नज़रिया: अकेली मायावती को ही 'अपना खून' प्यारा नहीं है

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अकेली मायावती को ही 'अपना खून' प्यारा नहीं है.

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी के बीच आमतौर पर सभी बड़े दलों के भारतीय नेताओं को उन विचारों और बरसों के आज़माए वफादार सहयोगियों पर यकीन नहीं है जिनकी वे सार्वजनिक मंचों पर माला जपते हुए दिन काटते हैं.

अंततः एक दिन वे अपना उत्तराधिकारी अपने खानदान से चुनते हैं. आखिर उन्हें अपनी पार्टी में एक भी आदमी इस लायक क्यों नहीं मिलता?

हकीकत यह है कि इन नेताओं को पार्टी की विचारधारा और वोटबैंक से अधिक किसी और चीज़ की हिफाज़त की चिंता होती है जिसे खानदान के बाहर के आदमी को सौंपना खतरनाक हो सकता है.

आठ साल पहले, 2009 में आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल जाने की नौबत थी, तब बसपा प्रमुख मायावती ने लखनऊ की एक रैली में अपने उत्तराधिकारी के लक्षण गिनाए थे.

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लोहिया के वारिस

अगले ही दिन से पार्टी के दिग्गज नेता एक खास दलित जाति के उस नौजवान विधायक के चरण छूने लगे थे. जेल जाना टला, उत्तराधिकारी भी भुला दिया गया.

अब मायावती ने जाति से भी छोटे दायरे में खुद को बांधते हुए अपने खून यानी भाई, रियल इस्टेट कारोबारी, आनंद कुमार को पार्टी का नंबर दो नेता बनाया है जो दलितों की सबसे बड़ी पार्टी के अंत का आरंभ हो सकता है.

मायावती के प्रतिद्वंदी मुलायम सिंह यादव खुद को जिंदगी भर राममनोहर लोहिया का वारिस साबित करते रहे. वही लोहिया जिन्होंने कांग्रेस के वंशवाद के खिलाफ लड़ते हुए समाजवाद के विचार वाले पचासों नेता पैदा किए लेकिन जब खुद की विरासत का सवाल आया तो भरोसा बेटे अखिलेश और भाई शिवपाल पर किया जिनकी लड़ाई में वे खुद ही व्यर्थ हो गए.

बिहार में लालू प्रसाद यादव को जयप्रकाश नारायण के विचारों को आगे बढ़ाने की सार्वाधिक योग्यता पत्नी राबड़ी देवी और बेटे तेजस्वी में दिखाई दी.

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पार्टी की विरासत

बंगाल में सादगी को दर्शनीय बनाने के लिए ममता बनर्जी खुद रबड़ की चप्पलें पहनती हैं लेकिन प्रशासन और अर्थव्यवस्था पर पकड़ भाई की है जो कल वारिस के रूप में भी सामने आ सकता है.

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी के हाथ पार्टी की कमान गांधी-नेहरू परिवार की बहू होने के कारण आई थी लिहाजा उनके लिए स्वाभाविक है कि वे विरासत अपने बेटे राहुल गांधी को सौंपे.

मायावती की ही तरह वे अपने बेटे को पार्टी उपाध्यक्ष चुनवा कर इस दिशा में सबसे निर्णायक कदम उठा चुकी हैं.

इन नेताओं को अपना आदर्श मानने वाले यानी इनके स्थानीय 'गुटका संस्करण' (पॉकेटबुक एडीशन) नेता हर चुनाव क्षेत्र में मौजूद हैं जो अपनी औलादों को किसी न किसी सदन में भेज चुके हैं या भेजने वाले हैं.

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विचारधारा और वोटबैंक

'खूनवाद' का आरोप वामपंथियों पर नहीं चिपकता लेकिन अपने अच्छे दिनों में वे भी अपने बच्चों को रूस-चीन भेजने और बड़ी नौकरियां दिलाने में प्रतिभा दिखा चुके हैं.

अगर विचारधारा और वोटबैंक की हिफाजत के लिए वारिस चुनना होता तो अपने खानदान के लोगों को काबिल साबित करने के लिए इन नेताओं को इतनी अधिक तिकड़म न करनी पड़ती.

इन दोनों से कहीं अधिक कीमती चीज़ पार्टी दफ्तरों के रूप में पड़ी बेशकीमती जमीनें और वैध-अवैध तरीकों से कमाई गई वह संपत्ति है जिसके एक छोटे से हिस्से का ही जिक्र चुनाव में नामांकन के वक्त दाखिल किए जाने वाले हलफनामें में आ पाता है.

विचारधारा पर पैसा और जमीनें भारी हैं. इसलिए अपना खून देखना पड़ता है वरना कोई बाहरी आदमी गड़े मुर्दे उखाड़ कर इन नेताओं की छवि का सत्यानाश मरणोपरांत भी कर सकता है.

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पार्टी में 'राजतंत्र'

इस 'खूनवादी' परिदृश्य में भाजपा के नरेंद्र मोदी जैसे नेता ने अपनी साख बनाने में कामयाबी पाई है क्योंकि अब तक उनके साथ परिवार का पुछल्ला नहीं है, लेकिन बिडंबना यह है कि उनकी राजनीति का अंतिम नतीजा अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा और लोकतंत्र को नकारने वाले हिंदूराष्ट्र बनाने की कोशिशों के रूप में सामने आ रहा है.

जिनकी विचारधारा लोकतांत्रिक और सेकुलर है वे अपने 'खानदानी मोतियाबिंद' के कारण दूर तक देख पाने में लाचार पाए जा रहे हैं.

जनता समझती है कि ये नेता विचारधारा को 'सजावटी चीज़' समझते हैं वरना हर पार्टी में 'राजतंत्र' न चल रहा होता. जब नेताओं को ही अपने विचार पर यकीन नहीं है तो जनता को क्यों हो?

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(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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