दिल्ली का 'डिजिटल' गांव कितना डिजिटल?

  • 21 अप्रैल 2017

कुछ हफ़्तों पहले तक भारत को डिजिटल बनाने की मुहिम खूब ज़ोर-शोर से शुरू हुई, लेकिन अब उतनी उसकी चर्चा नहीं हो रही. कुछ इलाकों में ये कोशिश धीमी गति से चल रही है. एक गाँव में तो शुरुआत के बाद ही पता चला कि डिजिटल होने के लिए एक डेबिट कार्ड या बैंक खाता काफ़ी नहीं. इससे जुड़े हैं कई सामाजिक मुद्दे.

फ़रवरी में दिल्ली हरियाणा सीमा के नजफ़गढ़ के गांव सुरखपुर को 'डिजिटली पेमेंट एनेबल्ड' घोषित किया गया. केन्द्र सरकार के 'डिजिटल इंडिया मुहिम' के बाद दिल्ली सरकार ने एक गाँव को डिजिटल बनाने की कोशिश की. एक गाँव को डिजिटल बनाने की कोशिश में बुनियादी तौर पर चीज़ें उपलब्ध करवाई गईं, लेकिन कुछ लोग इस कोशिश में पीछे रह गए. आधारभूत ढाँचा है पर उसका इस्तेमाल कैसे किया जाए?

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दिल्ली का 'डिजिटल' गाँव कितना डिजिटल

दिल्ली के पहले डिजिटल गाँव में से एक ?

नज़फ़गढ़ की सब डिविज़नल मैजिस्ट्रेट अंजलि सेहरावत ने बताया कि शुरुआत करने के लिए सुरखपुर को क्यों चुना गया. अंजलि सेहरावत ने कहा, "सुरखपुर दिल्ली के उन पहले गाँव में से एक है जो डिजिटली पेमेंट एनेबल्ड' हैं. सुरखपुर को पायलट प्रोजेक्ट के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि इस गाँव की आबादी कम थी. बैंक वाले गाँव में आए, कोशिश की गई कि गांव के हर परिवार के एक सदस्य के पास एक बैंक खाता हो और एक डेबिट या क्रेडिट कार्ड हो. गाँव में दो दुकानें हैं जिनमें डिजिटल पेमेंट मशीन लगाई गई. लेकिन जब सब हो गया तब चुनौतियों का पता लगा. कुछ दिलचस्प बातें भी सामने आईं."

जब विकास की गाड़ी उल्टी चली पर चली

गांव वालों ने भी इस बात की पुष्टि की कि ज़्यादातर घर में बैंक खाते हैं. गांव में दो दुकाने हैं. दोनों पर आपको डिजिटल पेमेंट मशीन या 'पॉइंट ऑफ़ सेल' मशीन मिल जाएगी. दोनों दुकानों को औरत और आदमी चलाते हैं.

पहली दुकान पर समान बेचती सोमा सोलंकी ने बताया, "मैं कार्ड का इस्तेमाल करना जानती हूँ. हर दिन कुछ लोग आते हैं जो कार्ड का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन औरतें और बुज़ुर्ग इसका उतना इस्तेमाल नहीं करते. ऊपर से औरतें कार्ड का इस्तेमाल करने से झिझकतीं हैं." जिस वक़्त ये बातचीत हुई उस वक़्त ये मशीन नहीं चल रही थी.

दूसरी दुकान में समान बेच रही बुज़ुर्ग महिला राजकुमारी, मशीन और कार्ड का इस्तेमाल करना नहीं जानती थीं. उन्होंने कहा, "मैं नहीं जानती पर मेरे परिवार वाले जानते हैं. अगर सीखने को मिला तो कोशिश करूँगी पर इस उम्र में दिक्कत होती है. कुछ लोग आते हैं जो कार्ड का इस्तेमाल करते हैं." जिस वक़्त ये बातचीत हुई उस वक़्त ये मशीन नहीं चल रही थी.

इस गांव के बुज़ुर्ग किसान कपूर सिंह ने बातचीत में बताया,"मैं तो नहीं सीख पाया ना मेरी बीवी क्योंकि हम बूढ़े हैं, अनपढ़ हैं. लेकिन मेरा बेटा ये सब जानता है."

अंजलि सेहरावत ने बताया कि प्रशासन क्या कर रहा है, "पहली बात यहाँ तो सिग्नल बहुत कमज़ोर है क्योंकि मोबाइल टावर नहीं. फिर हमने कम्पनियों को लिखा कि वो आकर एक टावर लगाएं. उसके बाद यहाँ सब लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते."

विकास के रास्ते में आता हैं सामाजिक ढाँचा

यहाँ विकास के रास्ते में आता है सामाजिक ढाँचा जहाँ औरतें घर चलाती हैं और मर्द काम करते हैं. महिलाओं की भागीदारी को लेकर उन्होंने बतया कि औरतें इस मुहिम में कहीं पीछे रह गई हैं."

औरतों में बहुत कम हैं जो पढ़ना जानती हैं. ज़्यादातर औरतें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं. ऊपर से औरतें कार्ड का इस्तेमाल करने से झिझकतीं हैं.

मेरे पास दो औरतें आईं और मज़ाक में बोलीं - क्या करेंगे बैंक खातों का जब उसमें पैसे ही नहीं होंगे. उसके बाद हमने देखा कि बुज़ुर्ग भी इसे इस्तेमाल करना नहीं जानते ."

प्रशासन ने बीते हफ्ते ही बैंक के कुछ अधिकारियों को गांव में बुलाया और औरतों के साथ एक वर्कशॉप की. इसमें औरतों को मोबाइल बैंकिंग और बैंक से जुड़ी कुछ ऐप्स के बारे में बताया गया और उनपर काम करना सिखाया गया.

जहाँ सरकार ने चुनौतियाँ देखीं वहीं कुछ और दिलचस्प बातें सामने आईं.

अंजलि सेहरावत ने बताया, "जहाँ रोज़ की ज़रूरतों के लिए कार्ड का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे वहीं लोग रोज़ कुछ खरीदते हैं और महीने के अंत में उधारी खाते से उसका हिसाब कार्ड से करते हैं. ये जो नई पीढ़ी है वो इस बादलाव का हिस्सा है. युवा लड़के लड़की इसका इस्तमाल कर रहे हैं."

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