ब्लॉग: गांधी जी पर मोदी जी का भाषण ओजस्वी था

  • 11 अप्रैल 2017
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गांधी के बारे में किसी गांधीवादी ने इतना शानदार भाषण कभी नहीं दिया, जितना मोदी जी ने चंपारण सत्याग्रह की सौवीं वर्षगांठ के मौक़े पर दिया.

कोई गांधीवादी दे भी नहीं सकता. गांधी ख़ुद ही वक्ता नहीं थे, गांधी को सुनिए यूट्यूब पर. मोदी जी को भी उस एंगल से सुनिए, सुनिए तो सही.

संघ की शब्दावली में जिसे 'ओजस्वी वक्ता' कहा जाता है गांधी उसके बिल्कुल उलट थे. उनके शिष्य भी ऐसे ही रहे. जेपी-विनोबा-राजमोहन सभी सादगी और नरमी से बोलने वाले.

गांधी और गांधीवादी अंतरात्मा की फुसफुसाहट सुनते थे और उसी स्वर में बोलते थे.

बाद वालों में से अनेक ने अंतरात्मा को बेच खाया जिस पर उनकी भरपूर लानत-मलामत हो चुकी है, फ़िलहाल तो उन पर ध्यान दीजिए जो देश का कुछ बना-बिगाड़ रहे हैं.

प्रधानमंत्री बोलते जानदार हैं और उनकी चुप्पी भी शानदार होती है. यूपी में योगी जी के सत्ता-आश्रम में प्रवेश के बाद से लोग पीएम से कुछ ओजस्वी सुनने के लिए तरस रहे थे.'

चंपारण सत्याग्रह का असल 'मक़सद'

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'ओजस्वी वक्ता' की शब्दावली में सिंह-गर्जना, हुंकार, दहाड़, ललकार, शंखनाद, सीने का नाप वगैरह होना ज़रूरी है. ये बातें गांधी के साथ फिट नहीं होतीं, फिर क्या किया जाए?

चंपारण सत्याग्रह का असली मक़सद सफ़ाई था, ये हमें स्कूल-कॉलेज में नहीं पढ़ाया गया, सीधे मोदी जी ने सौ साल बाद बताया. पहली बार पता चला कि असल में गांधी चंपारण में 'स्वच्छाग्रह' कर रहे थे.

गांधी-दर्शन में शायद स्वच्छता ही एकमात्र वो विचार है जिससे मोदी जी और उनके प्रेरक-पुरुषों को परहेज नहीं है.

सत्य, अहिंसा और धर्मनिरपेक्षता के बारे में गांधी के जो विचार थे उनका पर्याप्त सम्मान गांधी के गृहराज्य में किया जा चुका है.

गांधी का चंपारण सत्याग्रह संगठित औपनिवेशिक पूंजीवादी शोषण-दमन के ख़िलाफ़ संघर्ष था, आज भी पूरे देश में जल-जंगल और ज़मीन की लड़ाई लड़ रहे वंचितों-दलितों-आदिवासियों का संघर्ष उससे अलग नहीं है.

गांधी के उस संघर्ष को स्वच्छता अभियान में बदल देना, ज़बान की सफ़ाई है, नीयत की नहीं. और ये काम एक ओजस्वी वक्ता ही कर सकता है.

मोदी के लिए चुनौती नहीं अवसर हैं योगी

गांधी के असल मूल्य

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ओजस्वी वक्ता जो बोलते हैं वही ओजस्वी हो जाता है. सोमवार को संसद में नस्लभेद वाले मामले पर भाजपा सांसद तरुण विजय की क्षमा याचना को, 'याचना नहीं, अब रण होगा' वाले सुर में सिर्फ़ राजनाथ सिंह जैसे ओजस्वी वक्ता ही दोहरा सकते थे.

गांधी ने अपने दोनों हाथों से जितना लिखा है, सब दर्ज है. सत्य, अहिंसा, धर्मनिरपेक्षता और पीड़ित-शोषित व्यक्ति के प्रति उनकी करुणा पूरे संसार के सामने है.

जब अल्पसंख्यक हिंदू पूर्वी बंगाल में मारे जा रहे थे तो अक्तूबर 1946 में गांधी नोवाखाली में अनशन कर रहे थे, और जब देश आज़ादी का जश्न मना रहा था तो गांधी उससे दूर पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के कत्लेआम को रोकने के लिए उपवास कर रहे थे.

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अब जब दादरी और अलवर की घटनाएँ होती हैं तो लोग उम्मीद करते हैं कि ओजस्वी वक्ता कुछ कहेंगे, लेकिन वे या तो मौनव्रत रखते हैं या फिर 'कुत्ते के पिल्ले' को लेकर करुणा से भर जाते हैं.

बोलना और चुप रहना सबका मौलिक अधिकार है, प्रधानमंत्री की मर्ज़ी जब चाहें बोलें न बोलें, कौन उन्हें विवश कर सकता है?

लेकिन एक तमन्ना है कि प्रधानमंत्री ने जैसा ओजस्वी भाषण गांधी के बारे में दिया, वैसा ही एक भाषण वे संयुक्त राष्ट्र में गुरू गोलवलकर और हेडगेवार जी के बारे में दे आएँ.

काश कि दुनिया को पता चल जाए कि गोलवलकर और हेडगेवार ने जब अँगरेज़ों के ख़िलाफ़ सत्याग्रह, भारत छोड़ो और सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलन छेड़ रखे थे तब गांधी स्वच्छाग्रह में लगे हुए थे.

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