अमीष त्रिपाठी 10-12 साल नास्तिक रहने के बाद फिर आस्तिक कैसे हुए?

  • 20 अप्रैल 2017
अमीष त्रिपाठी

उनकी किताबें धर्म और अध्यात्म के इर्द-गिर्द घूमती हैं.

42 वर्षीय अमीष ने 'द इम्मोर्टल्स ऑफ़ मेलुहा', 'द सिक्रेट ऑफ़ नागाज़', 'दो ओथ ऑफ़ द वायुपुत्राज़' और 'स्कियन ऑफ़ इक्ष्वाकु' नाम से चार किताबें लिखी हैं. इनमें पहली तीन किताबें 'शिवा ट्रॉयोलजी' सिरीज का हिस्सा मानी जाती हैं.

बकौल अमीष लेखक खुद भी उसी मोहल्ले में ज्यादा ज्यादा रहता है जिसमें उसकी दिलचस्पी होती है. अमीष की किताबों की पृष्ठभूमि के संदर्भ को इससे भी समझा जा सकता है कि उनके पुरखे बनारस में पंडिताई करते थे.

लेकिन एक धार्मिक माहौल वाले परिवार में पैदा हुए अमीष किशोर उम्र में पहुंचते पहुंचते नास्तिक बन गए.

बीबीसी से एक फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम के दौरान उन्होंने बीबीसी संवाददाता वंदना को बताया, "बचपन में तो मैं आस्तिक था. 90 के दशक की शुरुआत में जब किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखा था तो 10-12 सालों के लिए नास्तिक हो गया."

अमीष खुद मानते हैं, "मैं ये तो नहीं कह सकता कि मेरे माता-पिता इससे खुश थे या नहीं. लेकिन मेरा परिवार एक उदारवादी परिवार था."

अमीष कहते हैं कि किताबें लिखने के दौरान ही अपने आप उनका झुकाव फिर आस्था की ओर फिर हो गया.

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पर ये हुआ कैसे कि खुद को नास्तिक कहने वाला एक शख्स आस्तिक बन गया.

अमीष त्रिपाठी कहते हैं, "ऐसा केवल भगवान शिव ही कर सकते थे. हम जैसे बाग़ी लोगों के लिए भगवान शिव बेहद आकर्षक ईश्वर हैं. वे खुद भी बाग़ी तरह के भगवान हैं."

अमीष की किताब 'द इम्मोर्टल्स ऑफ़ मेलुहा' का केंद्रीय पात्र स्वयं 'भगवान शिव' ही हैं.

धार्मिक होने और नास्तिक होने के बीच के विरोधाभास पर अमीष का कहना है, "आप प्राचीन सभ्यता को देखें तो नास्तिक होना कोई बुरी बात नहीं थी. पुराने वक्त में धर्म से जुड़े दर्शनशास्त्र के नौ स्कूल्स थे जिनमें कुछ तो नास्तिक थे. प्राचीन भारत में ये माना जाता था कि सबसे महत्वपूर्ण अच्छे कर्म होते हैं. आस्तिक होना या नास्तिक होना किसी की निजी आस्था का विषय है."

क्या पब्लिक डिबेट में धर्म को लेकर वाद विवाद या संवाद की जगह कम हुई है?

अमीष कहते हैं, "मैं नहीं मानता लेकिन मीडिया कट्टरपंथी तबकों को ज्यादा स्पेस दे रहा है, मानो सब लोग उसी से प्रभावित हैं."

उनका कहना था, "भारत का हाल सीरिया जैसा तो नहीं है. ज्यादातर आम लोग धार्मिक भी हैं और उदारवादी भी हैं. पब्लिक स्पेस में, मीडिया में शांत लोगों को ज्यादा दिखाने की जरूरत है."

(बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत पर आधारित)

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