एक नई जंग लड़ रही हैं ये आदिवासी लड़कियां

  • 20 अप्रैल 2017
इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha

लातेहार के सुदूर गांव की आदिवासी लड़की दयमंती कच्छप ( बदला नाम) मानव तस्करी के जाल से निकलकर ज़िंदगी की नई जंग लड़ रही है. अब किसी सूरत में वो परदेस नहीं जाना चाहती.

मानव तस्करों के झांसे में आकर वो दिल्ली ले जाई गई थी, जहां उसे दाई का काम मिला. लेकिन कई दिनों तक खाना नहीं मिलने और मारपीट की घटना के बीच वो रोज जीती- मरती थी. यही वजह है कि दिल्ली के नाम से उसके रोएं खड़े हो जाते हैं.

'टैबलेट दीदी' से मिलिए जो झारखंड की तस्वीर बदलने में जुटी हैं

वो गोरी मेम जो ब्रिटेन से आकर झारखंड की हो गई

तरसे अनाज के लिए

दयमंती बताती हैं कि गांव में जबरदस्त सूखा पड़ने के बाद वे लोग अनाज के लिए तरस रहे थे. तब वो नौवीं कक्षा में पहुंची ही थी.

इसके कुछ महीनों के बाद उसने अपने पसंद के लड़के से शादी भी की. हालांकि घर वाले इसके ख़िलाफ़ थे.

इस बीच कुछ दलालों के झांसे में वे आई. तब दलालों ने कहा था कि दिल्ली चलो ज़िंदगी बदल जाएगी. पति के साथ वो दिल्ली चली गई, जहां दोनों को अलग- अलग काम दिलाया गया.

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha

दयमंती बताती हैं कि जिस घर में दाई का काम दिलाया गया था, उसके यहां खाना बनता ही नहीं था. जब- तब उसे कमरे में बंद कर वे लोग पार्टी या डिनर पर निकल जाते. सीढ़ी के सामने फर्श पर उसे सोने को कहा जाता. एक ही चादर को वो ओढ़ना- बिछौना बनाती. कई शाम उसे भूखे रहना पड़ता. विरोध करने पर उसकी पिटाई की जाती.

वो कहती हैं- "वो औरत तो हैवान थी. कभी चप्पल चलाती, तो कभी थप्पड़. मेरे पास फोन के जो नंबर थे, उसने उसे छीन लिया."

झारखंड: जन-धन खाताधारियों पर नक्सलियों और पुलिस की नज़र

'सीना पत्थर हो गया'

थोड़ा और कुरेदने पर क्षण भर के लिए वो खामोश हो जाती हैं. फिर धीरे से कहती हैं कि उन पलों की चर्चा न करें, तो अच्छा. अगर वो दलाल और औरत सामने पड़ जाएं, तो उनके मुंह नोंच लूं.

लंबी छटपटाहट के बाद पति के साथ भाग निकलने में सफल रही. इधर गांव में घर के हालात अच्छे नहीं थे, लिहाजा वो दिहाड़ी मजदूरी करने लगी. इस बीच पति फिर से दिल्ली चला गया. और वो वक्त भी आया, जब वो मुंह मोड़ने लगा. तब वो अकेली पड़ती रही.

उसका कहना था कि पति कभी-कभार फोन करता भी है, तो गाली-गलौज से उसकी बात शुरू होती है. तब हमने फोन करने से साफ मना कर दिया है. हालांकि ससुराल वाले उसकी मदद करना चाहते हैं.

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha

अब उसके सामने दो बच्चों के साथ बूढ़े और बेबस मां- बाबा का चेहरा है. और बच्चों को पढ़ाने- बढ़ाने की जिद है. इसी राह की तलाश में इन दिनों वो प्रशिक्षण हासिल कर रही है, ताकि सुरक्षा गार्ड का काम मिल सके. प्रशिक्षण के दिन गुजरने के साथ उसकी उम्मीदें भी जवां हो रही है.

इतनी कड़ी धूप के बीच प्रशिक्षण परेशान नहीं करता, इस सवाल पर दयमंती के साथ कई लड़कियां एक साथ कहती हैं, "परिस्थतियों ने हाथों और सीने को पत्थरों सा मजबूत बना दिया है."

मानव तस्करी का चंगुल

दरअसल दयमंती अकेली नहीं, झारखंड की दर्जनों आदिवासी लड़कियां, जो मानव तस्करी की जाल से बाहर निकलने में सफल रही हैं, इन दिनों ज़िंदगी की नई राह तलाश रही है.

इनमें कई लड़कियां , निजी अस्पतालों, कारखानों तथा सरकार की कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालयों में काली- नीली वर्दियां पहने सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने लगी हैं. हालांकि महीने में उन्हें छह से आठ हज़ार मिलते हैं, पर इसी कमाई से वे हालात बदलने के सपने देखती हैं.

इनमें रीता मुंडा ( बदल नाम) भी शामिल हैं , जो इन दिनों बेहद खुश हैं. प्रशिक्षण हासिल करने के बाद झारखंड की राजधानी रांची के एक निजी अस्पताल में उसे सुरक्षा गार्ड का काम मिला है.

उन्हें लगता है कि अब वो बीए की पढ़ाई पूरी कर सरकारी नौकरी हासिल कर सकेगी तथा पैसे के अभाव में छोटे भाई -बहनों की पढ़ाई कतई नहीं रूकने देगी.

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha

रांची से करीब चालीस किलोमीटर दूर बीजूपाड़ा में ऐसी ही लड़कियों से मिलने जब हम पहुंचे थे, तो 41 डिग्री के पारे की परवाह किए बिना वे प्रशिक्षण हासिल करने में जुटी थीं.

भारतीय किसान संघ इन लड़कियों को 'आग़ाज़' कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण देने और रोजगार से जोड़ने की कोशिशों में जुटा है.

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और मानव तस्करी पर लंबे समय से काम कर रहे संजय मिश्रा बताते हैं कि अब तक डेढ़ सौ से अधिक लड़कियों को रोजगार से जोड़ा गया है, जबकि इस बैच में 30 लड़कियां प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं.

संजय मिश्र के मुताबिक रोजगार की तलाश में जो लड़कियां मानव तस्करों की जाल में फंस सकती हैं या उससे बाहर निकलने में सफल रही है, उन्हें नई ज़िंदगी देने के लिए सरकार के मानव संसाधन, श्रम तथा समाज कल्याण विभाग से समन्वय स्थापित किया गया है.

कई स्तरों पर काम करने की ज़रूरत

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

संगठित अपराध की महानिरीक्षक संपत मीणा कहती हैं कि बेशक यह मसला बेहद संवेदनशील है. पूरी तस्वीर बदलने के लिए कई स्तर पर एक साथ काम किए जाने की जरूरत है.

वे बताती हैं कि मानव तस्करी, जुवेनाइल जस्टिस तथा पोस्को एक्ट को लेकर करीब तीस कार्यशालाएं की गई हैं, जिनमे कम से कम तीन हज़ार पुलिस को प्रशिक्षण दिया गया है. राज्य के आठ ज़िलों में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग थाने खोले गए हैं. हाल ही में सभी डीआइजी को इन थानों को सुदृढ़ करने के निर्देश दिए गए हैं.

उनका कहना था अब गांवों के लोग भी जानने लगे हैं कि मानव तस्करी संगीन अपराध है, लिहाजा वे अब एफआइआर दर्ज कराने लगे हैं. इससे रेस्कयू के साथ तस्करों की गिरफ़्तारी तेज़ हुई है.

गार्ड के तौर पर तैनाती

इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha

साल 2013 से 2016 तक राज्य में मानव तस्करी के 347 मामले दर्ज कराए गए, जबकि 369 लोगों को इस जाल से बाहर निकाला गया है. इसके साथ ही 224 तस्करों की गिरफ्तारी हुई. गिरफ्तार होने वालों में 74 महिलाएं शामिल हैं.

मानव संसाधन विकास विभाग की सचिव अराधना पटनायक बताती हैं कि मानव तस्करी की जाल से निकाली गई दर्जनों लड़कियों को कस्तूरबा आवासीय विद्यालय में दाखिला कराया गया है. स्कूलों में उन्हें हीन नज़रों से नहीं देखा जाए, इसके लिए कई तरह के कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं. वे खुद इसकी मोनिटरिंग करती हैं. जबकि कई लड़कियां बेहद तेज़ तर्रार हैं. इनके अलावा ट्रेनिंग हासिल करती बालिग लड़कियों को कस्तूरबा की स्कूलों में गार्ड के तौर पर तैनात किया जा रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे