जब बेगम अख्तर ने कहा, 'बिस्मिल्लाह करो अमजद'

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दुनिया का कोई भी मंच हो, दिल्ली का सिरी फ़ोर्ट ऑडीटोरियम, लंदन का रॉयल अलबर्ट हॉल या फ़्रैंकफ़र्ट का मोत्सार्त हॉल या सिडनी का ऑपेरा हाउस, उस्ताद अमजद अली ख़ाँ ने अपने सरोद वादन से पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों को न सिर्फ़ मंत्रमुग्ध किया है, बल्कि उन्हें खड़े हो कर दाद देने के लिए मजबूर भी किया है.

अपने घराने और अपने पिता की तारीफ़ में तो हर कोई लिखता है लेकिन भारतीय संगीत के इन चुनिंदा नगीनों पर शायद ही किसी उस्ताद की नज़र गई है, और शायद यही वजह है कि अमजद अली ख़ाँ की किताब का नाम रखा गया है, 'मास्टर ऑन मास्टर्स.'

अमजद अली खां पर विवेचना में सुनिए-

उस्तादों पर उस्ताद की नज़र

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां

कसूर में जन्मे उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ को अमजद ने बहुत छुटपन से देखना शुरू किया था. ज़मज़मा सरगम. स्थाई अंतरा और चौत की तान के लिए मशहूर बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, अमजद के वालिद उस्ताद हाफ़िज़ अली ख़ाँ को भाई साहब कह कर पुकारते थे.

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Image caption बड़े गुलाम अली खां

डीलडौल में लंबे चौड़े बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने मुग़लेआज़म फ़िल्म में गाया भी था. उस समय जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी को हर गाने के लिए 500 रुपए मिला करते थे, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने 25000 रुपए की मांग की थी और के आसिफ़ इसके लिए तुरंत राज़ी हो गए थे.

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जब अमजद अली खां ने कहा, 'मैं सारे राग रागनियाँ भूल गया हूँ'

अमजद अली ख़ाँ बताते हैं, "वो बहुत तंदुरुस्त और लहीमशहीम थे. एक दफ़ा उन्होंने ही मुझे बताया था कि आज़ादी से पहले मेरे पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली ख़ाँ लाहौर गए थे. वो उनसे मिलने उनके होटल गए. उनको देख कर हाफ़िज़ अली ख़ाँ डर गए, क्योंकि उनकी शक्ल पहलवानों जैसी थी. उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा, हुज़ूर मैं ग़ुलाम अली हूँ. आज आपका सरोद सुने बग़ैर नहीं जाऊंगा. तीन चार तानें आपकी ज़रूर सुननी है."

वो आगे बताते हैं, "अब्बा ने उनके लिए ख़ास तौर से बजाया. उनको जब कोई आमंत्रित करता था तो वो कहते थे कि मैं होटल में नहीं ठहरूंगा. मुझे एक खाली घर चाहिए, जहाँ मैं अपना खाना ख़ुद बनाउंगा. जब वो सफ़र करते थे तो ट्रेन में उनके साथ एक असली घी का कनस्तर चलता था."

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Image caption अपने पिता और उस्ताद हाफिज़ अली खान के साथ.

अमजद अली खान कहते हैं, "1961 में जब मैं काफ़ी छोटा था तो मैं इलाहाबाद में प्रयाग संगीत समिति में एक संगीत सम्मेलन में भाग लेने के लिए गया. वहाँ ख़ाँ साहब भी पहुंचे हुए थे. उनको वहाँ एक रहने के लिए एक घर दिया गया था. उन्होंने मुझसे कहा कि खाना हमारे साथ खाना. वो अपने बेटे को ढूढ़ रहे थे कि मुनव्वर कहाँ है? वो मिल नहीं रहे थे. फिर वो ख़ुद ही बोले कि देखो बावर्चीख़ाने में होगा. और मुनव्वर वहीं पाए गए."

वो आगे बताते हैं, "उन्होंने खाना बनाने की ट्रेनिंग अपनी औलाद को भी दे दी थी. हमारे बहुत से शास्त्रीय संगीत के उस्ताद सुनने वालों से डिसकनेक्टेड रहते हैं. उन्हें पता ही नहीं रहता कि कब गाना गाना रोकना है. ख़ाँ साहब इस मामले में अपवाद थे. उन्हें हमेशा पता रहता था कि इससे ज़्यादा नहीं गाना है. श्रोता चिल्लाते रहते थे... एक और ... एक और... लेकिन ख़ाँ साहब उनकी बात नहीं मानते थे."

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बेगम अख्तर

अमजद साहब की पुस्तक में जिन बारह उस्तादों का ज़िक्र है उनमें बेगम अख़्तर का भी नाम आता है, जिनके बारे में वो कहते हैं कि जब वो गाया करती थीं तो उनकी डेढ़ कैरेट के हीरे की नाक की कील, उनके चेहरे पर नूर बरपा कर देती थी.

स्टेज के कायदे और तौर तरीकों में भी बेगम अख़्तर की बराबरी करने वाले बहुत कम लोग थे.

अमजद बताते हैं, "जब भी वो मुझसे मिलती थीं, मेरे कहने से पहले ही वो मुझे आदाब कर देती थीं. मुझे लगता था कि वो मेरा मज़ाक उड़ा रही हैं. जब भी मैं दर्शकों के बीच बैठा रहता था वो गाना शुरू करने से पहले मुझसे ज़रूर पूछती थीं, ' ख़ाँ साहब इजाज़त है.' उस समय मैं बहुत शर्मिंदा होता था लेकिन बाद में मैंने महसूस किया कि वो मेरे ज़रिए मेरे पुरखों का सम्मान कर रही थीं.'

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Image caption अमजद अली खां पुराने किले में सरोद बजाते हुए.

अमजद बेगम अख़्तर के बारे में एक और किस्सा सुनाते हैं.

सत्तर के दशक में एक बार रेडियो कश्मीर ने उन्हें और बेगम अख़्तर को एक संगीत सम्मेलन में आमंत्रित किया. पूरा हाल खचाखच भरा हुआ था.

वो बताते हैं, "मैं चूंकि उनसे छोटा था, मैंने उनसे अनुरोध किया कि वो मुझे सभा की शुरुआत करने दें.

ये सुनते ही उन्होंने अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा, 'ये ग़ुस्ताख़ी मैं नहीं कर सकती.'

जब रेडियो के अधिकारी हमे बुलाने आए तो मैंने तेज़ कदमों से चलते हुए पहले स्टेज पर पहुंचने की कोशिश की, लेकिन बेगम साहिबा मेरा हाथ पकड़ते हुए स्टेज की तरफ़ दौड़ने की कोशिश करने लगीं. नतीजा ये रहा कि मैं पीछे रह गया. उन्होंने चार ग़ज़लें गाई और मैं बैक स्टेज बैठा उन्हें मंत्रमुग्ध सुनता रहा और ईश्वर से दुआ करता रहा कि मेरा वादन भी उतना ही अच्छा हो."

अमजद के अनुसार "जब मेरा नंबर आया. तो मैंने देखा कि बेगम साहिबा सबसे आगे की पंक्ति में बैठी हुई थी. मैंने उनको सम्मान देने के लिए अपना सरोद नीचे रख दिया और उनसे कहा,'आपको सुनने के बाद मैं सारे राग रागनियाँ भूल गया हूँ. मैंने कहा अब आप होटल जाइए और आराम करिए.'

बेगम अख़्तर का जवाब था, 'लीजिए हम आपको सुन भी नहीं सकते? बिस्मिल्लाह करिए.......' बेगम अख़्तर का ये दुलार मैं अभी तक नहीं भुला पाया हूँ."

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Image caption रविशंकर

पंडित रविशंकर

भारतीय संगीत को विश्व स्तर पर स्थापित करने का श्रेय अगर किसा एक शख्स को दिया जा सकता था, तो वो थे रविशंकर. उनकी लोक संगीत की समझ बहुत बड़ी थी. उनके तरकश में धमार, चौताल, चार ताल की सवारी और पंचम सवारी जैसे कई तीर थे.

अमजद बताते हैं, "जब भी हम अमरीका और ब्रिटेन में मिलते थे, हम लोग साथ खाना खाते थे. हमारे पास एक 1989 में खींची गई एक तस्वीर है जब एक दिन रविशंकर हमारे घर दिन के खाने पर आए थे और उन्होंने अचानक कहा था कि उनका सरोद बजाने का मूड है. जब वो सितार बजाने लगे तो फिर मैंने सितार पकड़ लिया. वो हमें अपना गुरु भाई समझते थे क्योंकि उनके उस्ताद अलाउद्दीन ख़ाँ, जो कि उनके ससुर भी थे और मेरे वालिद ने एक ज़माने में एक ही गुरु से सीखा. मेरी पत्नी सुब्बालक्ष्मी बहुत अच्छी भरतनाट्यम नर्तकी हैं. उन्होंने रुक्मणी देवी अरुंडेल से सीखा है. रविशंकर की पत्नी सुकन्या उनकी बहुत बड़ी प्रशंसक थीं क्योंकि उन्होंने भी भरतनाट्यम सीखा था. इसकी वजह से भी हमारे परिवारों के बीच नज़दीकी बढ़ी."

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Image caption भीम सेन जोशी के साथ अमजद अली खान.

भीमसेन जोशी

अमजद अली ख़ाँ और भीमसेन जोशी ने भी कई संगीत समारोहों में एक साथ भाग लिया है.

अमजद कहते हैं कि भीमसेन जोशी के बाद बजाना हर एक के बूते की बात नहीं हुआ करती थी. भीमसेन कई भाषाएं बोल सकते थे जिसकी वजह से भी वो श्रोताओं में बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे.

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Image caption अपने पिता और उस्ताद हाफिज़ अली खान के साथ सरोद बजाते हुए.

अमजद बताते हैं, "वो बहुत ही कोमल ह्रदय इंसान थे. उनके पिता संगीतकार नहीं थे. वो अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर ऊपर आए थे. एक समय में वो हमारे वालिद से सीखने ग्वालियर आए थे. दो राग उन्होंने मुझे ऐसे समझाए, पूरिया और महरबा, कि मैं आज तक उन्हें बजाता हूँ और आज तक उन्हें याद करता हूँ."

वो आगे बताते हैं, "ये एक ही सुरों के दो राग हैं लेकिन उनका अलग अलग कैरेक्टर उन्होंने ही मुझे समझाया. वो कहा करते थे कि मैं ग्वालियर इसलिए भी आता था कि कि सीखने के साथ साथ यहाँ खाना मुफ़्त मिला करता था. जब मैं पुणे जाता था तो वो खुद हमारा हाथ पकड़ कर स्टेज पर ले जाते थे., और बीस पच्चीस हज़ार लोगों के सामने कहा करते थे, पता है ये कौन हैं ? ये मेरे गुरु भाई हैं. मुझे नहीं पता था कि मेरी पत्नी ने उनसे अनुरोध किया था कि वो मेरी सालगिरह पर हमारे घर पर आ कर कुछ गाएं. वो मेरी 49 वीं सालगिरह थी. उनका पूरा परिवार उनके साथ आया. उन्होंने शुद्ध कल्याण गाया और फिर हमने साथ बैठ कर खाना खाया."

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कुमार गंधर्व

कुमार गंधर्व के लिए भी अमजद अली ख़ाँ के मन में बहुत सम्मान है. बचपन में उन्हें तपेदिक हो गया था जिसकी वजह से उनका एक फेफड़ा पूरी तरह से नष्ट हो गया था. इसके बावजूद कुमार गंधर्व के गायन ने उत्कृष्टता की बुलंदियों को छुआ.

अमजद याद करते हैं, "भीमसेन जोशी और कुमार गंधर्व वोकल संगीत के चेहरे बन गए थे हमारे देश में. उन्होंने मालवा के लोक संगीत को भी अपने संगीत में स्थान दिया. एक बार हम लोग भोपाल से इंदौर कार से जा रहे थे. मेरी पत्नी और मेरी वालिदा भी हमारे साथ थीं. जब देवास आया तो हमें ख़्याल आया कि यहाँ तो कुमार जी रहते हैं. उस ज़माने में अपॉइंटमेंट वगैरह लेने की ज़रूरत नहीं होती है, तो हम सीधे उनके घर पहुंच गए. वो झूले पर बैठे हुए थे और हमें देख कर बहुत खुश हुए और वसुंधराधी ने हम सब को चाय पिलाई."

Image caption बीबीसी स्टूडियो में रेहान फज़ल के साथ अमजद अली खान

उस्ताद विलायत खां

उस्ताद विलायत ख़ाँ ने आठ साल की उम्र में अपनी पहली 78 आरपीएम की डिस्क रिकार्ड कराई थी.

अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह ज़ाहिर शाह उनसे इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने 1964 में उन्हें एक मर्सिडीज़ बेंज़ कार उपहार में दी थी.

विलायत ख़ाँ साहब को ताश खेलने, पश्चिमी कपड़े पहनने और बॉल रूम डांसिंग का बहुत शौक़ था.

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Image caption उस्ताद विलायत खां का अभिवादन करते हुए अमजद अली खान.

अमजद अली ख़ाँ याद करते हैं, "जब मैं युवा था तो उनका सितार सुन कर ऐसा लगता था कि क्या किसी इंसान के लिए इतना अच्छा सितार बजाना संभव है? उनके सितार वादन में स्पीड और तकनीक तो थी ही, उसकी सबसे बड़ी ख़ासियत थी उसकी टोनल क्वालिटी. सितार वादन में आप सिर्फ़ दो ही आदमियों के नाम सुनेंगे, एक रविशंकर और दूसरे उस्ताद विलायत ख़ाँ."

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वो बताते हैं, "एक बार दिल्ली में नैना देवी की बरसी पर एक संगीत सम्मेलन हुआ था. एक दिन मैं बजा रहा था तो विलायत ख़ाँ साहब ऑडियंस में थे और दूसरे दिन जब वो बजा रहे ते तो मैं उनके सामने बैठा उनको सुन रहा था. मैंने राग श्री बजाया था. दूसरे दिन विलायत ख़ाँ साहब राग पीलू बजा रहे थे. अचनानक उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और वो राग श्री बजाने लगे. बोले, अमजद मुझे माफ़ करना. कल का तुम्हारा बजाया श्री मेरे दिमाग में घूम रहा है. इसलिए मेरा भी जी चाह रहा है श्री बजाने का.

"इस तरह का सम्मान विलायत खाँ के स्तर का शख़्स ही दे सकता था. ये उनका बड़प्पन था कि उन्होंने सारे दर्शकों के सामने माना कि उन्हें मेरा बजाया राग श्री पसंद आया. हमारे पेशे में इस तरह खुल कर तारीफ़ कोई नहीं करता."

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