'तो आवेदक की मौत पर बंद हो जाएगी आरटीआई फ़ाइल'

  • 6 अप्रैल 2017
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केंद्र सरकार ने सूचना के अधिकार क़ानून से जुड़े नियमों में बदलाव करने का प्रस्ताव रखा है.

इसमें कोई शक नहीं कि आरटीआई क़ानून भारत के लोगों को सबसे ज्यादा ताक़त देने वाला क़ानून है. एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में हर साल 40 से 60 लाख आरटीआई आवेदन फ़ाइल किए जाते हैं.

दुनिया भर में सरकारों के कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए ये सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला क़ानून है.

राष्ट्रीय स्तर पर किए गए आकलन से पता चलता है कि शहरी ग़रीब और ग्रामीण परिवार अपने बुनियादी अधिकारों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए आरटीआई आवेदन दाख़िल करते हैं.

उनकी कोशिश अपने लिए इंसाफ़ पाने की रहती है. इसलिए ये ज़रूरी है कि आरटीआई क़ानून से जुड़े नियम क़ायदे तय करते वक़्त उन लोगों की तस्वीर दिमाग़ में रखी जाए जो इसका इस्तेमाल करते हैं.

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सूचना आयोग

केंद्र सरकार ने आरटीआई के लिए जिन नए नियमों का प्रस्ताव रखा है, दुर्भाग्य से ये आम लोगों के लिए अपने अधिकारों को हासिल करने की राह में मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं.

ख़ासकर अगर सूचना के क़ानून का उल्लंघन हो तो केंद्रीय सूचना आयोग के पास जाने के किसी नागरिक के अधिकार में बाधा पड़ सकती है.

प्रस्तावित संशोधन में सूचना आयोग के पास अपील और शिकायत दाख़िल करने की प्रक्रिया को ज्यादा जटिल और क़ानूनी पेचीदगियों भरा बनाने का प्रस्ताव है.

साल 2012 में बनाए गए नियमों ने आवेदकों को अपील फ़ाइल करने से पहले दस्तावेज़ों की एक लिस्ट साथ में लगाने की शर्त लगा दी थी.

आवेदक को अपील फ़ाइल करने से पहले साथ लगाए जाने वाले दस्तावेज़ों को पूरी तरह से प्रमाणित करने के लिए कहा गया था.

चीज़ों को और आसान बनाने के बदले प्रस्तावित नियम नागरिकों पर अतिरिक्त ज़िम्मेदारी डाल रहे हैं.

नागरिकों को सर्टिफिकेट देना होगा है कि जिस मामले में वे अपील या शिकायत दाख़िल कर रहे हैं, वो पहले फ़ाइल नहीं किया गया है या उसका निपटारा नहीं हुआ है और आयोग या किसी कोर्ट में पेंडिंग तो नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट

सीआईसी में शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रस्तावित नियमों में जो शर्तें तय की गई हैं वे क़ानून से परे भी हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ भी हैं.

2012 में ही सुप्रीम कोर्ट ने भारत बनाम एस श्रीनिवासन के मामले में फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि कोई नियम अपने मूल क़ानून की भावना के मुताबिक़ ही हो सकता है न कि उसके परे.

प्रस्तावित नियम कहता है कि प्रत्येक शिकायत के साथ पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफ़िसर (पीआईओ) के पास दायर किए गए मूल आवेदन को लगाना ज़रूरी होगा.

पीआईओ की ग़ैरमौजूदगी या आवेदन स्वीकार करने से उसके इनकार करने पर, मौजूदा क़ानून नागरिक को सीधे अपनी शिकायत सूचना आयोग में दायर करने का अधिकार देता है.

ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता के पास मूल आरटीआई आवेदन की कोई कॉपी नहीं होती है. लेकिन इसके बावजूद प्रस्तावित नियम शिकायत दायर करने के लिए मूल आवेदन को नत्थी करने की शर्त अनिवार्य रूप से लगाते हैं.

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आरटीआई क़ानून

इसके अलावा प्रस्तावित संशोधन बिना किसी क़ानूनी आधार के ये शर्त लगाता है कि शिकायतकर्ता को 90 दिनों के भीतर शिकायत दर्ज करानी होगी. इसमें देर होने की सूरत में आवेदक को देरी का कारण बताना होगा.

हालांकि आरटीआई क़ानून में अपील दायर करने के लिए पहले से ही समय सीमा तय है जबकि शिकायतों के मामले में कोई मियाद नहीं है.

शिकायत वो प्रक्रिया है जिसके तहत कोई व्यक्ति आरटीआई क़ानून के किसी प्रावधान के उल्लंघन होने की सूरत में सूचना आयोग के संज्ञान में ये जानकारी देता है. इसके तहत दूसरे मुद्दे उठाए जाते हैं और जुर्माने का प्रावधान भी इस में है.

जैसे ग़लत सूचना दिए जाने के मामले में आवेदक आरटीआई जवाब मिलने के काफ़ी बाद भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है. आरटीआई क़ानून इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं करता है.

ठीक इसी तरह आरटीआई क़ानून की धारा चार के तहत कुछ जानकारियों को किसी विभाग को ख़ुद सार्वजनिक करना होता है. अगर विभाग इसका पालन नहीं करता है तो आवेदक के पास एक ही तरीक़ा है कि वो सूचना आयोग के पास जाकर इसकी शिकायत करे.

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प्रस्तावित नियम

राष्ट्रीय स्तर पर किए गए अध्ययन से ये पता चलता है कि आरटीआई क़ानून के इस प्रावधान को शायद सबसे ख़राब तरीक़े से लागू किया गया है.

सूचना के अधिकार क़ानून के तहत जो जानकारियां मांगी जाती हैं, उनमें 70 फीसदी वैसी होती हैं जिन्हें सरकारी विभागों को ख़ुदबख़ुद घोषित करना होता है.

अगर प्रस्तावित नियम लागू कर दिए जाते हैं तो नागरिकों के लिए शिकायत लेकर सूचना आयोग के पास जाना मुमकिन नहीं रह जाएगा.

धारा चार के तहत की जाने वाली घोषणाओं के लिए आरटीआई आवेदन दाख़िल करना ज़रूरी नहीं होता है. 90 दिनों की प्रस्तावित समय सीमा की शर्त के मुताबिक़ सबूत देना मुमकिन नहीं होगा.

दूसरी तरफ़, सीआईसी के फ़ैसलों की तामील न होने की सूरत में जांच के तौर तरीक़ों को तय करने की सरकार की कोशिश की तारीफ़ की जानी चाहिए. लेकिन ऐसा लगता है कि इसका मसौदा जल्दबाज़ी में तैयार में किया गया है.

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अपील या शिकायत

उदाहरण के लिए प्रस्तावित संधोशन ये कहते हैं कि आयोग के आदेश का पालन नहीं होने पर 90 दिनों के अंदर शिकायत दायर कर दी जा सकती है.

लेकिन ये कहीं नहीं कहा गया है कि शिकायत पर सुनवाई लंबित अपीलों और शिकायतों के निपटारे के बाद की जाएगी या इन्हें वास्तविक अपील या शिकायत से जुड़े जारी मामलों की तरह निपटाया जाएगा.

और इसलिए इन्हें स्पेशल कैटिगरी का मानते हुए प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाएगा. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि सूचना आयोग में अपीलों और शिकायतों की सुनवाई में लंबा वक़्त लगता है, कभी-कभी तो सालों लग जाते हैं.

नियम तोड़ने या नियमों का पालन नहीं होने पर दायर की गई शिकायतों को अगर लिस्ट के आख़िर में रख दिया जाएगा तो शिकायतकर्ता के लिए ये बेमानी हो जाएंगे.

प्रस्तावित संशोधनों का ये शायद सबसे चिंताजनक पहलू है कि प्रस्तावित नियमों के तहत आवेदक की लिखित सूचना पर अपील वापस ली जा सकती है और आवेदक की मौत पर कार्यवाही बंद कर दी जाएगी.

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व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन

आरटीआई क़ानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो आवेदक को अपील वापस लेने का अधिकार देता है. इस लिहाज़ से प्रस्तावित नियम क़ानून से परे जाते हुए लगते हैं.

ज्यादा अहम बात ये है कि भारत में आरटीआई से सूचना मांगने पर आवेदकों को प्रताड़ित करने, मारने-पीटने, सताने और यहां तक कि उनकी हत्या के मामले भी प्रकाश में आते रहे हैं.

ऐसे प्रावधानों से उन तत्वों को प्रोत्साहन मिल सकता है जिनके हित सूचना मांगने वालों को ख़ामोश करा देने में हैं.

तीन साल पहले संसद ने व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन ऐक्ट पास किया था. केंद्र सरकार इसे लागू करने में अब तक नाकाम रही है. इसके मद्देनज़र विवादास्पद संशोधन प्रस्तावों से चिंता बढ़ जाती है.

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पारदर्शी शासन

सरकार ने प्रस्तावित नियमों पर लोगों से राय मांगी है. ये एक मौक़ा है कि लोग अपनी चिंताएं सामने रख सकें और देश में पारदर्शी शासन को बढ़ावा देने वाले नियम बनाए जा सकें.

उदाहरण के लिए आरटीआई क़ानून आम नागरिकों को प्राइवेट संस्थाओं से वो जानकारी हासिल करने का हक़ देता है जो सरकारी एजेंसियां अन्य क़ानूनों से प्राप्त कर सकती हैं.

लेकिन इस प्रावधान को लागू करने के लिए कोई स्पष्ट नियम नहीं है. ये प्रावधान अछूता ही रह गया जबकि इसके ज़रिए बड़े बदलाव लाने की संभावना थी.

ठीक इसी तरह केंद्र सरकार आरटीआई क़ानून की धारा 4 के सही अनुपालन के लिए नियमों के तहत उपयुक्त अधिकारी की ज़िम्मेदारी तय कर सकती है और इन अधिकारियों की जवाबदेही के लिए, इस ज़िम्मेदारी को उनके प्रदर्शन मूल्यांकन के साथ जोड़ सकती है.

(लेखक आरटीआई कार्यकर्ता हैं और 'सतर्क नागरिक संगठन' और 'नैशनल कैम्पेन फॉर पीपल्स राइट्स टू इन्फॉर्मेशन' से जुड़े हुए हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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