नज़रिया : 'छात्र आन्दोलन कर रहे हों तो राष्ट्र विरोधी ही होंगे'

  • 13 अप्रैल 2017
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पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़ में फीस में बढ़ोत्तरी का विरोध कर रहे छात्रों पर लगाई गई राष्ट्र द्रोह की आपराधिक धाराएँ हटा ली गई हैं, ऐसा पुलिस ने कहा है.

विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने कहा है कि उसने छात्रों के खिलाफ ऐसा कुछ नहीं कहा था कि ये समझा जाए कि वे राष्ट्रद्रोह की गतिविधियों में शरीक थे. लेकिन पुलिस ने उन्हें गलत समझ लिया.

उन्होंने तो पुलिस को सिर्फ इतना बताया था कि छात्र विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, मान संसाधन मंत्रालय,आदि के खिलाफ नारे लगा रहे थे. सरकार के खिलाफ नारेबाजी को पुलिस राष्ट्र विरोधी जुर्म समझ बैठी तो आखिर विश्वविद्यालय के अधिकारियों का क्या कसूर?

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छात्र नारे लागा रहे थे तो ज़रूर राष्ट्र विरोधी हरकत कर रहे होंगे,यह पिछले साल के जेएनयू प्रकरण के बाद आम समझ सी बन गई है.

उस समय से आज तक केन्द्रीय सरकार के मंत्रियों, दिल्ली पुलिस और शासक दल इस बात का प्रचार करते ही जा रहे हैं कि जेएनयू के छात्र राष्ट्र विरोधी अपराध कर रहे थे.

उसके पहले हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी रोहित वेमुला और उनके साथियों पर एक केन्द्रीय मंत्री ने ऐसे ही आरोप लगाए थे. हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज प्रसंग में भी यही आरोप दुहराया गया कि वहां के छात्र और शिक्षक राष्ट्रविरोधी अपराध कर रहे थे.

पुलिस का रोल

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इस माहौल में बेचारी पुलिस ,वह दिल्ली की हो या चंडीगढ़ की या जोधपुर की,करे क्या? उसे तो यही लगता है कि छात्र अगर आन्दोलन कर रहे हों तो ज़रूर ही कुछ राष्ट्र विरोधी कर रहे होंगे.

इसलिए सबसे अच्छा यही है कि उनपर सबसे संगीन आपराधिक आरोप जड़ डालो.

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पुंजाब विश्वविद्यालय में चप्पे चप्पे पर पुलिस थी क्योंकि उसे इस राष्ट्र के एक अभिभावक संगठन ने चेताया था कि परिसर में एक संगीन 'राष्ट्र विरोधी' सीमा आज़ाद के आने का शक है.

यह बात पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन न कह सका कि सीमा कोई भूमिगत दहशतगर्द नहीं है, आज़ाद नागरिक हैं और कहीं भी जा सकती हैं.

उसने उन्हें रोकने को एड़ी चोटी का पसीना एक कर दिया लेकिन सब कुछ बेकार हो गया क्योंकि सीमा भेस बदल कर आईं और सभा को संबोधित करके चली भी गईं.

छात्रों से बात नहीं

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आगे भी इस पूरे प्रसंग में कई चिंताजनक बातें हैं. फीस बढ़ोत्तरी को एक तर्क से जायज़ ठहराया जा सकता है. सामान्य स्नातक कार्यक्रमों के लिए सालाना 2,200 रूपए की जगह 10000 हो सकता है, मुनासिब लगे.

लेकिन इस पर प्रशासन छात्रों को विश्वास में लेने की पहल ले सकता था. यह बात जगजाहिर है कि पंजाब विश्विद्यालय खासकर संसाधनों की किल्लत से जूझ रहा है.

कुछ वक्त पहले कुलपति ने यहाँ तक कह दिया था कि अगर साधन न दिए गए तो विश्वविद्यालय को ताला लग सकता है. वह तो गनीमत है कि यह छात्रों ने नहीं कहा था वरना इसे राष्ट्र विरोधी प्रचार माना जा सकता था.

तो विश्वविद्यालय के लिए साधन जुटाने की अपनी जद्दोजहद में क्यों नहीं कुलपति छात्रों और शिक्षकों को शामिल कर सकते थे? फीस बढोत्तरी पर भी इसी सिलसिले में बात आगे ले जाई जा सकती थी.

हिंसा ज़रूरी है ?

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हमारे शिक्षा केन्द्रों में किसी भी प्रकार की आपसी चर्चा का कोई वातावरण नहीं है. इसलिए संस्थान के भीतर चापलूसी के बाद शत्रुतापूर्ण संबंध ही हो सकते हैं.

छात्र आन्दोलन करें लेकिन क्या उसका हमेशा हिंसा में अंत अनिवार्य है? और प्रशासन ऐसी प्रक्रिया क्यों नहीं विकसित कर सकता कि छात्रों को सुना जा सके?

इस मामले में तो यह कहा जा रहा है कि छात्र मांग कर रहे थे कि उनसे बात करने को जिम्मेदार अधिकारी आएँ. यह क्यों मुश्किल था? यही हिचक जेनेयू में भी देखी गई है.

प्रशासन चूँकि खुद को विश्वविद्यालय समुदाय के प्रति नहीं सरकार के प्रति जवाबदेह मानता है इसलिए कई बार उसका रवैया 'शासक' वाला होता है. वे दिन चले गए जब कुलपति विरोध कर रहे छात्रों के धरने पर खुद बैठ जाया करते थे.

विश्वविद्यालय के सांस्थानिक तंत्र को लेकर भी विचार की ज़रुरत है. क्या फीस बढ़ोत्तरी की प्रक्रिया का अंदाज करना इतना मुश्किल था? न सही छात्र,शिक्षकों से इस पर बात की जा सकती थी!

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पुलिस की ट्रेनिंग

आंदोलनकारी छात्रों में एक हिस्से पर यह आरोप लगा रहा है कि उसने पत्थरबाजी करके पुलिस को लाठी चलाने को उकसाया.

यह कतई मुमकिन है कि ऐसा उकसावा हुआ हो. लेकिन आखिर पुलिस को ऐसी स्थितियों से निबटने की ट्रेनिंग तो होनी चाहिए.

परिसर तनाव के केंद्र हैं और उनमें पुलिस आएगी ही. लेकिन वह ख़ास इसी काम में निपुण पुलिस हो सकती है.

मुझे अभी भी पटना विश्वविद्यालय में पिछली सदी के अस्सी के दशक के अपने दिन याद हैं जब उस इलाके के पुलिस अधिकारी आंदोलनकारी छात्रों के साथ इत्मीनान से , बिना बहुत बल प्रयोग के, पेश आया करते थे.

आन्दोलन को जुझारू बनाने का प्रलोभन रहता है. लेकिन यह वैसी क्रूर पुलिस कार्रवाई को जायज नहीं ठहरा सकता जिसकी तसवीरें हम सब देख रहे हैं.

विश्वविद्यालय प्रशासन क्या इसके बाद इन छात्रों से आँख मिला पाएगा?और क्या पुलिस को इन छात्रों से माफी नहीं मांगनी चाहिए?

अदालत ने सुना है, पुलिस से रिपोर्ट माँगी है और तब तक ये छात्र हिरासत में रहेंगे. क्यों?

क्यों विश्वविद्यालय आगे बढ़ कर अदालत को यह नहीं कह सकता कि इन छात्रों को वह आज़ाद करे क्योंकि इनकी कक्षाओं का नुकसान हो रहा है? इस निहायत इंसानी पहल में पहले ही देरी हो चुकी है.!

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