किसानों को कर्ज से मुक्ति कैसे मिल सकती है?

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पूरे देश की नज़रें मंगलवार को प्रस्तावित उत्तर प्रदेश नई कैबिनेट की पहली बैठक पर टिकी थीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि पहली बैठक में ही किसानों की कर्ज माफी की घोषणा की जाएगी.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने 36,359 करोड़ की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा की है. इससे 2.15 लाख छोटे और सीमांत किसानों का एक लाख तक कर्ज़ माफ़ करने की घोषणा की गई है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या किसानों के लिए सरकार के कुछ करने का मतलब उन्हें कर्ज देना या फिर उनका कर्ज माफ़ करना ही है.

भारत के किसानों को आखिर इन कर्जों से मुक्ति कैसे मिल सकती है.

बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन ने यही सवाल पूछा भूमि सुधार और किसान मामलों के जानकार और सर्वोदय अभियान से जुड़े कुमार प्रशांत से...

कुमार प्रशांत का नज़रिया

हमारे राजनीतिज्ञ किसानों की बात करते हैं. दरअसल वे किसानों की नहीं, अपनी बात करते हैं. किसान तो कहीं उस विषय का पात्र ही नहीं है.

किसानों की जिंदगी सुधारनी हो या भारतीय कृषि की अवस्था सुधारनी हो, उसकी पहली और अनिवार्य शर्त है कि कर्ज की ये व्यवस्था तुरंत के तुरंत खत्म होनी चाहिए.

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कृषि का कोई न कोई ऐसा रूप किसानों को और समाज को उभारना होगा जिसमें कर्ज की जरूरत न पड़ती हो.

लेकिन जो तरीका खेती का, किसानी का, कैश क्रॉप के नाम से आने वाली फसलों का, जिस जगह की जमीन है, उस जगह की प्रकृति के विपरीत फसलों को पैदा करवाने का तरीका विकास के नाम पर पूरे देश में चलाया जा रहा है, वो सिर्फ कर्ज के ईंधन से ही आगे बढ़ाया जा सकता है.

इसलिए किसानों की कर्ज माफी की बात को ज्यादा अहमियत नहीं दी जानी चाहिए. इसका बहुत महत्व नहीं है कि इस बात की बहुत चर्चा की जाए कि ये जो एक रहस्य बना हुआ है कि आज और कल में सरकार क्या घोषणा करने वाली है और अगली बैठक में करती है या दूसरी बैठक में करती है.

ये नाटक बहुत पुराना, घिसा-पिटा और अर्थहीन हो चुका है. मैं अगर भूल नहीं रहा हूं तो एक बहुत बड़े पैमाने पर किसानों का कर्ज महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने माफ कर दिया था जब विदर्भ में किसानों की आत्महत्या का सवाल लेकर हमलोग भी बड़े पैमाने पर काम कर रहे थे.

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तब भी बड़ी वाह-वाही हुई थी कि इतने बड़े पैमाने पर किसानों की कर्ज माफी की गई है. उस कर्ज माफी में से ये निकला कि विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की दर दुगुनी हो गई है.

महाराष्ट्र में औसतन हर रोज तीन किसान खुदकुशी कर रहे हैं. दूसरे राज्यों की बात मैं अभी नहीं करता हूं. इसलिए मैं इस छद्म को पहचानता हूं.

सरकार की चूक

सवाल उठता है कि इस वक्त क्या सबसे जरूरी है जिसकी तरफ सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है.

एक तो यह है कि जो समर्थन मूल्य अनाजों का आप तय करते हैं, वो आप न तय करें और जगह-जगह किसानों की को-ऑपरेटिव को तय करने दें.

दूसरा ये कि जो भी बाजार भाव तय होता है, उस भाव पर फसल बाजार में बिके. इसकी देखरेख की व्यवस्था सरकार करे. सरकार दूसरा कोई रोल न प्ले करे.

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मैं मानता हूं कि शायद इससे तुरंत परिस्थिति में परिवर्तन हो सकता है.

कैसे बदलेंगे हालात

किसानी का पूरा काम इतना श्रम आधारित है कि इसमें शरीर तोड़ने वाले श्रम की जरूरत पड़ती है.

दूसरी तरफ ये कि किसान को मदद पहुंचाने वाला जो पशुधन था हमारा, उसे बिलकुल ही खत्म कर दिया गया है. मशीनें उसकी जगह ले नहीं सकती हैं, ले नहीं पाई हैं, तब किसान के लिए अपना शरीर ही रह जाता है.

वो प्रकृति से भी लड़ता है क्योंकि प्रकृति कभी भी उसके नियम से चलती नहीं है और सरकार के द्वारा बनाई गई तमाम व्यवस्थाएं जो उसके प्रतिकूल जा रही हैं, किसान को उससे भी लड़ना होता है.

उसके दीन हीन होने, कमजोर होने, लाचार होने, बेचारा होने के अलावा उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है.

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बचा सिर्फ इतना है कि वह ऐसी चीज का उत्पादन करता है जिसके बगैर मनुष्य का अस्तित्व संभव नहीं है, इसलिए हम अभी तक उसे बर्दाश्त किए हुए हैं.

इसलिए किसान की परिस्थिति को बदलना हो तो दो चीजें फौरन करनी होंगी. उसके मदद के लिए बनाई गई व्यवस्थाओं पर फौरन विचार किया जाए.

जैसे समर्थन का मूल्य का सवाल किसान समितियों के पास जाएगा तो जोड़ने-घटाने के बाद एक फार्मूला ऐसा बन सकता है जिससे तत्काल राहत हो सकती है.

और दूसरा जो भी समर्थन मूल्य तय हो, उसको बाजार का व्यापारी किसान की लाचारी का फायदा उठाकर उसको कम दाम पर बेचने के लिए बेबस न करे. ये देखने के लिए सरकार बाजार में कोई व्यवस्था करे.

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