नज़रिया: महात्मा गांधी को चंपारण लेकर कौन आया?

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चंपारण में गांधी का कमाल

इतिहास को कहानी की तरह देखना उसे रोचक, पठनीय और विवादास्पद बना सकता है पर इससे न इतिहास बदलता है, न घटनाक्रम, न किरदार.

चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी पर यह बात एक बार फिर सामने आई है, जो साक्ष्यों के अनुपस्थित के अभाव को प्रामाणिक तथ्य बनाकर पेश करती है ताकि उसका अर्थ बदले न बदले, भाव बदल जाए.

सवाल यह है कि महात्मा गांधी को चंपारण लेकर कौन आया?

तमाम अशुद्धियों वाले अपने लेख में इतिहासकार रामचंद्र गुहा हालांकि सीधे तौर पर इस पर टिप्पणी नहीं करते, लेख का शीर्षक सवाल उठाता है.

एक और लेख में दावा किया गया है कि महात्मा को चंपारण लाने में प्रमुख भूमिका राजकुमार शुक्ल की नहीं बल्कि उस दौर के दूसरे जुझारू नेता पीर मोहम्मद मूनिस की थी.

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Image caption पूर्वी चंपारण का वो 'बुनियादी विद्यालय' जिसकी नींव खुद महात्मा गांधी ने रखी थी

राजकुमार शुक्ल

चंपारण शताब्दी समारोह के मौक़े पर यह प्रश्न जायज़ हो सकता है बशर्ते नए दस्तावेज़ सामने हों और समझ में इज़ाफ़ा करते हों, लेकिन गल्प को प्रमाण मान लेना उसके साथ कतई न्याय नहीं करता.

चंपारण पर उपलब्ध बेशुमार सामग्री में सबसे प्रामाणिक और प्राथमिक स्रोत महात्मा गांधी की आत्मकथा है.

महात्मा ने उसमें एक से अधिक बार लिखा कि उन्हें चंपारण कौन लाया. ज़ाहिर है, वह नाम राजकुमार शुक्ल का है.

कलकत्ता से बांकीपुर (पटना) की रेल यात्रा में राजकुमार शुक्ल महात्मा के साथ थे और मुज़फ्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर रात एक बजे गांधी को आचार्य जेबी कृपलानी से उन्होंने मिलवाया.

कृपलानी महात्मा से पत्रों के ज़रिए परिचित थे, लेकिन उनसे कभी मिले नहीं थे. कृपलानी की किताब 'महात्मा गांधी' में यही हवाला मिलता है.

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'चंपारण में महात्मा गांधी'

बाबू राजेंद्र प्रसाद की आत्मकथा यही कहती है. सन 1919 में लिखी उनकी किताब 'चंपारण में महात्मा गांधी' का ब्योरा इसकी पुष्टि करता है.

डीजी तेंदुलकर का विवरण इसी से मेल खाता है. दीगर पुस्तकें, चिट्ठियां और ख़तो-किताबत यही तस्दीक करते हैं.

राजकुमार शुक्ल की कैथी लिपि में लिखी 1917 की डायरी तो है ही जिसमें एक-एक दिन बल्कि कई जगह एक-एक घंटे का ब्योरा दर्ज है.

अपने बारीक़ सवालों का संतोषजनक जवाब न मिलने पर महात्मा शुक्ल पर नाराजगी ज़रूर व्यक्त करते हैं पर आत्मकथा में यह भी कहते हैं कि उस 'भोले-भाले किसान ने मेरा दिल जीत लिया.'

तो फिर इस सवाल का मतलब क्या है कि महात्मा को चंपारण कौन ले आया?

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पीर मोहम्मद मूनिस

बल्कि सवाल यह भी उठता है कि क्या इसका अर्थ वाकई केवल इतिहास की पड़ताल है?

या ऐसा प्रश्न उन स्थानीय नायकों का अपमान है जिन्होंने गांधी के चंपारण आने से पहले नील के विरुद्ध किसानों को संगठित करने में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया?

पीर मोहम्मद मूनिस यक़ीनन इन नायकों में शामिल थे. राजकुमार शुक्ल का निधन 1929 में हुआ, लेकिन मूनिस आज़ादी के दो साल बाद 1949 तक जीवित थे.

लोगों के हक़ के लिए आख़िरी दम तक संघर्ष करते रहे. हिंदी के पहले खोजी और अभियानी पत्रकार मूनिस ने चंपारण का दर्द दुनिया तक पहुंचाया.

पूरे जीवन अंग्रेज़ों की आंख की किरकिरी बने रहे. गणेश शंकर विद्यार्थी के अख़बार 'प्रताप' और दूसरी जगह छपे उनके लेख इसका प्रमाण हैं.

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Image caption इस दुर्लभ तस्वीर में महात्मा गांधी राजेंद्र प्रसाद के साथ

ऐतिहासिक चिट्ठी

बेतिया के मूनिस उस दौर के बिहार के अकेले पत्रकार हैं जिनके घर महात्मा गांधी गए.

उर्दू के साथ हिंदी में महारत, भाषा पर पकड़ और विषय की समझ का उनसे बेहतर उदाहरण उपलब्ध नहीं है.

महात्मा के चंपारण प्रवास में वह लगातार उनके साथ बने रहे. अप्रैल 1917 में महात्मा के आगमन से पहले उनसे पत्र व्यवहार करते रहे.

लेकिन इसे इस हद तक खींचना कि गांधी को वही चंपारण ले आए, मूनिस के साथ अन्याय होगा. उद्भट पत्रकार और लेखक मूनिस ने अपने लेखों में कहीं ऐसा दावा नहीं किया.

माना जाता है कि महात्मा को चंपारण आमंत्रित करने वाली राजकुमार शुक्ल की ऐतिहासिक चिट्ठी पीर मोहम्मद मूनिस ने लिखी थी.

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Image caption चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांधी एडवोकेट गोरख प्रसाद के इसी घर में सबसे पहले रुके थे

राष्ट्रीय आंदोलन

शुक्ल देवनागरी में प्रवीण नहीं थे और मूनिस के मित्र थे इसलिए यह बिल्कुल संभव है.

पत्र के पहले दर्ज शेर 'किस्सा सुनते हो रोज़ औरों के, आज मेरी भी दास्तान सुनो' इसी तरफ़ इशारा करता है.

बेतिया के स्थानीय लेखक अशरफ़ क़ादरी ने अपनी किताब 'राष्ट्रीय आंदोलन और चंपारण के स्वतंत्रता सेनानी' में मूनिस और शुक्ल के साथ 182 अन्य स्थानीय नायकों का ज़िक्र किया है.

किताब में 17 नायकों का उल्लेख उनसे लिए साक्षात्कार पर आधारित है. पीर मोहम्मद मूनिस उसमें शामिल हैं.

अशरफ़ क़ादरी के ब्योरे में यह सवाल नहीं है कि महात्मा को चंपारण कौन लाया.

उनके मुताबिक़, "अंग्रेज़ समाहर्ता ने गवर्नर को लिखा कि गांधी को दो आदमी बहुत मदद कर रहे हैं. एक पीर मोहम्मद मूनिस, जिसने 'चंपारण की जनता पर अंग्रेज़ निलहों का अत्याचार' पुस्तक लिखी है और दूसरे, राजकुमार शुक्ल."

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Image caption गांधी जिन किसानों के लिए चंपारण आए थे, उनकी स्थिति का अंदाजा इन तस्वीरों से लगाया जा सकता है

लखनऊ अधिवेशन

चंपारण के किसानों के प्रतिनिधिमंडल ने कांग्रेस के 1916 के लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया.

बक़ौल क़ादरी "राजकुमार शुक्ल के नेतृत्व में शीतल राय और शेख़ गुलाब वहां गए और कलकत्ता भी यही प्रतिनिधिमंडल गया...(कलकत्ता में) यह तय हो गया कि राजकुमार शुक्ल गांधीजी के साथ चंपारण आने के लिए रुकेंगे. शेख़ गुलाब और शीतल राय बेतिया आए और पूरी व्यवस्था करके चारों तरफ सूचना दे दी कि गांधीजी बस आने ही वाले हैं."

चंपारण आंदोलन में कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं था इसलिए किसी एक को श्रेय देना या किसी से छीन लेना बराबर की नाइंसाफ़ी है. उसमें सामूहिकता की अद्भुत भावना थी. कार्यविभाजन औपचारिक तौर पर भले न हुआ हो, प्रमाण साफ़ हैं कि सबकी भूमिकाएं निर्धारित थीं. लोग वही कर रहे थे जिसमें दक्ष थे.

वहां न व्यक्तिगत हितों का टकराव था, न स्वार्थ का. न धर्म, जाति या ऊंच-नीच का.

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(ये लेख के निजी विचार हैं.)

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