बाबरी मस्जिद: केस जो अब भी अदालत में हैं

  • 19 अप्रैल 2017
इमेज कॉपीरइट Getty Images

बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विवादित बाबरी मस्जिद को तोड़ने की साज़िश के आरोप में 13 भाजपा नेताओं पर केस चलेगा.

बाबरी मामले में आडवाणी समेत भाजपा नेताओं पर चलेगा केस

अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद इमारत को तोड़ने के कथित षड्यंत्र, भडकाऊ भाषण और पत्रकारों पर हमलों के कई मुकदमे पिछले 25 वर्षों से कानूनी दांव पेंच और अदालतों के भंवरजाल में उलझे हैं.

कुल 49 में से 22 अभियुक्तों पर लखनऊ में और आठ पर रायबरेली में मुकदमे चलते आए हैं.

इस बीच कम से कम दस अभियुक्तों और लगभग पचास गवाहों की मृत्यु हो चुकी है.

मामलों के कई अभियुक्त, गवाह और पैरोकार भी इतने बूढ़े और कमजोर हो चले हैं कि उन्हें लखनऊ में विशेष अदालत की तीसरी मंजिल पर चढ़ने में भी कठिनाई होती है.

आइए नज़र डालते हैं प्रमुख मामलों पर

केस नंबर 197

इमेज कॉपीरइट Ashok vahie

छह दिसंबर 1992 को विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद इमारत पूरी तरह से ध्वस्त होने के बाद थाना राम जन्मभूमि, अयोध्या के प्रभारी पीएन शुक्ल ने शाम पांच बजकर पन्द्रह मिनट पर लाखों अज्ञात कार सेवकों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा कायम किया. इसमें बाबरी मस्जिद गिराने का षड्यंत्र, मारपीट और डकैती शामिल है.

केस नंबर 198

Image caption प्रस्तावित रामजन्म भूमि मंदिर का मॉडल

लगभग दस मिनट बाद एक अन्य पुलिस अधिकारी गंगा प्रसाद तिवारी ने आठ लोगों के खिलाफ राम कथा कुंज सभा मंच से मुस्लिम समुदाय के खिलाफ धार्मिक उन्माद भडकाने वाला भाषण देकर बाबरी मस्जिद गिरवाने का मुकदमा कायम कराया.

हो क्या रहा है अयोध्या की 'राम मंदिर कार्यशाला' में

ये नामजद अभियुक्त हैं : अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विष्णु हरि डालमिया, विनय कटियार, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा.

इसी मुकदमे के आधार पर पुलिस ने 8 दिसंबर 1992 को आडवाणी व अन्य नेताओं को गिरफ्तार किया था. शांति व्यवस्था की दृष्टि से इन्हें ललितपुर में माताटीला बाँध के गेस्ट हॉउस में रखा गया.

इस मुकदमे की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस की सीआईडी क्राइम ब्रान्च ने की.

सीआईडी ने फरवरी 1993 में आठों अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी.

मुकदमे के ट्रायल के लिए ललितपुर में विशेष अदालत स्थापित की गई. बाद में आवागमन की सुविधा के लिए यह अदालत रायबरेली ट्रांसफर कर दी गई.

पत्रकारों पर हमले के मामले

इन दो मामलों के अलावा पत्रकारों और फोटोग्राफरों ने मारपीट, कैमरा तोड़ने और छीनने आदि के 47 मुक़दमे अलग से कायम कराए. ये मामले लखनऊ में जुड़े हैं.

सरकार ने बाद में सभी केस सीबीआई को जाँच के लिए दे दिए. सीबीआई ने रायबरेली में चल रहे केस नंबर 198 की दोबारा जाँच की अनुमति अदालत से ली.

लखनऊ स्पेशल कोर्ट का गठन

उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 सितम्बर 1993 को नियमानुसार हाई कोर्ट के परामर्श से 48 मुकदमों के ट्रायल के लिए लखनऊ में स्पेशल कोर्ट के गठन की अधिसूचना जारी की. लेकिन इस अधिसूचना में केस नंबर 198 शामिल नही था, जिसका ट्रायल रायबरेली की स्पेशल कोर्ट में चल रहा था.

सीबीआई के अनुरोध पर बाद में 8 अक्टूबर 1993 को राज्य सरकार ने एक संशोधित अधिसूचना जारी कर केस नंबर 198 को भी लखनऊ स्पेशल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में जोड़ दिया.

लेकिन राज्य सरकार ने इसके लिए नियमानुसार हाई कोर्ट से परामर्श नही किया.

बाद में आडवाणी और अन्य अभियुक्तों ने राज्य सरकार की इस तकनीकी त्रुटि का लाभ हाई कोर्ट में लिया.

चार्जशीट एवं संयुक्त ट्रायल

सीबीआई ने सभी 49 मामलों में चालीस अभियुक्तों के खिलाफ संयुक्त चार्जशीट फ़ाइल की. सीबीआई ने बाद में 11 जनवरी 1996 को 9 अन्य अभियुक्तों के खिलाफ पूरक चार्जशीट फाइल की.

शल जज अयोध्या प्रकरण जेपी श्रीवास्तव ने 9 सितंबर 1997 को आदेश किया कि सभी 49 अभियुक्तों के खिलाफ सभी 49 मामलों में संयुक्त रूप से मुकदमा चालाने का पर्याप्त आधार बनता है क्योंकि ये सभी मामले एक ही कृत्य से जुड़े हैं. जज ने सभी अभियुक्तों को 17 अक्टूबर 1997 को आरोप निर्धारण के लिए तलब किया.

हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका

इमेज कॉपीरइट Pti

आडवाणी समेत 33 अभियुक्त स्पेशल जज के इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट चले गए. लगभग साढ़े तीन साल की सुनवाई के बाद 12 फरवरी 2001 को हाई कोर्ट के जस्टिस जगदीश भल्ला ने अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत ने संयुक्त चार्जशीट को स्वीकार करके कोई गलती नही की है क्योंकि ये सभी अपराध एक ही षड्यंत्र से जुड़े हैं और उनके सबूत भी एक जैसे हैं, भले ही उनके लिए 49 अलग अलग मुकदमे दायर किए गए.

हाई कोर्ट ने स्पेशल जज जेपी श्रीवास्तव ने 9 सितम्बर 1997 को 48 मुकदमों में आरोप निर्धारण के आदेश को भी सही माना.

मगर जस्टिस भल्ला ने अपने आदेश में कहा कि स्पेशल जज को क्राइम नंबर 198 के ट्रायल का क्षेत्राधिकार नही था, चूँकि इस मामले को रायबरेली से लखनऊ की विशेष अदालत को ट्रांसफर करने के बारे में हाई कोर्ट से परामर्श नही किया गया.

जस्टिस भल्ला ने यह भी कहा कि राज्य सरकार चाहे तो इस कानूनी त्रुटि को दूर करने के लिए नई अधिसूचना जारी कर सकती है.

यह वो मामला है जिसमें आडवाणी समेत आठ लोग नामजद अभियुक्त हैं.

आडवाणी और अन्य 20 को अस्थायी राहत

हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद 4 मई 2001 को लखनऊ की विशेष अदालत के जज एसके शुक्ला ने आदेश किया कहा कि जब तक हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार क्षेत्राधिकार संबंधी कानूनी त्रुटि दूर नही कर दी जाती, फिलहाल क्राइम नम्बर 198 का ट्रायल प्रथक कर ड्रॉप किया जा रहा है.

क्राइम नम्बर 198 में आडवाणी समेत केवल आठ अभियुक्त नामजद थे. मगर जज ने उसमे तेरह और अभियुक्तों को जोड़कर 21 अभियुक्तों के खिलाफ ट्रायल रोक दिया.

जज ने जिन अन्य तेरह लोगों को क्राइम नंबर 198 में जोड़ा उनमे तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे अब स्वर्गीय शामिल हैं. इनमें ठाकरे का हाल में निधन हो गया.

सीबीआई ने 16 जून 2001 को उत्तर प्रदेश सरकार को लिखा कि हाई कोर्ट आदेश के मुताबिक़ नई अधिसूचना के जरिए लखनऊ की विशेष अदालत को केस नम्बर 198 के ट्रायल का भी अधिकार दे दिया जाए.

लेकिन पहले राजनाथ सिंह और फिर मायावती सरकार ने नई अधिसूचना जारी करने से इनकार कर दिया.

जाहिर है उस समय लखनऊ और दिल्ली दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकारें थीं. आडवाणी स्वयं गृह मंत्री थे. इसलिए नई अधिसूचना जारी करने की कार्यवाही नही हुई.

हाई कोर्ट आदेश के मुताबिक सीबीआई ने 27 जनवरी 2003 को रायबरेली की स्पेशल कोर्ट में आडवाणी समेत आठ लोगों के खिलाफ भड़काऊ भाषण का मुकदमा बहाल करने को कहा.

मुकदमा चालू हुआ, लेकिन स्पेशल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट विनोद कुमार सिंह ने 19 सितम्बर 2003 को आडवाणी को बरी करते हुए डॉ. मुरली मनोहर जोशी और अशोक सिंघल समेत केवल सात अभियुक्तों के खिलाफ आरोप निर्धारण कर मुकदमा चलाने का निर्णय किया.

इस आदेश के खिलाफ भी हाई कोर्ट में अपील हुई और दो साल बाद छह जुलाई 2005 को हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पहली नजर में सभी आठों अभियुक्तों के खिलाफ मामला बनता है. इसलिए आडवाणी को बरी करना ठीक नही.

इस तरह आडवाणी समेत आठ लोगों पर रायबरेली कोर्ट में मुकदमा बहाल हो गया.

सीबीआई का तर्क था कि आडवाणी और अन्य सात लोग मुकदमा नंबर 197 की विवेचना में भी मस्जिद गिराने के षड्यंत्र के दोषी हैं. इसलिए उन पर रायबरेली के अलावा लखनऊ कोर्ट में भी मुकदमा चलना चाहिए. लेकिन सीबीआई ने इसके लिए लखनऊ कोर्ट में कोई पूरक चार्जशीट दाखिल नही की.

सीबीआई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में

इमेज कॉपीरइट EPA

सीबीआई ने स्पेशल जज के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल करके कहा कि अगर क्राइम नंबर 198 का ट्रायल अलग कर दिया जाता है तो भी आडवाणी समेत सभी 21 अभियुक्त क्राइम नम्बर 197 में बाबरी मस्जिद गिराने के षड्यंत्र के अभियुक्त हैं. इसलिए उन पर भी लखनऊ की विशेष अदालत में मुकदमा चलना चाहिए.

लेकिन दस साल बाद 20 मई 2010 को हाई कोर्ट के जस्टिस एके सिंह ने सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए स्पेशल कोर्ट लखनऊ द्वारा केस नम्बर 198 में आडवाणी, कल्याण सिंह और ठाकरे समेत 21 अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा स्थगित करने के आदेश को सही ठहराया.

हाई कोर्ट के आदेश के बाद 17 अगस्त 2010 को लखनऊ कोर्ट ने जीवित बचे अभियुक्तों को तलब कर उनके खिलाफ आरोप निर्धारित किए और 17 साल बाद ट्रायल शुरू हुआ.

सीबीआई ने 9 फरवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट में अपील करके मांग की थी कि हाई कोर्ट के इस आदेश को खारिज करते हुए आडवाणी समेत 21 अभियुक्तों के खिलाफ बाबरी मस्जिद गिराने के षड्यंत्र एवं अन्य धाराओं में मुकदमा चलाया जाए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)