उत्तर प्रदेश: सपा में घमासान का नया दौर शुरू हो गया है ?

  • 8 अप्रैल 2017
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समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव ने अखिलेश को चुनाव से पहले किए वादे की याद दिलाते हुए एक बार फिर पार्टी में दो-फाड़ जैसी स्थिति को हवा दे दी है.

शिवपाल ने इटावा में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "अखिलेश ने नेताजी को पद वापस करने का वादा किया था, अब उसे पूरा करें."

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इससे पहले शिवपाल यादव की मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के साथ मुलाक़ात भी चर्चा में रही और उससे ज़्यादा चर्चा में रही मुलायम सिंह की दूसरी बहू अपर्णा बिष्ट यादव की योगी से पिछले दो हफ़्ते में तीन बार मुलाक़ात.

इन दोनों घटनाओं के अलावा पार्टी छोड़ने वाले नेताओं का सिलसिला भी चर्चा में है.

शिवपाल से मतभेद

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बताया जा रहा है कि इसीलिए अखिलेश यादव पार्टी के अलग-अलग मोर्चों और प्रकोष्ठों की ताबड़तोड़ बैठकें कर रहे हैं. विधानसभा चुनाव की समीक्षा बैठक में शिवपाल यादव और मुलायम सिंह यादव को न बुलाया जाना पार्टी के भीतर चल रहे घमासान के प्रमाण माने जा रहे हैं.

दरअसल, विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद समाजवादी पार्टी में हार की ज़िम्मेदारी को लेकर भी आंतरिक घमासान मचा हुआ है. चुनाव से पहले जिस तरह से अखिलेश यादव ने पूरी पार्टी को अपने नेतृत्व में ले लिया था, उससे ये समझने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए थी कि हार या जीत दोनों की ज़िम्मेदारी उन्हीं की होगी.

छोड़ रहे हैं पार्टी

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उधर, पार्टी में दरार तो चुनाव से पहले ही पड़ चुकी थी, हार के बाद नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है.

पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता, लीगल सेल के अध्यक्ष और राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता रहे गौरव भाटिया पार्टी पहले ही छोड़ चुके थे, अब बीजेपी में शामिल होकर समाजवादी पार्टी की बखिया उधेड़ रहे हैं.

वहीं दो दिन पहले पार्टी की महिला मोर्चा की अध्यक्ष श्वेता सिंह ने पार्टी से नाता तोड़ लिया.

श्वेता सिंह फ़िलहाल किसी अन्य दल में तो शामिल नहीं हुई हैं, लेकिन पार्टी छोड़ने की वजह कुछ इस तरह बताती हैं, "पार्टी में जिस तरह से भ्रम की स्थिति बनी हुई है और पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही है उसे देखकर वहां दम घुटने लगा है.''

उन्होंने कहा, ''इतनी बड़ी हार के बाद भी पार्टी के नेता हार के कारण नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं, इससे ज़्यादा अफ़सोसजनक बात क्या हो सकती है. परिवार का झगड़ा पार्टी का आम कार्यकर्ता भुगतने को विवश हो रहा है."

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श्वेता सिंह का ये भी कहना था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से कुछेक नेताओं को छोड़कर बाक़ी नेता मिलने का भी समय नहीं पा रहे हैं जबकि हम लोगों को उनसे काफी उम्मीद थी कि अच्छा नेतृत्व करेंगे.

श्वेता सिंह की तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ख़ासा प्रभाव रखने वाले युवा नेता राजेश यादव भी कुछ दिन पहले पार्टी को अलविदा कह गए और उन्होंने भी अखिलेश यादव पर सीधा निशाना साधा है.

इसके अलावा अपर्णा यादव भी सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से हार के लिए अखिलेश को ज़िम्मेदार ठहरा चुकी हैं.

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एका बना रहेगा?

यही नहीं, अंबिका चौधरी जैसे बड़े नेता तो चुनाव से पहले ही पार्टी छोड़कर जा चुके हैं, आज़म ख़ान और नरेश अग्रवाल सरीखे वरिष्ठ नेताओं को भी नए माहौल में बहुत तवज्जो नहीं मिल रही है.

कुछ लोग अटकलें लगा रहे हैं कि अखिलेश शिवपाल के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करते हैं तो ऐसे में शिवपाल कोई नई पार्टी बना सकते हैं.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं कि पार्टी में तमाम विरोधाभासों के बावजूद किसी और पार्टी के बनने की उम्मीद कम ही है, "पार्टी में अनौपचारिक विभाजन तो हो ही चुका है.

शिवपाल और अपर्णा एक रास्ते पर हैं, अखिलेश दूसरे पर. पार्टी में चुनाव होने पर क्या होगा, ये देखने वाली बात होगी, लेकिन फ़िलहाल समर्थन अखिलेश के पास ही रहेगा."

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