भारत में गांधी की पहली पाठशाला थी चंपारण

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption महात्मा गांधी ट्रेन में तीसरे दर्ज़े में ही यात्रा किया करते थे

15 अप्रैल,1917 की काली स्याह रात. मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर पटना से आई एक ट्रेन रुकती है. राज कुमार शुक्ल के साथ एक मुसाफ़िर ट्रेन से उतरता है.

मुज़फ्फ़रपुर के एक डिग्री कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर आचार्य जेबी कृपलानी अपने छात्रों के साथ उसका स्वागत करने स्टेशन आए हुए हैं. उनके हाथों में लालटेनें हैं, लेकिन वो तब भी अपने मेहमान को ढ़ूंढ़ नहीं पाते, क्योंकि वो तीसरे दर्जे में सफ़र कर रहा है. इस शख़्स का नाम मोहनदास करम चंद गांधी है.

'घर वापसी' जिसने बदल दिया भारत का इतिहास

जब गांधीजी ने सूट-बूट छोड़ धोती अपनाई

क्या वजह है कि ये शख़्स गुजरात से दो हज़ार किलोमीटर की दूरी तय कर वहाँ पहुंचा था. गांधी शाँति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशाँत बताते हैं, "गांधीजी चंपारण जाने से पहले गोपालकृष्ण गोखले को दिए गए उस वचन की पूर्ति में लगे हुए थे जिसमें उन्होंने कहा था कि मुंह बंद कर और आँख खुली रख एक साल भारत को सिर्फ़ देखो. इस पूरी कवायद के बाद गांधीजी के सामने सवाल था कि अब तक जो भारत में उन्होंने देखा और जो उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में किया, उसके बाद उनकी भूमिका क्या बनती है."

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption महात्मा गांधी इस तस्वीर में जेबी कृपलानी के साथ नज़र आ रहे हैं

"ऐसे समय में राज कुमार शुक्ल नाम के एक व्यक्ति कांग्रेस के अधिवेशन में पहुंचते हैं. उनको लगता है कि कांग्रेस के मंच से जितने लोग भाषण देते हैं, उनमें से ये आदमी कुछ अलग तरीके का है. वो गांधीजी से मिलते हैं और उन्हें चंपारण के किसानों की दयनीय हालत के बारे में बताते हैं."

कैसे पहुंचे चंपारण?

"गाँधीजी कई बार उन्हें टालते हैं क्योंकि वो न तो बिहार को जानते हैं और न ही उन्होंने चंपारण का नाम सुना है. भारत के किसानों से उनका कोई संपर्क नहीं है और नील की खेती के बारे में भी उन्हें कुछ पता नहीं है. लेकिन राज कुमार शुक्ल उनके पीछे पड़े रहते हैं और उनसे बार बार चंपारण चलने के लिए कहते हैं."

क्या अपने आख़िरी सालों में अकेले पड़ गए थे गांधी?

"उनसे एक तरह से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से गांधी उनसे कहते हैं, मैं कोलकाता जा रहा हूँ. आप भी वहाँ पहुंचिए. वहाँ से मैं आपके साथ चंपारण चलूंगा. राज कुमार शुक्ल कोलकाता पहुंच जाते हैं और उनको वहाँ से ले कर पटना के लिए चल पड़ते हैं. गांधीजी चंपारण जाने के लिए तैयार हुए, इससे बेहतर ये होगा कहना कि जो ऐतिहासिक शक्तियाँ तैयार हो रही थी, उन्होंने ठेल कर उन्हें चंपारण पहुंचा दिया."

इमेज कॉपीरइट kumar prashant

मुज़फ़्फ़रपुर में रह रहे आचार्य कृपलानी जब साढ़े नौ बजे क्लब से अपने हॉस्टल लौटते हैं तो अपनी मेज़ पर एक टेलिग्राम रखा पाते हैं, जिसमें लिखा है कि अब से कुछ घंटे बाद गांधी वहाँ ट्रेन से पहुंचने वाले हैं. कृपलानी समझ नहीं पा रहे हैं कि इतने बड़े आदमी का स्वागत वो किस तरह से करें?

कृपलानी अपनी आत्मकथा, 'माई टाइम्स' में लिखते हैं, "दरभंगा के एक ब्राह्मण छात्र ने सलाह दी कि इतने बड़े आदमी का स्वागत हिंदू रीति से आरती उतार कर करना चाहिए. मैंने वो बात मान ली. छात्रों ने आसपास के बगीचों से बहुत सारे फूल तोड़ डाले. आरती के लिए हर चीज़ जमा हो गई सिवाय नारियल के."

आरती उतारी गई

"इतनी रात उसे बाज़ार से तो मंगवाया नहीं जा सकता था, क्योंकि सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं. हमारे बगीचे में एक नारियल का पेड़ था. सवाल उठा कि उस पर चढ़े कौन? कोई भी सामने नहीं आया. आखिर में मैं खुद नारियल के पेड़ पर चढ़ा और कई हरे नारियल तोड़ कर नीचे उतरा."

टूट जाएगा फिल्म 'गांधी' का पटना कनेक्शन?

जब गाँधी मुज़फ़्फ़रपुर के स्टेशन पर उतरते हैं तो उनके हाथ में एक कपड़े से बंधे कुछ कागज़ हैं. शुक्ल के हाथ में उनका एक छोटा सा बिस्तरबंद है. गाँधी की आरती उतारी जाती है, लेकिन कृपलानी नोट करते हैं कि गांधीजी को ये सब रास नहीं आ रहा.

कृपलानी आगे लिखते हैं, "उसी ट्रेन से मेरा एक ज़मींदार दोस्त भी उतरा. स्टेशन पर उसकी बग्घी उसका इंतज़ार कर रही थी. मैंने उससे अनुरोध किया कि वो अपनी बग्घी हमें दे दे ताकि हम उस पर गाँधीजी को बैठाकर मेरे घर ले जा सके."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

"जब हम बग्घी के पास पहुंचे तो हमने देखा कि लड़कों ने उसमें जुते घोड़े हटा दिए थे और वो उसमें गांधीजी को बैठाकर उसे खुद खींचने के लिए तैयार थे. जब गांधीजी ने ये देखा तो वो बोले कि वो इस बात के लिए कतई राज़ी नहीं होंगे कि लोग उन्हें इस तरह खींच कर ले जाएं."

"अगर आप ऐसा करेंगे तो मैं पैदल ही चलना पसंद करूंगा. मैंने लड़कों से कहा कि वो इस पर ज़्यादा ज़ोर नहीं दें. जब हमारी बग्घी चली तो मुझे घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज़ नहीं सुनाई दी. मैं उसी समय समझ गया कि लड़कों ने गाँधीजी की बात नहीं मानी थी."

राजेंद्र प्रसाद के घर पर

"उस ज़माने में बिहार में इस तरह की बग्घियाँ होती थीं कि अंदर बैठा शख़्स नहीं देख पाता था कि उसे कौन चला रहा है? जब हम हॉस्टल पहुंचे तो गांधीजी को पता चला कि लड़कों ने किया क्या है. वो बहुत नाराज़ हुए और बोले आपने मेरे साथ धोखा किया है."

अब ज़रा गांधी के कोलकाता से पटना पहुंचने की कहानी भी जान लीजिए. कुमार प्रशांत बताते हैं, "गांधी राज कुमार शुक्ल के साथ पटना स्टेशन पर उतर तो जाते हैं लेकिन शुक्ल को समझ नहीं आता कि रात में गांधी को ठहराए कहाँ? उनका मुकदमा लड़ रहे एक वकील पटना में रहते हैं. वो गाँधीजी को उनके यहाँ ले जाते हैं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption इस तस्वीर में राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गांधी और सरदार वल्लभ भाई पटेल एक साथ नज़र आ रहे हैं

"जब वो उनकी कोठी पर पहुंचते हैं तो बाहर एक नेम प्लेट देखते हैं जिस पर राजेंद्र प्रसाद लिखा हुआ है. पता चलता हैं कि राजेंद्र प्रसाद तो घर पर नहीं हैं, पुरी गए हुए हैं. जब शुक्ल कहते हैं कि ये हमारे मेहमान हैं. उनको यहाँ ठहराना है तो नौकर लोग बरामदे में उस जगह उन्हें बिस्तर बिछाने की जगह दे देते हैं, जहाँ मुवक्किलों को ठहराया जाता है."

गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी उनकी जीवनी 'मोहन दास' में लिखते हैं, "राजेंद्र प्रसाद के नौकरों को गांधी वेशभूषा से संभ्रांत व्यक्ति नहीं लगते हैं. इसलिए वो गांधी को न तो कुंए से पानी निकालने की इजाज़त देते हैं और न ही घर के अंदर का शौचालय इस्तेमाल करने देते हैं. तभी गांधी को ध्यान में आता है कि उनके साथ लंदन में पढ़ने वाले मज़हरुल हक़ इसी शहर में रहते हैं. वो उन तक संदेशा भिजवाते हैं और वो खुद उन्हें लेने अपनी कार में पहुंचते हैं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने गांधी की जीवनी मोहन दास लिखा है

मज़हरुल हक ही गांधी को मुज़फ़्फ़रपुर जाने वाली ट्रेन में बैठाते हैं. चंपारण में गांधी जी की उपस्थिति मात्र ही नील की खेती करने वाले किसानों में एक ख़ास तरह की उमंग भर देती है. लेकिन नील की खेती करने वाले अंग्रेज़ प्लांटर्स उनसे इतने क्षुब्ध होते हैं कि उन्हें अगले ही दिन चंपारण छोड़ने का नोटिस पकड़ा दिया जाता है.

ज़िला छोड़ने का आदेश

कुमार प्रशांत बताते हैं, "गांधीजी जब चंपारण पहुंचते हैं तो वे नौसिखिया आदमी नहीं हैं. वो परिपक्व हैं और दक्षिण अफ़्रीका की बहुत बड़ी लड़ाई में विजयी हो कर भारत आए हैं. जिस तरह की परिस्थिति वो चंपारण में पाते है, इसी तरह के हालातों से वो दक्षिण अफ़्रीका में भी दो चार हो चुके हैं."

"वो आने से पहले ही इस बात की तैयारी कर चुके हैं कि वहाँ पहुंचते ही उन्हें वहाँ से निकाल दिया जाएगा. वो अपना बयान भी बना कर आए हैं कि अगर उन्हें निकाला जाएगा तो उन्हें क्या कहना है."

"जब उन्हें नोटिस मिलता है तो वो चंपारण के किसी दूर इलाके में हाथी पर बैठे जा रहे हैं. हाथी पर ज़िंदगी में पहली बार बैठे हैं. बड़ी मुश्किल से अपने को संभाले हुए हैं. तभी पीछे से एक व्यक्ति साइकिल पर आता है और उन्हें नोटिस पकड़ाता है कि उन्हें ज़िला छोड़ देना चाहिए."

"वो तुरंत उस व्यक्ति के साथ चल देते हैं. वो उनसे कहता है कि पावती पर दस्तख़त कर दें. उसी कागज़ के पीछे वो ज़िला मजिस्ट्रेट को चिट्ठी लिख देते हैं. उसमें वो लिखते है कि मेरे लिए संभव नहीं है कि मैं आपके आदेश को मान सकूँ. मैं ज़िला छोड़ कर नहीं जाउंगा."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

18 अप्रैल को जब गांधी चंपारण के मुख्यालय मोतीहारी की अदालत में पेश होते है तो साफ़ साफ़ कहते हैं, "ऐसा नहीं हैं कि कानून में मेरी आस्था नहीं है, लेकिन उनकी अंतरात्मा की आवाज़ कानून से कहीं बढ़ कर है."

गांधी के जीवनीकार राजमोहन गाँधी बताते हैं, "गाँधी का अदालत में दिया गया वक्तव्य पूरे भारत में एक बड़ी ख़बर बनता है. अहमदाबाद में गुजरात क्लब में जब राव साहेब हरिलालभाई इस ख़बर को पढ़ते हैं तो अपनी कुर्सी से उछल पड़ते हैं... और उनके मुंह से निकलता है... ये असली आदमी है... हमारा नायक है और बहुत बहादुर भी!"

मिला बापू का नाम

चम्पारण में ही गांधी को नया नाम मिलता है, 'बापू.' कुमार प्रशाँत बताते हैं, "चंपारण में दरअसल सत्याग्रह तो हुआ ही नहीं था. एक भी जुलूस नहीं निकला. एक भी धरना नहीं हुआ. कहीं नारा लगाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी."

"गांधीजी समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए कुछ लोगों से बात करते हैं और उसको रिकार्ड में लाते हैं ताकि हर चीज़ का कागज़ी सबूत रहे उनके पास. वो लोगों का बयान दर्ज करने का काम शुरू करते हैं जिससे अंग्रेज़ दहशत में आ जाते हैं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

"एक मार्के की बात है कि सच्चाई को दर्ज करने में भी बहुत ताक़त होती है. प्रशासन को जैसे ही पता चलता है कि बयान दर्ज हो रहे हैं ,वो लोग घबराने लगते हैं कि ये क्या हो रहा है? फिर वो वहाँ पर एक दरोगा को बैठा देते हैं."

"गांधीजी उसके लिए कुर्सी की व्यवस्था करवाते हैं और कहते हैं कि वो भी सुनेगा और देखेगा कि कौन क्या कर रहा है. गाँधीजी को न भाषा समझ में आती है, न वो हिंदी ठीक से बोल पाते हैं. सारे सरकारी दस्तावेज़ कैथी भाषा में हैं."

"राजेंद्र बाबू जैसे उनके साथ के वकील उनसे पूछते हैं कि उनके लिए वो क्या कर सकते हैं ? गांधी कहते हैं न तो मुझे आपकी वकालत की ज़रूरत है और न ही आपकी अदालत की. मुझको तो आपसे क्लर्कों का काम लेना है."

गांधी के बदलाव का तरीका

"जो ये लोग बोल रहे हैं, उसको दर्ज करे और जो मैं नहीं समझ पा रहा हूँ, वो मुझे समझाएं. इससे एक ऐसा माहौल गढ़ता चला जाता है कि शासन तंत्र हड़बड़ा जाता है और इसकी समझ में ही नहीं आया कि इस शख़्स से कैसे निपटा जाए."

चंपारण में गांधी किसानों की लड़ाई तो लड़ ही रहे हैं, सामाजिक दूरियों को भी पाटने की कोशिश कर रहे हैं. वो आग्रह करते हैं कि सबकी रसोई एक जगह बने. हर बड़ा शख़्स अपने साथ एक सेवक या रसोइया लेकर आया हुआ है. गांधी इस अनावश्यक बताते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

डाक्टर राजेंद्र प्रसाद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "गांधीजी के साथ रहने की वजह से हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ज़बरदस्त बदलाव आ गया. मैं जाति नियमों का बहुत कड़ाई से पालन करता था और गैर ब्राह्मण के हाथ का छुआ कुछ भी नहीं खाता था. धीरे धीरे हम सब लोग साथ खाना खाने लगे."

"एक एक कर हमने अपने सारे नौकर वापस भेज दिए. हम अपने कपड़े खुद धोते, कुएं से खुद पानी निकालते और अपने बर्तन भी खुद ही साफ़ करते. अगर हमें पास के गाँव में जाना होता तो हम पैदल ही जाते. ट्रेन में हम तीसरे दर्जे में सफ़र करते. हमने बिना पलक झपकाए अपने जीवन के सारे एशो-आराम छोड़ दिए थे."

गाँधी के साथ काम करने वाले लोग चंपारण में उनकी निजी ज़िंदगी को भी आश्चर्य के साथ देख रहे हैं. आचार्य कृपलानी अपनी आत्मकथा 'माई टाइम्स' में लिखते हैं, "गांधी अपना निजी काम खुद करते थे. यहाँ तक कि अपने कपड़े भी खुद अपने हाथ से धोते थे. अपने कपड़ों के बारे में वो बहुत संवेदनशील होते थे."

इमेज कॉपीरइट Tara Sinha
Image caption इस दुर्लभ तस्वीर में महात्मा गांधी राजेंद्र प्रसाद के साथ

"अगर उनकी टोपी पर एक मामूली सा दाग भी रह जाए तो वो उसे नहीं पहनते थे और अगले दिन दोबारा उसे धोते थे. मैंने गांधीजी से ही धोती धोना सीखा था, लेकिन वो उनकी तरह दागरहित नहीं होती थी."

गांधी के प्रयासों का परिणाम होता है कि किसानों की समस्याओं के लिए 'चंपारण एग्रेरियन कमेटी' बनाई जाती है. गांधीजी भी इसके सदस्य बनाए जाते हैं. इस समिति की सिफ़ारिश के आधार पर तिनकठिया व्यवस्था समाप्त कर दी जाती है. किसानों के लगान में कमी लाई जाती है और उन्हें क्षतिपूर्ति का धन भी मिलता है.

कुमार प्रशांत बताते हैं, "मैं कहूंगा कि चंपारण गांधीजी की भारत में पहली पाठशाला थी. यहाँ गांधीजी की पढ़ाई हुई. यहाँ से ही इस देश के लोगों और उनकी सादगी और सरलता की ताकत को उन्होंने पहचाना. आप जीवन में एक ठौर ढ़ूढ़ते हैं, जहाँ पैर टिका कर आगे बढ़ते हैं. चंपारण गांधीजी के राजनीतिक जीवन का एक ठौर था."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे