नज़रिया: क्या किसानों की कर्ज माफी पर पीएम मोदी फंस गए हैं?

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इस बात से तो कोई इनकार नहीं कर सकता है कि पिछले दो-तीन साल में किसानों को बहुत चोट पहुंची है.

लगातार सूखा पड़ा है, ओले पड़े हैं, हालात और खराब हुए हैं. मोदी सरकार के आने के बाद किसानों की आमदनी गिरी है.

2014 के चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणापत्र में किसानों से खास तौर पर वादा किया था कि उन्हें उनके लागत के ऊपर 50 फीसदी का मुनाफा दिया जाएगा.

इन्होंने किसानों के लिए तय की जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी कोई ज्यादा इजाफा नहीं किया. ये सारी चीजें बढ़-बढ़ कर गले तक आ गई थीं.

किसान सब जगह अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. तो कर्ज माफ करना इनके लिए जरूरी हो गया था और उत्तर प्रदेश में इन्होंने कर दिया. जाहिर है अब अन्य राज्यों में ये मांग उठेगी.

बैंक राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश में किसानों को कर्ज देते हैं तो कर्ज माफी का फैसला एक राज्य में करके रुका नहीं जा सकता है. महाराष्ट्र में भी कर्ज माफी की बात उठ रही है. वहां बीजेपी की सरकार है.

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राजनीतिक बहस

पंजाब में भी कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कर्जमाफी का वादा किया था और अब वहां उसकी सरकार आई है तो वो भी ऐसा करेगी. इसका प्रभाव हर तरफ देखने को मिलेगा. मेरे हिसाब से ये जायज है क्योंकि किसानों को बड़ी चोट पहुंची है.

इस देश में लंबे समय से राजनीतिक बहस चल रही है कि चार-पांच सालों से बड़े-बड़े उद्योगों ने सात-आठ लाख करोड़ रुपये के कर्ज ले रखे हैं और वो पैसा वापस नहीं कर रहे हैं.

इस लिहाज से किसानों को दो-ढ़ाई लाख करोड़ कर्ज माफ हो जाता है तो इसमें क्या दिक्कत है. सरकार काफी समय से इसे टाल रही थी लेकिन अब इस बहस में फंसती हुई दिख रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट पर बहस के दौरान ये भी कहा था कि बीजेपी कांग्रेस की तरह तोहफा देने वाली नीति नहीं अपनाती है. राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की कर्ज माफी को यूपीए की बीमारी करार दिया गया था.

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बीजेपी सरकार

अब बीजेपी सरकार को न चाहते हुए ये करना पड़ रहा है. इसका असर पड़ेगा. कर्ज माफी के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले पर लोगों ने देखा कि केंद्र ने इसे राज्य की समस्या करार दिया.

ये सही नहीं माना जा सकता है. केंद्र सरकार को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी. ये विचार केंद्र की तरफ से ही राज्य में गया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके बारे में बोला था.

इसका असर केंद्र पर होगा क्योंकि वित्तीय घाटे पर प्रभाव पड़ेगा. दुनिया केंद्र और राज्यों के वित्तीय घाटे को साथ रखकर देखती है. मोदी सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी.

इतने बड़े कर्ज को उत्तर प्रदेश कभी वापस नहीं कर सकता. ये बहुत ज्यादा है. यूपी का वित्तीय घाटा एक ही झटके में तीन फीसदी बढ़ गया है.

लेकिन किसानों को ये राहत पहुंचाना जरूरी था. कोई भी सरकार होती तो वो किसानों के लिए कुछ न कुछ करती ही.

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विदेशी निवेशक

मोदी जी ने वैश्विक निवेशकों से भी वित्तीय घाटे को कम करने का वादा कर दिया था और भारतीय स्टॉक मार्केट और यहां की कंपनियों में निवेश करने वाले वैश्विक निवेशकों को ये कतई पसंद नहीं है कि किसानों का कर्ज माफ किया जाए.

कंपनियों का कर्ज माफ होने पर वे खुश होते हैं क्योंकि इससे उनका बही-खाता सुधरता है और इससे उनकी शेयर कीमतें बढ़ती हैं. उनके निवेश का मूल्य बढ़ता है.

उन्हें किसानों से कोई लेना-देना नहीं है. एनडीए सरकार शुरू में इन वैश्विक निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों के प्रेशर में भी थी कि वे क्या कहेंगी.

मोदी जी ने वैश्विक निवेशकों और सोशल सेक्टर में कई वादे कर रखे हैं और अब अपने ही वादे में फंस गए हैं.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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