गोरा-काला- 'मां-बाप बच्चों के साथ आते हैं- इन्हें गोरा कर दो'

  • 17 अप्रैल 2017
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भारत में सदियों से गोरी त्वचा के लिए दीवानगी देखी जाती रही है. देश के कॉस्मेटिक बाज़ार में गोरापन बढ़ाने वाली क्रीम की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है.

यहां तक कि बॉलीवुड के कई अभिनेता और अभिनेत्रियां इन कॉस्मेटिक्स का विज्ञापन भी करते रहे हैं.

इंटरटेनमेंट फील्ड से आने वाली मॉडल-एक्टर टीना सिंह ने बीबीसी हिंदी के साथ एक फेसबुक लाइव में अपने अनुभव के बारे में बताया.

वह कहती हैं, "विज्ञापनों की दुनिया में अगर रंग गोरा नहीं हुआ तो आपको ऑडिशन रूम के बाहर से ही वापस किया जा सकता है. क्योंकि आप काले रंग की त्वचा के साथ किसी भी सामान का विज्ञापन नहीं कर सकते हैं."

रंगों को लेकर ये पूर्वाग्रह समाज से लेकर सिनेमा तक में भी दिखता है.

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Image caption बीबीसी फेसबुक लाइव में डॉक्टर जयश्री शरद और टीना सिंह के साथ योगिता लिमये (बीच में)

गोरेपन की मानसिकता

टीना कहती हैं, "अगर आपका रंग काला हुआ तो आपको हेल्पर, निम्न मध्यमवर्गीय किरदारों की पेशकश की जाएगी. आपको नेगेटिव रोल दिए जाएंगे. आपको कभी हीरोइन का रोल नहीं दिया जाएगा क्योंकि हीरोइन तो गोरी होती है, कटरीना कैफ जैसी."

सवाल उठता है कि पिछले दस सालों में गोरेपन को लेकर लोगों की मानसिकता में क्या बदलाव आया है.

पेशे से डर्मैटोलॉजिस्ट डॉक्टर जयश्री शरद इसी फेसबुक लाइव कार्यक्रम में कहती हैं, "कुछ भी नहीं बदला है. जो हालात कल थे, वही आज भी हैं. चाहे आप गांवों में चले जाओ या शहरों में या किसी भी प्रांत में. लोग ये समझते हैं कि अगर आप गोरे हो तो आप खूबसूरत हो."

लोगों के दिमाग में ये बात बचपन से ही डाली जाती है कि अगर आप काले हैं तो गोरे रंग वालों से थोड़ा पीछे हैं.

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भारत से बाहर

टीना बताती हैं, "मेरे पैदा होने पर नाना जी सिर्फ इसलिए रोने लगे थे कि मैं काली हूं. स्कूल कॉलेज में मेरे काले होने की वजह से दोस्त नहीं मिलते थे. उम्र के हर मोड़ पर मुझे बताया गया कि तुम्हारा रंग साफ नहीं है."

गोरेपन की चाहत न केवल औरतों को है बल्कि मर्द भी इससे अछूते नहीं हैं. लेकिन गोरेपन के इस बाजार के नए ग्राहकों में बच्चे भी शामिल हो रहे हैं.

डॉक्टर जयश्री शरद कहती हैं, "इसकी शुरुआत मां-बाप ही कर देते हैं. घर वालों को लगता है कि काली है तो शादी नहीं होगी, लड़का नहीं मिलेगा, ज्यादा दहेज देना होगा. मेरे पास मां-बाप अपने छोटे बच्चों को लेकर आते हैं कि उन्हें गोरा कर दो."

इसी से जुड़ा एक और सवाल है कि भारत से बाहर की दुनिया में गोरेपन को किस तरह से देखा जाता है.

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औपनिवेशिक अतीत

टीना सिंह, "एशिया में बाकी जगह गोरेपन को लेकर भारत से ज्यादा क्रेज है. उन्हें ज्यादा से ज्यादा गोरी त्वचा चाहिए. लेकिन यूरोप जाने पर मुझे एहसास हुआ कि मैं भी खूबसूरत हूं और इसका एहसास मुझे वहां के लोगों ने ही कराया. अब मुझे खुद को आईने में देखना अच्छा लगता है. मैं कोने में नहीं खड़ी रहती."

डॉक्टर जयश्री शरद टीना की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "दक्षिण पूर्वी एशिया में गोरेपन को लेकर गज़ब का ललक है. लेकिन वहां इसकी वजह शादी तो नहीं होती है. मध्य पूर्व के लोग पहले से काफी गोरे होने के बावजूद लोग व्हाइटनिंग ट्रीटमेंट कराते हैं."

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जयश्री कहती हैं, "सिर्फ यही वजह नहीं है. पारंपरिक रूप से ब्राह्मणों को गोरा माना गया. काले रंग वाले लोगों को गुलाम माना गया. इसकी शुरुआत वहीं से हुई है. अगर आप काले हैं तो आप मानो पाप का प्रतीक हैं. पुरानों में यही तस्वीर बनाई गई कि जो काला है वो राक्षस है और राजा-रानियों को गोरा दिखाया गया."

जयश्री कहती हैं कि यह सदियों से चला आ रहा है और इसे कहीं तो तोड़ना पड़ेगा.

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