यूपी में फेरबदल, सुलखान सिंह बने नए डीजीपी

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उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश के डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) जावीद अहमद की जगह सुलखान सिंह को राज्य का पुलिस प्रमुख बना दिया है.

योगी सरकार ने आईपीएस अफ़सरों के पहले बड़े फेरबदल में 12 आईपीएस अफ़सरों का स्थानांतरण किया है.

इसमें प्रदेश के एडीजी (क़ानून एवं व्यवस्था) दलजीत सिंह का भी तबादला कर दिया गया है.

उनकी जगह आदित्य मिश्र को अपर पुलिस महानिदेशक (क़ानून एवं व्यवस्था) बनाया गया है.

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यश भारती सम्मान

योगी के निशाने पर अब राज्य का सबसे बड़ा सम्मान यश भारती भी आ गया है.

संस्कृति मंत्रालय की समीक्षा के दौरान उन्होंने इस बात की जांच करने के आदेश जारी किए कि पता किया जाए कि जिन्हें ये पुरस्कार मिले हैं, वो इसकी कितनी योग्यता रखते हैं.

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यशभारती सम्मान उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ रखने वाले ऐसे लोगों को दिया जाता है जिन्होंने कला, संस्कृति, साहित्य, पत्रकारिता, खेलकूद जैसे क्षेत्रों में नाम कमाया हो. लेकिन पिछले दो-तीन साल में इस पुरस्कार को लेकर इतने विवाद हुए कि पुरस्कार के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे.

बीजेपी ने भी विपक्ष में रहते हुए इस पुरस्कार को लेकर सरकार को जमकर घेरा था. अब जब पार्टी सरकार में है तो उसने पात्र लोगों के चयन की समीक्षा करने का आदेश जारी कर दिया.

राज्य के संस्कृति मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने बीबीसी को बताया, "मुख्यमंत्री जी ने यही कहा है कि पता किया जाए कि जिन लोगों को ये मिला है क्या वो सच में इसके हक़दार थे? यह भी पता किया जाएगा कि किस प्रक्रिया के तहत लोगों को पुरस्कार दिए गए हैं. आपको पता है कि इतने बड़े सम्मान को मज़ाक बना दिया गया था."

कब हुई शुरुआत?

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यश भारती पुरस्कार की शुरुआत 1994 में मुलायम सिंह यादव ने तब की थी जब वो मुख्यमंत्री थे. शुरुआत में इसमें पांच लाख रुपये की धनराशि दी जाती थी जिसे बाद में बढ़ाकर 11 लाख रुपये कर दिए गए.

लेकिन इसे लेकर सबसे ज़्यादा चर्चा तब हुई जब क़रीब दो साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पुरस्कार पाने वालों के लिए पेंशन की घोषणा की.

ये पुरस्कार अब तक अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, अभिषेक बच्चन से लेकर शुभा मुद्गल, कैलाश खेर, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, इरफ़ान हबीब जैसे लोगों को मिल चुका है.

मायावती ने बीएसपी सरकार के दौरान इसे बंद कर दिया था, लेकिन 2012 में अखिलेश सरकार ने फिर से शुरू कर दिया.

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पिछली सरकार में जिस उदारता के साथ पुरस्कार दिए गए, उसे लोग पचा नहीं पाए. पिछले दो साल में ही इतने लोगों को यश भारती बाँट दिया गया जितने अब तक नहीं बंटे थे. वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र भी यश भारती पा चुके हैं, लेकिन पात्रता की शर्तों को लेकर वो भी सवाल उठाते हैं.

योगेश मिश्र कहते हैं, "जिस मंच से मुझे पुरस्कार दिया गया, उसी मंच से इस पुरस्कार की घोषणा ऐसे हो रही थी जैसे इसके लिए कोई नियम ही न हो. जबकि पुरस्कार के लिए बाक़ायदा आवेदन किया जाता है और कहा जाता है कि स्क्रीनिंग कमेटी उस पर निर्णय करती है. पात्रता की जांच करने का फ़ैसला स्वागत योग्य है."

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विवादों से नाता

पिछली सरकार में आरोप लगे थे कि अखिलेश यादव ने तमाम क़रीबी लोगों को आर्थिक मदद देने के लिए इस पुरस्कार का सहारा लिया. कई बार तो हास्यास्पद स्थिति तक आ गई.

मसलन पिछले साल पुरस्कार समारोह का संचालन कर रही महिला को मंच से ही उन्होंने पुरस्कार देने की घोषणा कर दी, जिसे सुनकर वो महिला भी हतप्रभ रह गई.

यही नहीं, कई चहेते अधिकारियों की पत्नियों को भी ये पुरस्कार मिला और जानकार बताते हैं कि समाजवादी पार्टी के दफ़्तर में काम करने वाले कुछेक ऐसे कर्मचारियों को भी पत्रकारिता के क्षेत्र में ये पुरस्कार दिया गया जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं था.

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लेकिन समाजवादी पार्टी प्रवक्ता जूही सिंह कहती हैं कि 'इसमें कुछ भी ग़लत नहीं हुआ.' उनका कहना है कि सरकार को जांच कराना है तो कराए लेकिन पहले शोर मचाकर किसी जांच की घोषणा क्यों की जा रही है.

बहरहाल, सरकार ने अभी पुरस्कार पाने वालों की पात्रता जांचने के आदेश दिए हैं. संस्कृति मंत्री के मुताबिक़ पुरस्कार बंद नहीं किए जाएंगे बल्कि जारी रहेंगे. लेकिन हर महीने मिलने वाली पचास हज़ार रुपये की पेंशन पर ज़रूर तलवार लटक सकती है.

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