ब्लॉग: अहमद शाह के शहर में अमित शाह का नाम हुआ

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"साबरमती एक ऐसी ज़िंदा, बहती नदी है, जो मुस्लिम चरित्र वाले पुराने और हिन्दू बहुमत वाले नए अहमदाबाद शहर को बांटती है."

स्थानीय ड्राइवर मदन केसवानी ने जब ये बात कही तो मैंने उनसे पूछा कि क्या आपकी राय ज़्यादातर निवासियों की राय, अक्सरियत की राय है.

इस युवा ड्राइवर ने कहा - 'मैं साबरमती नदी का भक्त हूँ. मैंने हमेशा इसकी शालीनता को सलाम किया है. इसकी अर्थपूर्ण ख़ामोशी, इसकी खूबसूरती ने मुझ पर गहरा असर छोड़ा है.'

इधर मैंने सोचा, मैं बांटने वाली बात को सकारात्मक तरीके से देखने की कोशिश करता हूँ.

क्या हम इसे ऐसे नहीं देख सकते कि साबरमती नए और पुराने शहर को, दोनों क़ौमों को जोड़ने की कोशिश करती है?

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साबरमती के किनारे

क्या ये इनके बीच निष्पक्ष होकर नहीं बहती? क्या ये न्हें अपने आग़ोश में समेटे नहीं रहती?

साबरमती तो एक ज़माने से लगभग उसी जगह पर बहती आ रही थी जहाँ आज भी बह रही है. भला ये दोनों समुदायों को क्यों बांटेगी.

अहमद शाह ने साल 1411 में साबरमती नदी के किनारे एक शहर बसाया था. ये शहर अब 600 साल पुराना होने के बाद "ओल्ड अहमदाबाद" कहलाता है.

सैकड़ों साल बाद साबरमती की दूसरी तरफ धीरे-धीरे एक नया शहर आबाद हुआ. नए शहर के नए दौर में 'शहंशाह' रहे नरेंद्र मोदी. इन्होंने इस शहर पर 13 साल राज किया.

कुछ लोगों के अनुसार राज मोदी का था, लेकिन चलती अमित शाह की थी. वो आज भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं.

तो अहमद शाह से अमित शाह तक या अहमदाबाद से "अमदावाद" तक के 600 साल के इतिहास को साबरमती से बेहतर कौन जानता होगा?

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साबरमती की संतानें

एक शाह मुसलमान तो दूसरा शाह हिन्दू लेकिन दोनों साबरमती की संतानें.

साबरमती ने सुल्तान अहमद शाह को इस नए शहर को मस्जिदों, क़िलों और विशाल दरवाज़ों से सजाते देखा है. इसके इस्लामी दौर को फलते-फूलते देखा है.

जामा मस्जिद हो या जाली वाली सीदी सैयद मस्जिद. तीन दरवाज़ा हो या भद्रा क़िला. इस नदी ने न केवल इन्हें बनते देखा है बल्कि इनके बढ़ते शान की गवाह रही है.

पुराने शहर के पढ़े-लिखे लोग खुद को पेशेवर इतिहासकार समझते हैं.

एआई कमर के अनुसार, "शहर से मुसलमान हटा सकते हैं, लेकिन इसका इतिहास नहीं मिटा सकते जिसके जीते-जागते नमूनों में प्राचीन स्मारकों और मस्जिदों को शामिल किया जा सकता है."

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मुस्लिम कैरेक्टर

आई क़ादरी साहब एक ज़माने में बैंक संघ के चेयरमैन थे, आज अपने समुदाय के एक प्रवक्ता हैं. वो कहते हैं, "सीदी सैयद जाली मस्जिद की जाली आईआईएम अहमदाबाद का आधिकारिक चिन्ह है."

उनके साथियों ने इस पुरानी मस्जिद की एक ज़माने से चली आ रही अहमियत को आगे समझाते हुए कहा कि जैसे आगरा का ताज महल और मुंबई का गेटवे ऑफ़ इंडिया वैसे सीदी सयेद जाली मस्जिद अहमदाबाद के लिए है.

शहर के सारे स्मारकों की देख-रेख सही से की जा रही है. ये सभी स्मारक दिल्ली में मुग़लों के स्मारकों से 100-150 साल पुराने हैं उनसे मज़बूत लगते हैं.

साबरमती ने पुराने शहर के उदय को देखा है तो इसके पतन को भी. बाद में शहर में मुग़ल आए. नदी ने मुग़लों के उरूज और ज़वाल का भी नज़ारा देखा है.

साबरमती कभी नहीं बदली. लेकिन धीरे-धीरे अहमदाबाद बदलने लगा. क़िले की ऊंची दीवारों और दरवाज़ों में बसे लोग तंग आबादी के कारण साबरमती के सीने से होकर दूसरी तरफ आबाद होने लगा.

मुस्लिम करैक्टर वाले पुराने शहर का पतन होने लगा और नया शहर तेज़ी से बसने लगा.

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इस नए शहर में सड़कें चौड़ी थीं और इमारतें ऊंची. लेकिन यहाँ क़िले, दरवाज़े और मस्जिदें नहीं थीं.

साबरमती ने महसूस किया कि अब शहर खुद से धीरे-धीरे कई लोगों के लिए अहमदाबाद से 'अमदावाद' हो गया. खैर साबरमती पर गाँधी आश्रम भी बना. इसने आज़ादी की लड़ाई भी देखी और 1943 की हिन्दू-मुस्लिम हिंसा भी.

जैसा कि क़ादरी कहते हैं, "इसने 1969 का हुल्लड़ (दंगा) भी देखा और बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद का भी. इसने 2002 की हिंसा भी देखी है."

साबरमती के दोनों तरफ हुए हमलों और आगज़नी में मारे गए लोगों में अधिकतर मुसलमान थे. 2002 की हिंसा स्वतंत्र भारत के सब से बुरे दिनों में से एक साबित हुई.

आगे चल कर अहमद शाह के शहर में अमित शाह का नाम हुआ. आज अहमदाबाद से लेकर गांधीनगर तक मोदी-अमित शाह की तस्वीरें और इश्तेहार सड़कों पर मीलों तक नज़र आते हैं.

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साबरमती ने अपने सीने में कोई राज़ छुपा कर नहीं रखा. मुसलमान खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा.

आज पुराने शहर का मुस्लिम निवासी नए इलाक़ों में घर नहीं खरीद सकता और व्यापार नहीं कर सकता. मुसलमान दुखी हैं, हालात से समझौता कर लिया है.

सब ये कहते हैं कि इतने थपेड़ों के बाद और इतने हादसों के गुज़र जाने के बाद पुराने अहमदाबाद की सभी इस्लामी इमारतें अपने पूरे आब- ताब के साथ मौजूद हैं तो शहर के मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित है.

सामाजिक कार्यकर्ता सूफी अनवर हुसैन कहते हैं कि यहाँ के मुसलमान अहमदाबाद को अपने पूर्वजों का शहर मानते हैं. वो खुद को इस शहर का असली वारिस मानते हैं.

शिक्षक आरिफ़ ख़ान कहते हैं कि आज जमालपुर और दर्यापुर जैसी मुस्लिम बस्तियां बुनियादी नागरिक सुविधाओं से वंचित हैं लेकिन इन बस्तियों के रहने वालों का अपने शहर पर गर्व है और कोई उनसे ये नहीं छीन सकता.

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आज का अहमदाबाद भारत के 10 विशाल शहरों में से एक है. आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. विकास ने रफ़्तार पकड़ी है.

नरेंद्र मोदी जब मुख्यमंत्री थे तो शहर का तेज़ी से विकास हुआ. अहमद शाह का शहर अब भी क़ायम है. लेकिन आज दौर है मोदी और उनके साथी अमित शाह का.

अगर यहाँ के लोग नए और पुराने शहर को साबरमती के दो कभी न मिलने वाले किनारा मानें, तो मैं इनसे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता.

मेरे विचार में अहमद शाह से अमित शाह तक, अहमदाबाद से अमदावाद तक, यहाँ के रहनेवालों के लिए एक ऐसी कभी न ख़त्म होने वाली यात्रा है, जिसमें वो एक दूसरे का हाथ पकड़ कर शामिल हैं.

साबरमती इतनी सुन्दर नदी है तो उसके दो किनारे, इसकी दोनों संतानें क्यों न हों?

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