कानपुर- गोश्त बेचने के लाइसेंस लेने की लिए लगी लंबी कतार

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शनिवार को कानपुर नगर निगम के पशु चिकित्सा अधिकारी के दफ्तर में आम दिनों के मुकाबले ज़्यादा भीड़ थी.

यह भीड़ इसलिए थी क्योंकि शनिवार ही से चिकन और मछली विक्रेता नए लाइसेंस या पुराने लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए आवेदन कर सकते थे.

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शनिवार शाम दफ्तर बंद होने के समय तक पशु चिकित्सा अधिकारी को करीब 60 आवेदन मिले. आवेदन करने वाले हिन्दू और मुस्लिम करीब-करीब बराबर संख्या के थे.

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Image caption सुभाष सोनकर

मछली बेचने वाले सुभाष सोनकर पशु चिकित्सा अधिकारी के कार्यालय में थे. सोनकर के माथे पर लाल तिलक था. वे दुबले पतले कद काठी के हैं. उनकी शर्ट और पैंट मैली थी. पैरों में हवाई चप्पल थी. वो सहमे हुए लग रहे थे.

दबी आवाज़ में उन्होंने पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अजय सिंह से कहा, "मैं तो करीब 25-30 साल से बाकरगंज के एक मैदान में मछली बेच रहा हूँ. वहां पर एक मछली बाज़ार है. करीब 50-60 और लोग वहां मछली बेचते हैं."

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डॉक्टर सिंह कहते हैं, "अब आप खुले स्थान से मछली नहीं बेच सकते. अब आप एक पक्की दुकान में ही अपना धंधा चला सकते हैं. दुकान में ज़मीन पांच फ़ीट तक टाइल्स की होनी चाहिए."

सोनकर ने पूछा, "तो क्या नगर निगम हम लोगों को दुकान देगी?"

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डॉक्टर सिंह हँस पड़े और कहने लगे- "नहीं. दुकान नगर निगम नहीं देगी. दुकान आपकी अपनी होनी चाहिए या फिर किराये पर भी ले सकते हैं, पर दुकान चाहे आप की अपनी हो या फिर किराये की, कागज़ पूरे होने चाहिए."

सोनकर ने धीरे से 'अच्छा' कहकर अपना सिर हिला दिया. उनका मकान ही किराये का है. ख़ुद की दुकान तो दूर की बात, किराए पर अब दुकान लेना उनके बस का नहीं.

योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बनने के साथ ही अवैध बूचड़खानों को बंद किया जाने लगा.

लोगों को मीट फिर कब खाने को मिलेगा, इसके बारे में डॉक्टर सिंह कहते हैं, "आज की तारिख में अगर किसी भी जानवर का गोश्त बिक रहा है, चाहे वो बकरे, भैंस, सूअर या मुर्गे का गोश्त हो, तो वो अवैध है."

उन्होंने कहा, "मछली और चिकन बेचने के लिए के लिए लाइसेंस के आवेदन लिए जा रहे हैं. संभवतः एक हफ्ते के अंदर दुकानें खुल जाएँगी."

लेकिन बड़े जानवरों का गोश्त कब तक मिलेगा, इसके लिए कोई निश्चित तारीख़ तय नहीं है.

नियम के हिसाब से बूचड़खानों से ही पूरे शहर में गोश्त की आपूर्ति की जानी चाहिए. लेकिन अभी तक जगह जगह पर मांस की दुकानें खुली हुई थीं और जानवर वहीं काटे जाते थे.

डॉक्टर सिंह कहते हैं, "अब हर मीट विक्रेता को स्लॉटरहाउस से ही मीट खरीदना पड़ेगा. उसके बाद जगह वह वैध दुकान से ही उसे बेच सकता है."

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विनोद कुमार अपनी चिकन की दुकान के लाइसेंस का नवीनीकरण कराने पहुंचे थे.

विनोद कुमार ने डॉक्टर सिंह से पूछा, "चिकन भी क्या स्लॉटरहाउस में ही कटवाना पड़ेगा?"

डॉक्टर सिंह ने कहा, "नहीं. चिकन आप अपनी दुकान में ही काट सकते हैं, लेकिन किसी को दिखना नहीं चाहिए. दुकान में पर्दा होना चाहिए, और उसके जो अवशेष बचें उसका सही तरह से डिस्पोज़ल करें."

55 साल के मोहम्मद शफी भी मांस बेचने का काम करते थे. अब वह रोज़ी रोटी की तलाश में पूरे परिवार सहित कानपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर सचेंडी गाँव में अपने पुश्तैनी घर लौट गए हैं.

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Image caption बंद पड़ा हुआ स्लॉटरहाउस

बीबीसी को उन्होंने फ़ोन पर बताया, "कर्नलगंज के स्लॉटरहाउस के पास ही मेरा घर था. मैं वहां से 1000-1500 किलो गोश्त खरीद के बेचा करता था. घर किसी तरह चल जाता था. स्लॉटरहाउस बंद हुआ तो आमदनी बंद हो गयी."

उन्होंने बताया- "मैंने चूरन बेचना शुरू किया, लेकिन कमाई कुछ भी नहीं हो रही थी. परिवार में पत्नी के अलावा चार लड़कियां और तीन लड़के हैं. तो मैं अब सचेंडी आ गया हूँ. किसी के खेत में गेंहू काटने का काम कर रहा हूँ."

वो कहते हैं, "मैंने पहले कभी खेतों में मज़दूरी की नहीं. धूप भी तेज़ है आजकल. दिक्कत तो है पर रोज़ी रोटी का सवाल है."

मुहम्मद शफी को उम्मीद है कि स्लॉटरहाउस दोबारा खुलेगा और वो कानपुर लौट सकेंगे.

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