'मोगली गर्ल' पर कौन सही- पुलिस या विशेषज्ञ?

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बहराइच के कतर्निया घाट के जंगलों में जिस जगह से कथित मोगली गर्ल मिली थी वहां के पुलिस थानाध्यक्ष के एक बयान ने पूरी घटना पर सवाल उठा दिए हैं.

उनका कहना है कि न तो ये लड़की बंदरों के बीच मिली थी और न ही वो बिना कपड़ों के थी.

थानाध्यक्ष राम अवतार सिंह यादव ने बीबीसी को ये भी बताया कि लड़की की मानसिक हालत ठीक नहीं थी और शायद इसीलिए उसके मां-बाप ने उसे जंगल में छोड़ दिया होगा.

लेकिन उसी इलाक़े के वन विभाग के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि लड़की बंदरों के ही साथ मिली और उसने कपड़े नहीं पहन रखे थे.

इलाक़े के डीएफओ जेपी सिंह दावा करते हैं कि उनके कर्मचारियों ने इसे बंदरों के साथ देखा था और फिर गांव वालों के साथ पुलिस को इसकी सूचना दी गई.

बंदरों के बीच रह रही थी ये 'मोगली गर्ल'

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यूपी के बहराइच में मिली आठ साल की लड़की की कहानी.

जानवरों जैसी आदतें

यही नहीं, प्रत्यक्षदर्शी होने का दावा करने वाले एक शख्स शोएब का कहना है कि थाने पर इस बच्ची को पहले पुलिस वालों ने लेने से ही मना कर दिया था. बाद में दबाव पड़ने पर उसे पुलिस वालों ने लेकर अस्पताल में भर्ती कराया.

25 जनवरी को मिली इस बच्ची का इलाज करने वाले डॉक्टरों का भी यही कहना है कि बच्ची के हाव-भाव और उसकी आदतें जानवरों जैसी थीं जो दो महीने के इलाज के बाद कुछ हद तक सुधर रही हैं.

बहराइच के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर डीके सिंह इस बारे में पहले ही बता चुके थे कि लड़की नग्न अवस्था में बंदरों के साथ मिली थी और उसके शरीर पर कई जगह घाव के निशान भी इसी वजह थे क्योंकि बंदरों ने उसे उनसे छुड़ाने का विरोध किया था.

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Image caption बहराइच के ज़िलाधिकारी ने लड़की को वन दुर्गा नाम दिया

फ़िलहाल इस लड़की को निर्वाण नामक मेंटल केयर सेंटर में रखा गया है. इस संस्था के निदेशक सुरेश सिंह धपोला ने बच्ची से हमारी मुलाक़ात कराई और उन्होंने दावा कि बच्ची की मानसिक हालत सामान्य है.

धपोला कहते हैं, "जिस तरह से चीजों को खाने की आदत है, पीठ पर चिपकने की आदत है, चीखने का तरीक़ा है उसे देखते हुए साफ़ पता चलता है कि ये बंदरों के बीच लंबे समय से रही होगी. रही बात मानसिक रूप से कमज़ोर होने का तो अभी तक हमने जो कुछ भी देखा और समझा है उससे इसका आईक्यू यानी मानसिक स्थिति सामान्य लगती है."

सुरेश सिंह धपोला ये भी कहते हैं कि यह लड़की गूंगी या बहरी भी नहीं है बल्कि मनुष्यों की भाषा से इसका पाला ही नहीं पड़ा, इसीलिए वो सीख नहीं पाई.

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वो कहते हैं, "क़रीब दो महीने से ये अस्पताल में है और दो दिन से हमारे साथ भी है तो दो-तीन शब्द बोलने भी लगी है. ये ज़रूर है कि ये जो बी बोल रही है वो कोई सार्थक शब्द नहीं हैं लेकिन इससे ये पता चलता है कि ये बोलना जल्दी ही सीख जाएगी."

यही नहीं, बच्ची की देखभाल कर रही महिलाओं का भी कहना था कि उसकी आदतें सामान्य मनुष्यों जैसी नहीं हैं लेकिन धीरे-धीरे वह सामान्य हो रही है.

इससे पहले बहराइच के ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक भी बच्ची को बंदरों के साथ रहने और उनकी तरह हरकतें करने की संभावना जता चुके हैं.

वहीं जानकारों का कहना है कि बच्ची यदि मानसिक रूप से कमज़ोर होती तो उसकी हरकतें इतनी जल्दी सामान्य न हो पातीं. ये ज़रूर है कि सच्चाई का पता कुछ दिनों तक उसकी देख-रेख करने के बाद ही चल सकेगा.

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