिक सरकार किसी समूह की धार्मिक मान्यताओं को किसी दूसरे समूह पर जबरदस्ती नहीं थोप सकती. इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.

लोकतांत्रिक सरकारें यह तय नहीं करतीं कि किस को क्या खाना है, किसे क्या पहनना है और किसी के विचार क्या होंगे.

लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता ही सबसे पवित्र मानी जाती है.

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