12 साल का मृत बच्चा बना कश्मीर समस्या का चेहरा ...

  • 14 अप्रैल 2017
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जिस दिन 12 साल के फैज़ान फयाज़ डार की मौत हुई उस दिन वह भारत प्रशासित कश्मीर के बडगाम में पहाड़ पर स्थित अपने घर से सुबह ही जग गए थे. फयाज़ ने एक कप नमकीन चाय पी थी.

उस दिन उन्होंने कुरान भी पढ़ा था और जिस रसोई में उनकी मां पूरे परिवार के लिए खाना बनाती हैं उसमें वह मंडरा रहे थे.

फयाज़ की दादी ने उन्हें अंगूर से भरी एक प्लेट दी थी था, लेकिन उन्हें याद नहीं है कि उनके पोते ने खाया था या नहीं. किसान के बेटे फयाज़ ऊनी टोपी के साथ पारंपरिक कश्मीरी कपड़े में थे. इसी दिनचर्या के साथ फयाज़ रविवार को चुपचाप घर से निकले थे.

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'सिर पर पीछे से गोली मारी'

कुछ घंटों के बाद फयाज़ धूप से भरे स्कूल के एक मैदान में मृत पाए गए. स्कूल का यह मैदान अखरोट और विलो के पेड़ों से घिरा है.

चश्मदीदों का आरोप है कि अर्द्धसैनिक बल के जवानों ने फयाज़ के सिर पर पीछे से गोली मारी थी. फयाज़ बिस्कुट का एक पैकेट लेकर ख़ुशी से घर लौट रहे थे.

'कश्मीरी पत्थरबाज़ों को मुआवज़ा तो हमें क्यों नहीं'

वह सर्द सुबह थी जब स्थानीय भीड़ भारतीय शासन के ख़िलाफ़ स्कूल के पास विरोध कर रही थी. इसी झड़प में फयाज़ को गोली लगी.

स्कूल में एक उपचुनाव को लेकर मतदान हो रहा था. चश्मदीदों का कहना है कि चार राउंड गोलियां एक मंजिला इमारत से बाहर निकलीं.

'मुझे पता था कि वह बचा नहीं है.'

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स्कूल की इमारत कम ऊंची है और कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक स्थानीय प्रदर्शनकारी एक पहाड़ी और सड़क के सामने से पत्थर फेंक रहे थे.

फयाज़ संभवतः यह पता लगाने के लिए रूके थे कि हंगामा क्यों हो रहा है और उसी दौरान उन्हें गोली लगी. गोली लगने के बाद दो पड़ोसियों ने फयाज़ की ख़बर उनके घर जाकर दी.

ख़बर सुनते ही फयाज़ की मां स्कूल के मैदान में भागीं और उन्होंने ख़ून निकलते बेटे को गोद में भर लिया. इसके बाद लोग फयाज़ को हॉस्पिटल लेकर गए. ज़रीफा ने कहा, ''मुझे पता था कि वह बचा नहीं है.''

एक ग्रामीण ने अपने मोबाइल पर दिल दहलाने वाले इस वीडियो को रिकॉर्ड कर लिया था. ..एक रोते हुए आदमी की गोद में फयाज़ का शव था.

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सबसे नए 'शहीद'

उसके चेहरे पर ख़ून फैलता हुआ दिखा रहा है. एक बंद गाड़ी में उसे हॉस्पिटल ले जाया गया और डॉक्टरों ने फयाज़ को मृत घोषित कर दिया.

फयाज़ की आख़िरी यात्रा को एक दूसरे मोबाइल फ़ोन से रिकॉर्ड किया गया: छोटा का उसका ढांचा, जो सफ़ेद कपड़े में लिपटा है. कुछ देर के लिए हॉस्पिटल में रखा जाता है. लोगों की आंखों में आंसू उमड़ते साफ़ दिख रहे हैं.

उग्र शोकाकुल भीड़ अपने सबसे नए 'शहीद' के सम्मान में आगे बढ़ रही है. दलवान गांव के पास दोपहर देर बाद शव को मिट्टी में दफ़ना दिया जाता है.

जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर के पास रविवार को मतदान हो रहा था. इस मतदान के विरोध में लोग भारतीय शासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे. तभी अर्द्धसैनिक बलों ने फायरिंग की थी और इसमें फयाज़ समेत आठ लोग मारे गए थे.

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निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि 170 लोग जख़्मी हुए हैं जिनमें 100 सुरक्षाबलों के जवान हैं. उन्होंने बताया कि मतदान के दिन हिंसक विरोध और पत्थर फेंकने के 200 वाकये हुए थे.

कश्मीर के बारे में ये पांच अहम तथ्य

  • ब्रिटेन से आज़ाद होने के बाद करीब 70 सालों से कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान में विवाद है.
  • दोनों देश पूरे इलाक़े पर अपना-अपना दावा पेश करते हैं, लेकिन दोनों के पास अलग-अलग हिस्सों पर नियंत्रण है.
  • 1989 से मुस्लिम बहुल इलाक़े में भारतीय शासन के ख़िलाफ़ सशस्त्र विद्रोह जारी है.
  • भारी बेरोज़गारी और सुरक्षा बल के रवैये की शिकायतों के कारण लगातार समस्या बढ़ रही है.

कम मतदान

रविवार को हुए उपचुनाव में महज 7.1 फ़ीसदी मतदान हुआ. ज़ाहिर है मतदान में इतनी भयावह गिरावट इलाक़े की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के लिए झटका है.

अलगाववादी समूह कश्मीर में चुनाव को ख़ारिज करते हैं. इन्होंने रविवार को भी उपचुनाव का बहिष्कार किया था. इन्होंने लोगों से मतदान नहीं करने की अपील की थी.

इसका नतीज यहा हुआ कि एक नेता ने भारत सरकार पर 'जनविरोधी नीतियों' का हवाला देकर इस्तीफ़ा दे दिया. इस उपचुनाव में मतदाताओं में मोहभंग देखने को मिला.

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त्रासदी का नया चेहरा ?

पहले के चुनावों में तुलनात्मक रूप से शांत इलाक़े डलवान के लोग उत्साह के साथ मतदान करने निकलते थे, लेकिन इस बार लोगों ने ख़ुद को मतदान से दूर रखा.

जिस दिन स्थानीय मतदाताओं ने बैलेट को ख़ारिज किया उस दिन फैज़ान क्यों मारा गया? इसे लेकर अभी स्थिति साफ़ नहीं है. लोगों के मुताबिक फ़ैज़ान न पत्थर फेंक रहे थे और न ही उन्होंने सैनिकों से दुर्व्यवहार किया था.

एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस प्रदर्शनकारियों को मतदान केंद्र से दूर रखने के लिए आंसू गैस के गोल दाग रही थी लेकिन सैनिकों ने फायरिंग कर दी.

एक सीनियर ऑफिसर ने मुझे यह बताया कि मतदान केंद्र को सुरक्षित बनाने के लिए दूसरे राज्यों से भी सैनिकों को बुलाया गया था. ऐसे में वे शायद कश्मीर में विरोध और उकसावे की जटिलता को समझ नहीं पाए.

एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाने के मामले में अर्द्धसैनिक बलों पर एफआईआर दर्ज कर ली है. चाहे जो भी हो लेकिन फैज़ान कश्मीर में ख़त्म न होने वाली त्रासदी का नया रूपक बन गए हैं.

फ़ैज़ान की एक तस्वीर उसके दोस्त ने सर्दियों की छुट्टियों में खींची थी. इस तस्वीर को देखने से पता चलता है कि फ़ैज़ान शर्मीले थे.

फ़ैज़ान के दोस्त ने कहा, ''वह अक्सर अपनी क्लास में टॉप करता था. उसके पास दुनिया का काफ़ी इल्म था.''

इस तस्वीर में फ़ैज़ान एक ऊनी टोपी और जैकेट में किसी कुलीन बच्चे की तरह कैमरे पर असहज दिख रहे हैं.

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'अब मैं तुम्हें कहां खोजूं?'

फ़ैज़ान के एक चचेरे भाई ने कहा, ''वह शांत और मेहनती छात्र था. वह स्कूल में बेहतर कर रहा था. वह क्रिकेट खेलता था और धोनी को पसंद करता था. वह डॉक्टर बनना चाहता था.''

प्यार के लिए दुख की कीमत चुकानी होती है. ज़रीफा बेटा खोने के ग़म से नहीं निकल पा रही हैं. ज़रीफा के घर पर आसपास की महिलाएं शोक जताने जुटी थीं. वह लगातार रोते हुए कहती हैं, ''मेरा बेटा, मेरा बेटा, अब मैं तुम्हें कहां खोजूं?''

जिस तंबू में महिलाएं बैठकर शोक जता रही हैं वहां से ज़रीफा निकलती हैं. ज़रीफा अपने घर में घुसती हैं और पति के साथ हो लेती हैं. दोनों एक सर्द कमरे में बैठे हैं. दोनों पूरी तरह से खामोश हैं. ये आसपास के शोकाकुल लोगों से घिरे हैं. सभी हल्की गुलाबी दीवारों को टकटकी लगाए देख रहे हैं.

'डर ख़त्म हो गया है'

कमरे में एक लाल कार्पेट और खिड़की पर लाल पर्दा लटक रहा है. फयाज़ अहमद डार ने कहा, ''एक शहीद का ख़ून कभी बेकार नहीं जाता है. बेगुनाहों का ख़ून एक दिन हमें आज़ादी ज़रूर दिलाएगा.''

कुछ व़क्त की खामोशी के बाद ज़रीफा बेटा खोने के दुख से फूट पड़ती हैं. वह बोल उठती हैं, ''मैं तुम्हारी किताबों को देख रही हूं. मैं तुम्हारे स्कूल बैग को देख रही हूं. मैं तुम्हारी किताबों को फिर कैसे छू पाऊंगी, मेरा बेटा? हर कोई तुम्हारी अक़्लमंदी की बात कर रहा है कि तुम कैसे हर सवाल का जवाब देते थे.''

सेकेंडरी स्कूल के बाहर दीवार पर लिखा है- सीखने के लिए आएं और सेवा के लिए जाएं. युवाओं का एक समूह अगले दिन यहां जुटता है. उनकी आंखों में ग़ुस्सा साफ़ दिख रहा है. वे अवसाद, अलगाव, परेशानी, अपमान और नाउम्मीदी पर बात करते हैं.

वे कहते हैं कि उनके जीवन से डर ख़त्म हो गया है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वे विद्रोहियों की मदद इसलिए करते हैं क्योंकि वे उनके भाई हैं और वे आम नागरिकों को नहीं मारते हैं.

उन्होंने कहा कि वे आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने भारतीय सेना पर पत्थर फेंका था तो आधे से ज़्यादा लोगों ने हाथ उठाए.

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विद्रोह की कगार पर कश्मीर ?

एक स्कूल क्लर्क फिरोज़ अली ने कहा, ''हम अपने घरों में ही सुरक्षित नहीं हैं. हमलोग सड़क पर भी सुरक्षित नहीं हैं. अब ये छोटे बच्चों को मारने लगे हैं. जीवन अधर में है.''

फ़रवरी के बाद से सशस्त्र विद्रोहियों और सुरक्षाबलों की गोलीबारी में करीब दो दर्जन नागरिक मारे गए हैं. सुरक्षाबल आम नागरिकों पर विद्रोहियों की मदद करने के आरोप लगाते हैं. सुरक्षाबलों का कहना है कि ये विद्रोहियों को भगाने में मदद करते हैं.

भारतीय सुरक्षाकर्मियों के हाथों चरमपंथी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से इलाक़े में तनाव चरम पर है. इस घटना के बाद चार महीनों तक चले विरोध-प्रदर्शन में 100 से ज़्यादा नागरिकों की जान गई.

कश्मीर भारतीय शासन के ख़िलाफ़ खुले सार्वजनिक विद्रोह की कगार पर प्रतीत हो रहा है. कई लोगों का कहना है कि केंद्र सरकार स्थानीय लोगों और पाकिस्तान के साथ सहभागिता और संवाद में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है.

बेरोज़गारी ने बढ़ाई समस्या

राज्य सरकार पर लोगों का भरोसा नहीं है. लोगों का मानना है कि विकास न होने और नौकरियों की कमी के कारण लोग लगातार अलग-थलग महसूस कर रहे हैं.

चरमपंथी घटनाओं में लगातार कमी आई है- एक अनुमान के मुताबिक अभी राज्य में 250 चरमंपंथी हैं, जिनमें से 150 स्थानीय हैं. इसके मुकाबले 1990 के दशक में हज़ारों चरमपंथी थे.

लेकिन युवा कश्मीरियों में- घाटी में 30 साल की उम्र के 60 फ़ीसदी से ज़्यादा और 40 फ़ीसदी से ज़्यादा कश्मीरी पुरुष बेरोज़गार हैं. इनके भीतर ग़ुस्से को महसूस किया जा सकता है. विपक्षी पार्टी के एक नेता ने मुझसे कहा कि यहां की स्थानीय पार्टियों पर अप्रासंगिक होने का ख़तरा मंडरा रहा है.

35 साल के स्कूल टीचर फिरोज़ अली ने कहा, ''अब तक की यह सबसे बुरी स्थिति है. पहले आंदोलन की अगुवाई चरमपंथी कर रहे थे. अब इसकी अगुवाई लोग कर रहे हैं. भारत के लिए यह निराशाजनक है, यह काफ़ी निराशाजनक है.''

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