चंपारण सत्याग्रह का हीरोः पीर मोहम्मद मूनिस

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महात्मा गांधी के चंपारण आंदोलन ने कई लोगों को प्रभावित किया और वे इस अभियान से जुड़ते चले गए.

कुछ की भूमिका गांधी के क़रीबी सहयोगियों की रही, कुछ एक्टिविस्ट के तौर पर सक्रिय रहे जबकि हज़ारों की संख्या में फॉलोअर और समर्थक भी थे.

लेकिन बहुत सकारात्मक और अहम भूमिका निभाने के बाद भी इनमें जो सुर्खियों से सबसे दूर रहे, वो थे पीर मोहम्मद अंसारी (1882-1949).

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अंसारी का जन्म 1882 में बेतिया में हुआ था और जब गांधी चंपारण पहुंचे तब अंसारी बेतिया राज इंग्लिश हाई स्कूल में टीचर थे. लेकिन इसके अलावा वो एक पत्रकार भी थे.

वे इस इलाक़े के किसानों की समस्याओं और उनके उत्पीड़न की कहानी को कानपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अख़बार 'प्रताप' के ज़रिए लोगों के सामने लाते थे.

इस अख़बार की स्थापना गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में की थी. पीर मोहम्मद अंसारी शुरु से ही इस अख़बार से जुड़ गए थे.

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पीर मोहम्मद ने 'मूनिस' तख़ल्लुस (उर्दू भाषा में लेखक और कवि अपने असली नाम की जगह एक दूसरे नाम से लिखते हैं जिसे तख़ल्लुस कहा जाता है, जैसे ग़ालिब का असली नाम मिर्ज़ा असदउल्लाह ख़ान था लेकिन वो ग़ालिब के नाम से शायरी करते थे) से चंपारण के नील की खेती करने वालों पर लिखना शुरू किया.

महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन के दौरान वो 'प्रताप' में अपने कॉलम के ज़रिए अत्याचार की घटनाओं को लिखते रहे.

वो एक एक्टिविस्ट पत्रकार थे और हिंदी पत्रकारिता में उन्होंने एक अहम रोल अदा किया है. वो बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के 15वें अध्यक्ष भी चुने गए थे.

उन्हें कई झूठे मामलों में फंसाया गया, उन पर मुक़दमा चला और 10 महीने की जेल की कड़ी सज़ा भी हुई.

अधिकारियों की नज़र में वो एक ख़तरनाक व्यक्ति थे. बेतिया राज भी उन्हें ख़तरनाक मानता था. उन्हें स्कूल शिक्षक की नौकरी से निकाल दिया गया.

गांधी ने जब चंपारण का दौरा किया तो गांधी पीर मोहम्मद मूनिस की मां से मिलने उनके घर भी गए. ऐसा माना जाता है कि किसी पत्रकार के घर पर गांधी की इकलौती यात्रा थी.

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Image caption महात्मा गांधी इस तस्वीर में जेबी कृपलानी के साथ नज़र आ रहे हैं

बंगाल के साथ-साथ बिहार के इतिहास में नील की खेती क्रूर प्रताड़ना, उत्पीड़न और हिंसा का निर्मम अध्याय है.

चंपारण सत्याग्रह की एक शताब्दी बाद अब तक गुमनाम रहे मूनिस ने बिहार के बुद्धिजीवियों के एक वर्ग का ध्यान आश्चर्यजनक रूप से अपनी ओर खींचा है.

अब ये तथ्य सामने आ रहे हैं कि राजकुमार शुक्ल जिन्होंने लखनऊ जाकर गांधी को चंपारण आने के लिए राज़ी कराया था, उन्होंने जो ख़त गांधी को लिखे थे वो दरअसल मूनिस के ही लिखे हुए थे.

1916 में लखनऊ में होने वाले कांग्रेस के वार्षिक सत्र में राजकुमार शुक्ल के साथ मूनिस भी गए थे. इन लोगों ने वहीं गांधी से मुलाक़ात की थी.

तीन कठिया लगान प्रणाली में किसान के तौर पर शुक्ल भी गोरों के अत्याचार के सताए हुए थे. इससे पहले उन्हें बनारस के ज़मींदार और बेतिया राज की महारानी जानकी कुअंर ने निकाल दिया था.

राजकुमार एक साहूकार थे, जिन्होंने ख़ुद स्वीकार किया था कि ब्याज से वो सालाना 1,610 रुपये कमाते थे, जो आज के चार लाख रुपये के बराबर थे.

चंपारण में नील के 70 कारख़ाने थे. लगभग पूरा ज़िला इन कारख़ानों के हाथ में था. खेतों के यूरोपीय मालिक हर तरह से स्थानीय सामंती वर्ग की जगह ले चुके थे.

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हंटर के दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 'चंपारण में ज़मीन का लगान मालिक की जाति के हिसाब से तय होता था. ऊंची जाति वालों को छोटी जाति वालों की तुलना में कम लगान देना पड़ता था. इसलिए ऐसे मामले ढूंढना मुश्किल नहीं था जहां एक जैसी ज़मीन के लिए ब्राह्मणों और राजपूतों को दुसाध या किसी अन्य छोटी जाति की तुलना में एक तिहाई लगान ही देना पड़ता हो.'

पड़ोस के सारण ज़िले में ब्राह्मण, राजपूत और कई अन्य बड़ी जातियों के लोगों के पास गांव की सबसे अच्छी ज़मीनें होती थीं वो भी, कोइरी, कुर्मी या चमार जैसी निचली जातियों के मुक़ाबले 50 से 75 फीसदी कम लगान पर.

सामाजिक विभाजन की जड़ें बहुत मज़बूत थीं और उन्हें समाज के हर क्षेत्र में देखा जा सकता था. यहां तक की ऊंची जाति के स्वतंत्रता सेनानी भी पिछड़ी जातियों के लोगों की परेशानियों के प्रति आंखें मूंद लेते थे.

दुर्भाग्य से इतिहास में पीर मोहम्मद अंसारी और राजकुमार शुक्ल को जो जगह मिली वो भी इसे चश्मे से देखने का नतीजा है. राजकुमार शुक्ल ऊंची जाति के थे जबकि पीर मोहम्मद मूनिस का संबंध मुसलमानों की एक पिछड़ी जाति से था.

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Image caption इस तस्वीर में राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गांधी और सरदार वल्लभ भाई पटेल एक साथ नज़र आ रहे हैं

पीर मोहम्मद का व्यक्तित्व बहुआयामी था. मूनिस के लेखन में इतालवी राष्ट्रवादी और राजनेता गैरीबाल्डी और रूस के उपन्यासकार और दर्शनिक लिओ टॉलस्टॉय की झलक दिखती थी.

पत्रकारिता में सक्रियता और समर्पण के अलावा वह हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे के प्रबल समर्थक थे.

1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्हें तीन महीने तक कैंप जेल में हिरासत में रखा गया था.

चंपारण में किसानों और गन्ना मिलों के बीच बिचौलियों को हटाने की मांग को लेकर उन्होंने गन्ना किसानों का खुल कर समर्थन किया.

1937 में उन्होंने बेतिया नगरपालिका के सफ़ाई कर्मचारियों और मेहतरों की हड़ताल का समर्थन किया. वो 1921 से बिहार की प्रदेश कांग्रेस इकाई से जुड़े रहे.

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Image caption इस दुर्लभ तस्वीर में महात्मा गांधी राजेंद्र प्रसाद के साथ

सत्याग्रह के बाद जब गांधी चंपारण से चले गए तब नील की खेती करवाने वाले फिर किसानों के उत्पीड़न की अपनी पुरानी आदत पर लौट आए.

1937 में मूनिस चंपारण ज़िला परिषद के अध्यक्ष बन गए. लेकिन चंपारण सत्याग्रह के इतिहास से वो लगभग ग़ायब कर दिए गए.

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इतिहास में राजकुमार शुक्ल को ज़रूरत से ज़्यादा तरजीह दी गई.

मूनिस एक समर्पित सत्याग्रही, देशभक्त और एक स्वतंत्रता सेनानी के तौर याद किए जाने के ज़्यादा हक़दार थे.

(लेखक बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर हैं. इस लेख के लिए लेखक ने वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत, बीआर अंबे़डकर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हरीशचंद्र सत्यार्थी और डॉक्टर अजित कुमार का विशेष रुप से आभार व्यक्त किया है.)

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