नज़रिया: आरएसएस में ऐसा क्या है जो नौजवानों को आकर्षित करता है

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समकालीन भारत में राजनीतिक बदलाव के पीछे हिन्दुत्व की विचारधारा और उसके वाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निर्विवादित रूप से केन्द्रीय भूमिका है.

यह बदलाव असाधारण है. इसने न सिर्फ स्थापित राजनीति को निष्प्रभावी किया बल्कि वैकल्पिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टिकोणों को बढ़ती हुई स्वीकृति के साथ स्थापित करने का काम किया. भारत में वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कोई नई बात नहीं है.

जिन्हें यह परिवर्तन अचानक और अप्रत्याशित लगता है वे सम्भवतः देश के भीतर दशकों से हो रहे ज़मीनी स्तर के बदलाव को न समझ पाए हैं और न ही आज भी समझने की कोशिश कर रहे हैं.

संघ के प्रभाव के पीछे बीस के दशक से ही पीढ़ी दर पीढ़ी युवाओं का आकर्षण रहा है. आज इसे भारत के युवाओं का भारी समर्थन मिला हुआ है.

स्वभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि कथित रूप से प्रगतिशीलता, बदलाव और क्रांति की बात करने वाली विचारधाराएं हाशिए पर क्यों चली गईं ?

और जिन्हें वे पश्चिम के बुद्धिजीवियों के साथ गठबंधन बनाकर प्रतिक्रियावादी, फासीवादी, साम्प्रदायिक और यथास्थितिवादी कहते थे वह विचारधारा क्यों आज अपना प्रभुत्व बनाने में सफल रही है?

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संघ का अनुशासन

यह प्रश्न नया नहीं है. एक रोचक पत्राचार कांग्रेस के दो बड़े नेताओं के बीच सन् 1938 के अक्टूबर-नवम्बर में हुआ था.

30 अक्टूबर, 1938 को कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाषचन्द्र बोस ने महाराष्ट्र प्रान्त कांग्रेस अध्यक्ष शंकरराव देव को एक पत्र लिखा था.

पत्र में उन्होंने इस बात की चिन्ता जताई थी कि दिन-प्रतिदिन कांग्रेस की तुलना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति छात्रों-नौजवानों का आकर्षण बढ़ता जा रहा है.

उन्होंने देव से इसका कारण जानना चाहा. उनका अपना संक्षिप्त विष्लेषण था कि इस आकर्षण का कारण संघ का अनुशासन, यूनिफॉर्म और परेड है जो ऐसी सोच को ढक देता है.

शंकरराव देव ने 6 नवम्बर, 1938 को दो पृष्ठों में उसका उत्तर भेजा. जिसमें उन्होंने उन वैचारिक कारणों पर प्रकाश डाला जिन कारणों से संघ के प्रति युवाओं का आकर्षण था.

संघ के प्रति आलोचना का भाव रखते हुए उन्होंने संघ की इतिहास दृष्टि और भारत की प्राचीन संस्कृति को सम्मान दिलाने का प्रयास एवं भारत की राष्ट्रीयता को भारतीय सभ्यता के परिवेश में परिभाषित करने के प्रयास को इसके विस्तार का मुख्य कारण माना.

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भारतीय राष्ट्र

जो प्रश्न बोस ने 1938 में उठाया था वह प्रश्न चिन्तन और व्यवहार के स्तर पर गैर-संघ विचारधाराओं के बीच न सिर्फ उपेक्षित रहा बल्कि उनके चिन्तन का एक सामान्य हिस्सा भी नहीं बन पाया.

2014 के इस बदलाव के दौर में वे 1938 के उस सवाल की गहराई एवं आज के दौर में बढ़ी उसकी प्रासंगिकता को नहीं समझ पा रहे हैं.

पचास के दशक से कांग्रेस, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट इन तीन विचारधाराओं का भारत के जनमानस पर प्रभाव था. यह बौद्धिक विमर्शों, विश्वविद्यालय परिसरों एवं चुनावी अंकगणित तीनों में साफ झलकता रहा.

ये तीन धाराएं राजनीतिक रूप से भले ही अलग थीं लेकिन उनमें एक दृष्टिकोण की समानता रही है.

यह समानता भारतीय राष्ट्र को समझने, उसके इतिहास को ग्रहण करने, उसके बदलाव को अंजाम देने तथा भारत की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रति मूल्याकंन की रही है. इन तीनों धाराओं ने मिलजुलकर पश्चिम के दृष्टिकोण को अपनाया है.

इसलिए लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव और राष्ट्र की प्रकृति के प्रति उनकी समझ में एक समानता है.

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आधुनिक राष्ट्रराज्य

वह भारत को एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य मानते हैं और पश्चिम की सभ्यता को भारत के लोकतंत्र एवं पंथनिरेपक्षता के लिए श्रेय देते हैं.

संक्षेप में कहें तो कुछ अपवादों को छोड़कर इन तीनों धाराओं ने भारतीय राष्ट्र के इतिहास और विरासत दोनों का अवमूल्यांकन किया है.

देश में आजादी के दौरान बहुत से चिन्तकों एवं स्वतंत्रता सेनानियों ने इस बौद्धिक एवं राजनीतिक भटकाव को परख लिया था और एक वैकल्पिक वैचारिक धारा को खड़ा करने की कोशिश की थी.

इनमें महर्षि अरविंद, विपिनचन्द्र पाल, राजनारायण बसु, रविन्द्रनाथ टैगोर, बालगंगाधर तिलक जैसे कुछ नाम हैं जिन्होंने भारत को एक सभ्यता के रूप में देखा और भारतीय राष्ट्र की संकल्पना ने कुछ हजारों साल पुरानी सभ्यता की निरन्तरता की कुलबुलाहट और आवश्यकता दोनों को समझा.

इस धारा ने भारतीय राष्ट्र-राज्य को एक सभ्यताई राष्ट्र के रूप में देखा और इसकी बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत को आधुनिकता एवं भारतीयता दोनों का आधार माना.

लेकिन औपनिवेशिक और यूरोपीय चिन्तन, संस्कृति के प्रभाव एवं दबाव में यह धारा एक मजबूत राजनीतिक स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाई थी.

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

भारत को यूरोप के ही चश्मे से देखा जाता रहा है. इसी को बदलने के लिए डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने सन 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी.

जिसका मूल उद्देश्य भारत को उसकी अपनी सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में पहचान प्रदान करना था और इसको अंजाम देने के लिए उन्होंने जिस तरीके को स्थापित किया वह राजनीतिक न होकर सामाजिक और सांस्कृतिक था.

इसलिए संघ का देश की राजनीति में कितना ही प्रभाव क्यों न हो उसका मूल चरित्र सामाजिक और सांस्कृतिक बना रहा है.

देश की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव उसके द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव को एक परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए.

किसी भी संगठन के विस्तार के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है. पहला, उसकी विचारधारा जो लोगों के मस्तिष्क में अपील करती है.

दूसरा, उस संगठन की संस्कृति जो मूल्य के रूप में लोगों के मन में असर डालता है और तीसरा, लोगों के सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय अस्तित्व को सुनिश्चित करता है.

वामपंथी एवं समाजवादी विचारधाराओं में समानता की अपील थी जो एक ऐसे देश के लिए जहां गरीबी, बेरोजगारी मुख्य मुद्दा हो वहां भी निष्प्रभावी क्यों हुआ इसका उत्तर ढूंढना कठिन नहीं है.

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सामाजिक एवं राष्ट्रीय

विचारधारा की न्यूनता या श्रेष्ठता के प्रश्न को अलग रखते हुए शेष दोनों बातों पर यदि गौर करें तो हम पाएंगे कि राष्ट्रीयता के प्रश्न पर इन विचारधाराओं ने भारत के लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़-ज़मीन से काटकर देखने की कोशिश की और पश्चिम के सामाजिक एवं राष्ट्रीय मापदंडों के आधार पर भारत को परखने की चेष्टा की, जिसने उन्हें निष्प्रभावी बनाने का काम किया.

इन संगठनों के नेतृत्व एवं कार्यकर्ताओं ने मूल्यों के ह्रास ने उनकी पात्रता को कमजोर कर दिया. मूल्य किसी भी विचारधारा की कोख की तरह होता है. अस्वस्थ कोख कभी भी स्वस्थ शिशु को जन्म नहीं दे सकती है.

इसके विपरीत संघ के नेतृत्व ने जहां राष्ट्रीयता को दुनिया की एक वैकल्पिक सभ्यता के रूप में उपयोग कर लोगों के मन में सहज स्वाभिमान का निर्माण किया वहीं जीवन में सादगी, त्याग और सामाजिक सरोकारों के कारण उनका आदर्शवाद युवाओं को सहज रूप से में आकर्षित करता रहा है.

एक खासियत यह है कि संघ में कमोबेश इन मूल्यों को अपने संगठन-संस्कृति में प्राथमिकता देकर पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखा उसका हा्रस नहीं होने दिया.

शब्दों एवं विमर्शों द्वारा बदलाव की अपील करने की जगह इसने सामाजिक-आर्थिक यथार्थ से जूझने का काम किया. उन प्रश्नों को सम्बोधित किया जो वस्तुतः राज्य की प्राथमिकता होनी चाहिए.

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आदिवासी और दलित

जैसे शिक्षा के क्षेत्र में दूर-दराज इलाकों में स्कूल खोलकर उसका प्रसार करना.

आदिवासी एवं दलितों के बीच में सेवा द्वारा उनके रोजगार एवं अन्य आर्थिक समस्याओं का निदान करते हुए उनका सशक्तिकरण करना.

आज इसके द्वारा देशभर में लगभग 1,80,000 उपक्रम चल रहे हैं जिसमें राज्य का कोई योगदान नहीं है. यह समाज के संसाधनों और समाज के लोगों द्वारा चल रहा है.

संघ के इस वैचारिक एवं सरोकार आधारित कार्यक्रमों ने इसे व्याप्त जमीन प्रदान करने का काम किया और जब कोई सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन झाल-मंजीरा न बजाने वाला होकर राष्ट्रीय चेतना को अपना लक्ष्य बनाता है तो उसकी सांस्कृतिक वैश्विक दृष्टिकोण में राजनीति भी एक कोना स्वभाविक रूप से बन जाता है.

दुर्भाग्य से संघ विरोधी धाराएं जैसे मार्क्सवादी, समाजवादी और कांग्रेस, तीनों आत्मलोचन करने की बजाए उन्हीं पुराने आरोपों को दोहराकर लोकविमर्श को प्रभावित करना चाहते हैं जो स्वयं को धोखा देने वाला साबित हो रहा है.

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(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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