बहाने अनेक, शराब की दुकानें बचाने की तिकड़म एक

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राजमार्गों से 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों पर पाबंदी के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सभी राज्य अपने यहां शहरों क़स्बों से गुज़रने वाली सड़कों के नाम बदलने जैसे हथकंडे अपना रहे हैं.

शहरों से गुजरने वाले राष्ट्रीय और राजकीय मार्गों पर शराब की दुकानें बंद होने पर कैसे रास्ते निकाले जाएं, इसकी कवायद हर राज्य कर रहा है.

इन कोशिशों के तहत उन सड़कों को शहरी निकायों में शामिल किया जा रहा है या उन्हें डीनोटिफ़ाई किया जा रहा है.

पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने राजमार्गों पे शराब की दुकानों को या तो बंद या 500 मीटर दूर स्थानांतरित करने का आदेश दिया था. आदेश 1 अप्रैल, 2017 से लागू हो चुका है.

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Image caption चमोली में शराब का विरोध करती महिलाएं

रोहित घोष, कानपुर से

शराब की बिक्री से होने वाले राजस्व को बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी रिकॉर्ड में राजमार्गों का नामकरण कर दिया है.

दुकानों के बंद होने से राजस्व के भारी नुकसान को बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने शहरों से गुजरने वाले राजमार्गों को अदर डिस्ट्रिक्ट रोड (ओडीआर या फिर दूसरे ज़िले की सड़क) का दर्जा दे दिया है.

इससे कई शराब की दुकानें बंद होने से बच जाएंगी.

हाल ही में प्रदेश में पीडब्ल्यूडी के अतिरिक्त प्रमुख सचिव सदाकांत ने एक आदेश जारी करके कहा, "शहर के बीच से गुज़रने वाले सभी राजमार्गों को अदर डिस्ट्रिक्ट रोड का दर्जा दिया है."

उत्तर प्रदेश में 8000 के आस-पास शराब की दुकानें और बार हैं. इन बार और दुकानों से सरकार को करीब 6000 रुपए करोड़ का राजस्व मिलता है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लखनऊ में करीब 200, कानपुर में 100, वाराणसी में 225 और इलाहाबाद में 150 दुकानों या तो बंद हो जाती या फिर उन्हें स्थानांतरित करना पड़ता.

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पीएम तिवारी, कोलकाता से

सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी से बचने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के 277.3 किमी लंबे हाइवे को स्थानीय सड़क का दर्जा दे दिया है. इनमें पांच अलग-अलग हाइवे शामिल हैं.

दिलचस्प बात यह है कि ममता बनर्जी सरकार ने अदालत का अंतिम आदेश आने से पहले 16 मार्च को ही यह तब्दीली करते हुए इनके रखरखाव का जिम्मा पीडब्ल्यूडी को सौंप दिया था.

लेकिन इस अधिसूचना की जानकारी चार अप्रैल को हुई.

इन सड़कों के स्थानीय नाम भी तय कर लिए गए हैं. राज्य में शराब की 5,600 में से 1,537 दुकानें हाइवे के किनारे हैं.

स्टेट हाइवे के 500 मीटर के दायरे में 647 दुकानें हैं और नेशनल हाइवे के किनारे 892 दुकानें. सरकार को शराब की बिक्री से सालाना 3,400 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है.

हावड़ा में स्टेट हाइवे-6 पर स्थित एक शराब की दुकान के स्टोर मैनेजर सुब्रत मंडल कहते हैं, 'मुझे भरोसा था कि सरकार प्रभावितों को बचाने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेगी.'

यही नहीं, सरकार ने क़ानून के जद में आने वाली शराब की दुकानों को स्थानांतरित करने के लिए लाइसेंस की नवीनीकरण की फीस माफ करने की भी पेशकश की है.

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राजेश डोबरियाल, देहरादून से

उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने राज्य के शहरी स्थानीय निकाय क्षेत्रों की सीमा के अंदर आने वाले राजमार्गों को अवर्गीकृत (डिनोटिफोई) कर दिया है.

राज्य में 64 राज्य मार्ग हैं जिनमें 63 नगर निकाय में आते हैं.

इसका सीधा असर यह होगा कि अब इन सड़कों के किनारे स्थित शराब की दुकानों को शिफ़्ट करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

हालांकि सरकार ने इसके पीछे जनसंख्या के दबाव को कारण बताया है.

राज्य मार्गों के वे भाग जो किसी भी शहरी स्थानीय निकाय यथा नगर निगम, नगर पालिका परिषद अथवा नगर पंचायत की सीमा से गुजरते हों, को राज्यमार्ग की श्रेणी से अन्य जिला मार्ग में बदल दिया गया है.

उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी और महिला मंच की संयोजक कमला पंत इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मज़ाक उड़ाना कहती हैं.

कमला पंत कहती हैं, "राज्य बनने से पहले से पहाड़ में महिलाएं शराब का विरोध करती रही हैं क्योंकि इससे सबसे ज़्यादा वही प्रभावित होती हैं. आज कोई ऐसा ज़िला नहीं है जहां महिलाएं सड़कों पर न आई हों."

नीरज सिन्हा, रांची से

झारखंड के उत्पाद आयुक्त ने पथ निर्माण विभाग के सचिव को एक पत्र भेजा है.

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इसमें राष्ट्रीय और राजकीय मार्गों की जिलावार विवरणी के साथ खुदरा शराब की दुकानों के बारे में जानकारी दी गई है . इसके साथ ही राजस्व हित में आवश्यक कार्रवाई करने को कहा गया है.

पथ निर्माण विभाग के सचिव मस्तराम मीणा का कहना है कि उत्पाद विभाग के पत्र के आलोक में नियम- प्रावधानों पर विभाग गौर कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य में शराब की 670 दुकानें बंद हो गई हैं. इनमें सबसे अधिक राजधानी रांची में 83 दुकानें हैं.

इस बीच, नेशनल और स्टेट हाइवे पर शराब की दुकानें बंद होने के बाद उन सड़कों के पांच सौ मीटर के दायरे से बाहर निकलकर घनी आबादी के बीच दुकानें खोले जाने की तैयारियों का जगह-जगह विरोध होने लगा है.

हाल ही में संतालपरगना में महिलाओं ने इसी तरह के मामले में मुख्यमंत्री के सामने विरोध जताया था.

राज्य में पूर्ण शराबबंदी को लेकर वैसे ही महिलाओं ने विरोध का मोर्चा खोल रखा है.

शराब के खिलाफ महिलाओं के बीच 'हमारी ना' कार्यक्रम चला रही कांग्रेस की दीपिका सिंह पांडेय कहती हैं कि राजस्व की दुहाई देकर पहले खुद शराब बेचने के निर्णय के बाद अब बंद दुकानों को खोलने के लिए सरकार नए हथकंडे अपना रही है.

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