नज़रिया: 'पहला दलित प्रधानमंत्री बनने का सपना अब......'

  • 1 मई 2017
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मायावती ने अपनी लोकप्रिय किताब 'मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेन्ट का सफ़रनामा' में लिखा है, "जिस तरह बुहजन समाज पार्टी आज बहुजन समाज के गौरव का प्रतीक है, वैसे ही बुद्धीजीवियों की नज़र में मायावती भारतीय राजनीति में एक ऐसी नेता बनकर उभरीं हैं, जिनकी आलोचना की जा सकती है, आरोप भी लगाए जा सकते हैं लेकिन कोई उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है."

मायावती आगे लिखा है, "मैंने अपने आपको एक ऐसी चट्टान की तरह ढाला है जो पिघलती नहीं बल्कि नदियों का रास्ता बदलती है."

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मायावती किसी भी पार्टी से हाथ मिलाने को तैयार

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हालांकि 2017 में मिली करारी हार ने मायावती के उस घमंड को दूर कर दिया है जो उनमें तब था.

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अब प्रासंगिकता का सवाल

बीएसपी ने 1991 में 12 सीटें जीतीं और 2007 में पार्टी ने सर्वाधिक 206 सीटें हासिल की लेकिन 2017 में पार्टी 27 सीटों पर सिमटकर रह गई.

पार्टी के बुरे प्रदर्शन से खिन्न मायावती ने दो स्तरीय राजनीतिक योजना को सामने रखा जोकि राजनीति में प्रासंगिक बने रहने और अपने परिवार को क़ानूनी कार्यवाहियों से बचाने की उनकी हड़बड़ी को दिखाता है.

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आख़िरी बार कांग्रेस के साथ गठबंधन में 1996 में चुनाव लड़ने के बाद से कड़ा रुख बनाए रखने वाली मायावती ने पहली बार बीजेपी विरोधी फ्रंट में शामिल होने की इच्छा ज़ाहिर की है.

आजतक उन्होंने अकेले ही रास्ता तय किया, उन्हें जिनकी ज़रूरत थी उनसे नाता तोड़ा और जिन्हें उनकी ज़रूरत हो सकती थी, कठोरता पूर्वक सहयोगियों को सत्ता से हटाया.

काडरों को राहत

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उनके रुख़ में आए बदलाव से उनके काडरों को थोड़ी राहत मिली है, जो बीएसपी को फिर से जीवित करने में उनकी क्षमता पर संदेह करने लगे थे.

वो बीएसपी में केवल सत्ता के लिए नहीं बल्कि अत्याचारी ब्राह्मणवादी क़ायदों के ख़िलाफ़ बहुजन समाज को लामबंद करने के कांशीराम के मिशन के लिए शामिल हुए थे.

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2017 के विधानसभा चुनावों से पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव ने बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाए जाने की कोशिश की थी.

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लेकिन दो क्षेत्रीय पार्टियां एसपी और बीएसपी ने अड़ियल तरीके से इसका विरोध किया क्योंकि दोनों मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दावेदार थे और जीतने को लेकर भी निश्चिंत थे.

हालांकि चुनाव से एक महीने पहले आखिरकार सपा और कांग्रेस साथ आए, लेकिन बेहतर तैयारी के साथ मैदान में उतरी भाजपा से सामना करने में काफी कमज़ोर थे.

इन तीनों पार्टियों को अब सबक मिल चुका है और बीजेपी के ख़िलाफ़ साथ आने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा है.

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ज्यादा समय नहीं बचा

विधानसभा में 320 सीटों वाली पार्टी और मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ जैसे फ़ायरब्रांड नेता से अकेले लड़ पाना इन तीनों पार्टियों के बस की बात नहीं है.

इसके अलावा राजनीति भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ चुकी है.

विपक्ष के पास ज़्यादा समय भी नहीं है क्योंकि पहला एसिड टेस्ट जुलाई महीने में होगा जब देश का अगला राष्ट्रपति चुना जाएगा.

अगला इम्तेहान 2019 में लोकसभा चुनाव होंगे जिसे नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह माना जाएगा. भाजपा अभी से तैयारियों में जुट गई है.

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गठबंधन का नुस्खा

दूसरी बात है कि मायावती संसद के दोनों में से एक में अपनी सदस्यता बरक़रार रखना चाहेंगी.

राज्यसभा में दोबारा प्रवेश करने के लिए उन्हें कुछ विपक्षी पार्टियों के सहारे की ज़रूरत पड़ेगी. वरना उन्हें सीधे 2019 के आम चुनाव में उतरना पड़ेगा.

तीसरी बात ये है कि सीटों की साझेदारी लोकसभा चुनावों में आसान होगी. सपा ने पांच और कांग्रेस ने दो सीटें जीती थीं जबकि मायावती के पास कोई जीत नहीं मिली थी.

हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ, किसी भी बीजेपी विरोधी फ्रंट की सफलता को लेकर संदेह में हैं. आम तौर विरोधी की बढ़त को रोकने के एकमात्र उद्देश्य से बने गठबंधन भारत के राजनीतिक इतिहास में कामयाब नहीं रहे हैं क्योंकि अहम की लड़ाई में बिखर गए.

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हालांकि एक नए गठबंधन की सफलता के बारे में समय ही बताएगा, जिसमें कांग्रेस को बहुत सक्रिय भूमिका अदा करनी होगी.

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भाई को बचाने की रणनीति

अपने भाई आनंद कुमार को राजनीतिक वारिस घोषित करने के मायावती के फैसले ने काडरों को निराश किया है. बीएसपी ने हमेशा वंशवादी शासन की मुख़ालफ़त की है.

बसपा संस्थापक कांशीराम ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ़ बहुजन समाज को एकजुट करने के लिए घर छोड़ा था लेकिन उनकी उत्तराधिकारी मायावती ने संकट की घड़ी में पार्टी के लिए बहुत से लोगों के योगदान और समर्पण को दरकिनार करते हुए परिवार का सहारा लिया है.

साफ़ है कि मायावती के फ़ैसले के पीछे उनके भाई के खिलाफ़ सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर की चल रही जांच है.

बहुत से लोगों का मानना है कि पार्टी पद आनंद कुमार को गिरफ़्तारी से बचा सकता है और अगर आने वाले समय में उनकी गिरफ्तारी होती है तो बसपा राजनीतिक बदला लेने का मुद्दा बना सकती है.

मायवती का ट्रंप कार्ड

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हैरानी इस बात है कि मायावती वही शख्स हैं जो चुनौतियों और अदालती विवादों को बहादुरी से स्वीकार करती रही हैं और अपने वोटरों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव से ताक़त हासिल करती रही हैं.

दलित नेता के रूप में उनका स्टेटस, उनका ट्रंप कार्ड रहा है और जगजीवन राम की मृत्यु के बाद खाली हुई जगह को भरता है.

लेकिन अब उनके क़ीमती दलित वोट बैंक में दरारें मौजूद हैं. आम तौर पर उन्होंने जोर देकर कहा है, 'शासक बनो, शासित नहीं. संसद सत्ता का मंदिर है. हमें बहुमत हासिल करना है ताकि हम दूसरों के भरोसे न रहें. अपनी मुक्ति के लिए इसपर कब्जा करो.'

वो भी दिन थे जब वो देश को पहला दलित प्रधानमंत्री देना चाहती थीं. शायद ये अब अपने आप में एक सपना ही रहेगा क्योंकि इसके संस्थापक की तरह पार्टी को फिर से खड़ा करने का करिश्मा इसके वारिस में नहीं है.

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