नजरिया: भारत का अगला राष्ट्रपति कौन होगा?

  • 14 अप्रैल 2017
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अगला राष्ट्रपति कौन होगा, इस पर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और मोहनराव भागवत की त्रिमूर्ति अपने अंतिम विचार रखने वाली है.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल इसी साल जुलाई में ख़त्म हो रहा है.

बीजेपी के बुज़ुर्ग और वरिष्ठ नेताओं समेत बाकी नेताओं में इसे लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है, हालांकि शायद ही किसी को इस बारे में मुकम्मल अंदाज़ा हो.

12 अप्रैल को अभूतपूर्व रूप से संसद सत्र सफलता के साथ समाप्त हुआ है और अब सत्ता के गलियारों में सिर्फ मुखर्जी के वारिस की चर्चा है.

हालांकि जारी अटकलों, संकेतों और अनुमानों में कुछ ही तथ्य ध्यान देने वाले हैं.

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बीजेपी के लिए बढ़िया मौका

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पहला, मुखर्जी के दूसरे कार्यकाल की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चली हैं.

पिछले विधानसभा चुनावों, खासकर उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से जीत के बाद बीजेपी और एनडीए सदस्य निर्वाचन मंडल में आधा रास्ता तय करने के क़रीब हैं, जहां राष्ट्रपति का चुनाव होता है.

इसका मतलब है कि अगर बीजेपी को मुखर्जी के दूसरे कार्यकाल पर विचार भी करना पड़ सकता था, तो चुनावी नतीजों ने इसे ख़त्म कर दिया है.

लोकसभा और कई राज्यों में बहुमत होने के कारण, आरएसएस के सरसंघचालक भागवत, प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह स्थिति राष्ट्रपति भवन में अपना उम्मीदवार बिठाने के लिए एक बढ़िया मौका है.

ये वाजपेयी राज नहीं

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याद करिए उन परिस्थितियों को जब एपीजे अब्दुल कलाम को बीजेपी नीत एनडीए सरकार में 2002 में राष्ट्रपति चुना गया था.

हालांकि कलाम उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और बीजेपी की पसंद थे, लेकिन समाजवादी पार्टी के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव ने उनका नाम आगे किया था.

इसलिए कि जब मुलायम सिंह रक्षा मंत्री थे, दोनों ने साथ काम किया था.

तब वाजपेयी मानते थे कि उनकी सरकार में प्रमुख पद पर एक मुस्लिम होना चाहिए क्योंकि उसी समय गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी और उनके सरकार की आलोचना हो रही थी.

उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने माफी मांगने या अफसोस जताने तक से इनकार कर दिया था.

कलाम का चुनाव अलग था

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कलाम संस्कृत और हिंदू ग्रंथों के जानकार थे और वीणा भी बजाते थे.

आरएसएस-बीजेपी के 'आदर्श राष्ट्रवादी मुस्लिम' खांचे में वो फिट बैठते थे.

पंद्रह साल बाद, मोदी को वाजपेयी बनने की ज़रूरत नहीं. यूपी के नतीजों के बाद, सरकार की विचारधारा और धारणा को लेकर केंद्र ने शायद ही कोई संदेह की गुंजाइश छोड़ी है.

सार्वजनिक कार्यालयों में वंदे मातरम् गाना अनिवार्य करने की तरह ही गौरक्षा में दिखने वाला 'राष्ट्रवाद' आज का क़ानून है.

संभावना है कि ये त्रिमूर्ति, आरएसएस से आने वाले किसी व्यक्ति को रायसिना हिल्स में बैठाएगी, ये सुनिश्चित करते हुए कि वो ज्ञानी जैल सिंह जैसी परेशानी खड़ा करने वाला न हो.

राज्यपालों का नाम भी दौड़ में

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दूसरा, झारखंड के राज्यपाल द्रौपदी मूर्मू, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक जैसे कुछ राज्यपालों के संभावित नाम भी चर्चा में हैं.

मूर्मू का नाम इसलिए आया क्योंकि वो ओडिशा से हैं और संघ का आदिवासी चेहरा हैं.

ओडिशा में होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी बड़ी उपलब्धि हासिल करने की आस लगाए है.

बीजेपी में जिन लोगों ने मूर्मू का नाम उछाला, उनका कहना है कि देश में दलित और अल्पसंख्यक राष्ट्रपति पद तक पहुंचे हैं लेकिन कोई आदिवासी यहां तक नहीं पहुंच पाया.

ऐसा लगता है कि मोदी का कुछ समय के लिए आदिवासी उम्मीदवार के प्रति झुकाव था, इसीलिए 2012 में एनडीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार पीए संगमा को बनाया गया, जबकि कहा गया कि एलके आडवाणी और सुषमा स्वराज तैयार नहीं थे.

हालांकि कुछ राज्यपालों की अतिसक्रियता पर उन्हें मोदी और शाह से दूरी बनाए रखने की हिदायत दी गई है.

वरिष्ठ नेताओं की संभावना नहीं

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तीसरा, सरकार में मोदी और शाह के क़रीबी रहने वाले लोग आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुमित्रा महाजन और सुषमा स्वराज की उम्मीदवारी संभावना को ख़ारिज कर चुके हैं.

यह जगजाहिर है कि मोदी और आडवाणी-सुषमा के बीच भरोसे की इतनी कमी है कि इसे भरा नहीं जा सकता क्योंकि दोनों नेताओं ने 2013-14 में मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की खुलकर मुख़ालफ़त की थी.

बीजेपी के 'मार्ग दर्शक मंडल' में शामिल किए जाने के बाद, मोदी ने उनको बहुत तवज्जो नहीं दी है, इसके बावजूद कि जोशी बीजेपी में मोदी के असली मार्गदर्शक रहे हैं.

चौथा, कुछ लोग मानते हैं कि मोदी आरएसएस से बाहर के किसी को ला सकते हैं, हालांकि वो व्यक्ति कलाम जैसा 'राष्ट्रवादी' मानसिकता का होगा.

कांग्रेस उतारेगी उम्मीदवार

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एनडीए के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ उम्मीदवार उतारने के लिए कांग्रेस विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में होगी.

हालांकि ममता बनर्जी के अलावा किसी और विपक्षी नेता ने इस मामले में अपनी राय ज़ाहिर नहीं की है.

10, 98, 882 के निर्वाचक मंडल में राज्यसभा और लोकसभा के सांसदों के साथ राज्यों की विधानसभाओं के चुने प्रतिनिधि, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और पुडुचेरी के केंद्र प्रशासित राज्य में एनडीए के पास 5, 49, 442 वोट हैं.

सत्तारूढ़ गठबंध महज 24, 522 वोटों से पीछे है.

यह अंतर उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के चुनावों से पहले 79, 274 था.

इस अंतर को भरने के लिए बीजेपी एआईएडीएमके, बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी पार्टियों की ओर देख रही है.

क्षेत्रीय दलों पर दारोमदार

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एआईएडीएमके के साथ केंद्र के साथ रिश्ते जयललिता के ज़माने जैसे मधुर नहीं रह गए हैं.

शशिकला नटराजन के नेतृत्व वाले एआईएडीएमके का धड़ा केंद्र से नाराज़ है और मानता है कि चेन्नई के आरके नगर उप चुनाव के रद्द होने में केंद्र ज़िम्मेदार है.

जयललिता की मृत्यु के बाद यह सीट खाली हुई थी और इस पर शशिकला के भतीजे दिनाकरन चुनाव लड़ रहे हैं.

हालांकि यह फैसला पूरी तरह चुनाव आयोग का था, लेकिन केंद्र और शशिकला धड़े के बीच अविश्वास की खाई बन गई है.

इस क़दम के लिए बीजेपी को वो ज़िम्मेदार ठहराता है.

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बीजेपी की पुरानी सहयोगी पार्टी शिव सेना का रुख भी बहुत अप्रत्याशित हो चुका है, इसके बावजूद कि दोनों साथ साथ महाराष्ट्र सरकार चला रहे हैं.

इसलिए बीते दस अप्रैल को एनडीए गठबंधन के लिए मोदी की ओर से दी गई डिनर पार्टी और खुद के नेतृत्व में विश्वास जताने वाले प्रस्ताव हासिल करना, राष्ट्रपति चुनावों से पहले इस बात का संकेत देना था कि उनका घर ठीक ठाक है.

ये साफ संकेत देना भी मक़सद था कि विपक्ष को सपने देखने बंद कर देना चाहिए और काल्पनिक मुश्किलों में खयाली पुलाव पकाने बंद कर देने चाहिए.

हालांकि राष्ट्रपति चुनाव में अभी तीन महीने बाकी हैं और स्थिति अभी भी पहेली बनी हुई है.

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