समाजवादी राजनीति की संभावनाएं कितनी बची हैं?

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ज़ाहिद ने मेरा हासिल-ए-इमां नहीं देखा, रुख़ पे तेरी ज़ुल्फ़ों को परेशां नहीं देखा.

समाजवाद और समतामूलक राजनीति के लिए प्रतिबद्ध तमाम दलों की कैफ़ियत इन दिनों कुछ ऐसी ही है.

उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजों के बाद भाजपा से कई कदम आगे जाकर, चौथे खंभे के स्तंभकारों और टेलीविज़न एंकरों ने हमारा और हम जैसे सरोकार वाले दलों का मृत्युआलेख लिख दिया.

प्रलय और क़यामत की शब्दावली की लगातार बौछार के बीच, मैं इस 'मृत-घोषित' राजनीतिक धारा की दुर्बलताओं के कुछ पहलूओं का ज़िक्र करूँगा, लेकिन आग्रह यह है कि इसे कोई 'मृत्युकालिक कथन' की तरह ना ले.

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क्योंकि इस धारा की राजनीतिक अपील अगर मृत हो गई, तो सत्ता और संसाधन में सत्तर से अस्सी प्रतिशत की भागीदारी और हिस्सेदारी की विरासत और भविष्य की संभावनाएं मात्र स्मृति के संग्रहालय में पाई जाएँगी.

तीन चौथाई की आबादी पर प्रभु वर्ग के दमन, उत्पीड़न और प्रतारणा की बातें बिसरा दी जाएँगी और ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ मुहिम बस पुराने इतिहास के बासी पन्ने के रूप में याद की जाएँगी. और हमारा पुख्ता यकीन है कि कोई भी ज़िंदा कौम इन सरोकारों से विलग होकर संविधान की प्रस्तावना को ज़मीन पर नहीं उतार सकती.

हमारी असफलताओं और कमजोरियों की श्रृंखला लंबी है, अतः मैं सिर्फ कुछ बिन्दुओं का ज़िक्र करूँगा ताकि एक समग्र दृष्टिकोण से देखा जा सके कि कहाँ-कहाँ चूक हुई है. डेनियल बेल ने पांच दशक पूर्व विचारधारा के खात्मे की घोषणा की थी और हमने बीते बीस वर्षों में बिना वजह उन्हें बहुत गंभीरता से ले लिया.

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नवउदारवादी राजनीति और अर्थनीति की पहली दस्तक के साथ ही लोहिया जी की सप्तक्रांति, जेपी की संपूर्ण क्रांति या समतामूलक समाज के तसव्वुर को हमने ख़ारिज करने में कोई कोताही नहीं बरती.

बीते पच्चीस वर्षों में वैचारिक राजनीति और व्यावहारिक/चुनावी राजनीति के बीच हमने व्यावहारिक राजनीति और उसके छोटे मुकामों को अपनी आख़िरी मंज़िल मान ली.

किसके विकास का ढिंढोरा?

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनावी राजनीति की दाल में थोड़ी व्यावहारिकता का छौंक ज़रूरी है लेकिन हमने तो पूरी दाल ही संकीर्ण सरोकारों की व्यावहारिकता की तैयार कर डाली.

नवउदारवादी दौर में जहाँ दस प्रतिशत लोगों के विकास को सबका विकास कह कर परोसा जाता रहा, जहां राज्य ने बाज़ार के समक्ष घुटने टेक दिए, हमारी भूमिका कभी मौन स्वीकृति की रही तो कभी महज़ सांकेतिक और खोखली असहमति की.

जहाँ हमें अमेरिकी डेमोक्रेट बर्नी सैंडर्स की तर्ज़ पर व्यापक सामाजिक संदर्भों, और ग़ैर बराबरी के खिलाफ समकालीन मुहावरे तलाशने थे, वहां हमने अपनी पूरी उर्जा संघ और भाजपा के द्वारा प्रेरित तमाशे की राजनीति पर अपनी प्रतिक्रिया में लगा दिया है.

हमने रोज़गार विहीन आर्थिक प्रगति के ख़िलाफ़ एक लंबी चुप्पी साध ली और एक वैकल्पिक ब्लू प्रिंट लाने के बजाय प्रतिक्रियात्मक राजनीति करते करते हम कब प्रतिगामी पथ पर चल पड़े, इसका हमें एहसास तक नहीं हुआ.

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अभिजात्य मीडिया के बड़े एक वर्ग की तमाम कोशिशों के बावजूद राजनीति का अब भी अर्थ है, संसाधनों के वितरण की व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करना और यह एक ऐसा महत्वपूर्ण मुद्दा है जिससे विलग रहने का अर्थ है 90 प्रतिशत की हिस्सेदारी और भागीदारी के प्रश्नों को 10 प्रतिशत के रहमो करम पर छोड़ देना. लेकिन हमने छोड़ दिया और नए मुहावरे तो छोड़िये पुराने मुहावरों और सरोकारों को भी बिसरा दिया.

सत्ता,संपदा और संसाधन का समतामूलक दृष्टिकोण हमारे राजनीतिक दर्शन के डीएनए में था, पता नहीं हम ये कब भुला बैठे. सामाजिक न्याय, आज़ादी, गैरबराबरी और धर्मनिरपेक्षता के बीच एक नैसर्गिक रिश्ता है और हम बीते वर्षों में इस बात को लोगों तक पहुंचाने में पूरी तरह असफल रहे हैं.

शहर और गांव का नया युवा वर्ग

नतीजतन हमने अभिव्यक्ति की आज़ादी को सामाजिक न्याय से और सामाजिक न्याय को धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ़ खड़ा होते देखा ही. नवउदारवादी दौर में शहरों और गाँवों में एक नए युवा वर्ग का उदय हुआ जिसे विश्लेषक न जाने क्यूँ आकांक्षा से लबरेज़ वर्ग मानता है.

इस शब्दावली को अगर ना भी मानें तो यह स्पष्ट नहीं है इस महत्वपूर्ण वर्ग से हमारा संवाद सिफ़र ही रहा है. जिनकी प्राथमिकता और प्रतिबद्धता समाज के कमज़ोर और मज़लूम तबकों के हकूक की वकालत रही है उन्हें इस वर्ग से संवाद और संप्रेषण के तरीके ईजाद करने थे.

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समसामयिक राजनीति में अक्सर 'विकास' की चर्चा होती है. कभी विकास रुका बताया जाता है कभी विकास चलता बताया जाता है. इस निर्गुण विकास को तमाम दुखों की औषधि बताया जाता है. मुख्यधारा के राजनीतिक दल अपनी तमाम दलीलों को इसी विकास की डोर में बांध कर पेश करते हैं. समाजवादी धारा की राजनीति से सरोकार रखने वालों ने इस विकास की परतें खोलने की अब तक ज़हमत नहीं उठाई है.

हमारी राजनीति से संबद्ध सारे संगठन इस नवउदारवादी विकास को नियति मान चुके हैं. विकास की इस गाथा को हम 125 करोड़ हिन्दुस्तानियों की विकास गाथा मान बैठे हैं. क्या इस विकास ने जाति और वर्ग जनित असमानता में तनिक भी सेंध लगाई है?

सामाजिक न्याय की लड़ाई

क्या इस विकास ने स्वास्थ्य शिक्षा और रोज़गार में गैरबराबरी के व्याकरण को दुरुस्त करने की दिशा में कुछ पहलकदमी की है? क्या श्रम की मर्यादा और गरिमा को बनाए और बचाए रखने में कोई महत्वपूर्ण कामयाबी हासिल हुई है? और सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि हमने इन सवालों से लगातार दूरी सी बना ली है.

आक्रामक बाज़ार और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी राजनीति ने सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी के विकास को प्रतिबद्ध वैकल्पिक राजनीति की मुहिम के लिये कई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं.

पिछड़ों की भागीदारी, शिक्षा और रोज़गार के अवसरों की समानता, अक़लियतों के हक़ूक़, उनकी सुरक्षा और असमान विकास के मुद्दों को एक तथाकथित 'हिंदुत्व के आवरण' से ढंका जा रहा है. और हमारे पास कोई वैकल्पिक दर्शन नहीं है. आप डोमिनेंट राजनीतिक दर्शन का विरोध उसकी धुंधली फोटोकॉपी बनकर नहीं कर सकते.

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समतामूलक धारा की राजनीति की लोकप्रियता और अपील में हाल के दिनों के ह्रास को चुनौतियों के संदर्भ में देखे जाने की भी आवश्यकता है और ऐसा नहीं करने पर अस्तित्व का संकट सिर्फ एक वैचारिक विषय नहीं रहेगा.

जेपी और लोहिया, लोकतंत्र की बाहर जाकर पैरोकारी से पहले, आतंरिक लोकतंत्र को सर्वोपरि मानते थे. हममें से कितने दल आज आंतरिक लोकतंत्र को अपनी कार्य शैली का अभिन्न हिस्सा मानते हैं. हमारी पूरी राजनीति चुनाव के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है और वह भी पुराने और भोथरे हथियारों से हम लड़ने की कोशिश करते हैं.

क्या है हमारी चुनौती?

हमारी धारा के राजनीतिक संगठनों को चौबीसों घंटे और सातों दिन लोगों के बीच उपलब्ध और सक्रिय रहना होगा. टॉप डाउन एप्रोच के बदले बॉटम अप एप्रोच के साथ आगे बढ़ते हुए प्रखंड, जिला और राज्य स्तर के संगठन को लोगों से लगातार संपर्क में रहकर उनके मुद्दों के प्रति सक्रिय पक्षधरता दिखानी होगी.

अपने पारंपरिक आधार समूहों के अलावा तमाम वैसे समूह जिनका हमारे राजनीतिक संगठनों के आधार समूहों से अंतर्विरोध नहीं है, उन्हें जोड़ने के लगातार सार्थक प्रयास किए जाएँ. एक दो बार की कोशिशों में पाई गयी असफलता से निराश हुए बगैर हम एक निरंतर सैद्धांतिक कार्यक्रम में तब्दील करें.

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हमारे संगठन और पार्टी के समर्थकों और लोगों में विचारधारा के लिए पूर्णसमर्पण होना चाहिए क्योंकि सिर्फ़ सत्ता के इर्दगिर्द की राजनीति लंबे दौर तक नहीं चल पाती है और असंख्य अवसरों पर सिर्फ सत्ता की राजनीति के कारण वैकल्पिक राजनीतिक संगठनों की विश्वसनीयता में ह्रास हुआ.

व्यक्ति केंद्रित विमर्श से निश्चित दूरी भी, वैकल्पिक राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त होनी चाहिए. ( ये लेखक के निजी विचार हैं. मनोज झा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.)

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